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सोमनाथ चटर्जी: सफर हिन्दू महासभा से कम्युनिस्ट तक

लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का कोलकाता के एक निजी अस्पताल में अगस्त 13 को निधन हो गया। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। दस बार लोकसभा के सांसद रहे चटर्जी माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य थे। वह 1968 में माकपा में शामिल हुए थे।वह वर्ष 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे।  सोमनाथ चटर्जी का जन्म 25 जुलाई 1929 को बंगाली ब्राह्मण निर्मल चंद्र चटर्जी और वीणापाणि देवी के घर में असम के तेजपुर में हुआ था। उनके पिता एक प्रतिष्ठीत वकील, और राष्ट्रवादी हिंदू जागृति के समर्थक थे। उनके पिता अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के संस्थापकों में से एक थे। सोमनाथ चटर्जी की शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता और ब्रिटेन में हुई। उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी पढ़ाई की। उन्होंने ब्रिटेन में मिडिल टैंपल से लॉ की पढ़ाई करने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की। इसके बाद उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। सोमनाथ चटर्जी एक प्रखर वक्ता के रूप में भी जाने जाते हैं। अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत सोमनाथ चटर्जी ने सीपीएम के साथ 1968...

भगवान राम की शरण में पहुंची केरल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी

बदले राजनीतिक माहौल में केरल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) भी भगवान राम की शरण में पहुंच गई है। मलयालम कैलेंडर के अंतिम महीने करकीडक्कम को रामायण मास के रूप में मनाया जाता है।  मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान राज्य सरकार के साथ ही सीपीएम पार्टी स्तर पर कई कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है।रामायण माह 17 जुलाई से 16 अगस्त तक मनाया जाएगा।  स्मरणीय हो, कोर्ट को रामजन्मभूमि विवाद पर खुदाई में अवशेषों को छुपाकर गुमराह करने वाले वामपंथी इतिहासकार ही थे।यदि उस समय ही कोर्ट के समक्ष समस्त अवशेष प्रस्तुत कर दिए होते, अयोध्या में अब तक भव्य राममन्दिर बन चूका होता। परन्तु बदलते परिवेश में आज वही वामपंथी राम की शरण में जा रहे है। अब इसे छद्दमवाद न कहा जाये तो क्या कहा जाए? फिर यदि राम में वास्तव में वामपंथियों की आस्था जाग्रत हो रही है, तो राष्ट्र को खुदाई में मिले समस्त अवशेषों को प्रदर्शित कर, अयोध्या में रामजन्मभूमि होने की सच्चाई से भी जनता और कोर्ट को अवगत करायें।  इस सन्दर्भ में  अवलोकन करिए :-- http://nigamrajendra28.blo...

क्या महागठबंधन संभव है?

सबसे पहले बात देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की, जहां लोक सभा की 80 सीटें हैं. पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत में इस राज्य का बड़ा हाथ था. यहां उसे लोक सभा की 71 सीटें मिली थीं. वहीं विपक्ष केवल सात सीटों पर सिमट गया था. लेकिन जिस विपक्षी एकता की बात की जा रही है, उसके लिए ये आंकड़े कुछ और नतीजे पेश करते हैं. दरअसल, यहां भाजपा को कुल 42.30 प्रतिशत वोट मिले थे और उसके सहयोगी अपना दल को 1 प्रतिशत. वहीं सपा को 22.20 प्रतिशत, बसपा को 19.60 प्रतिशत और कांग्रेस को 7.50 प्रतिशत वोट मिले थे. यदि कांग्रेस-सपा-बसपा के वोटों को मिला लिया जाए तो ये 49.3 प्रतिशत हो जाता है. इस समीकरण को देखने के बाद बताने की को आवश्यकता नहीं है कि यदि यह गठबंधन हो जाता है तो उसके नतीजे क्या होंगे. दूसरे, यह कि सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों के आंगन में बैठना पर रहा है। जो सिद्ध करता है कि वास्तव में आज कांग्रेस आधारहीन हो चुकी है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियों और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं रह गया है, यानि बरसाती मेंढक। बहरहाल, राज्य में हर व...

क्या सीपीएम की पोलित ब्यूरो में दलितों का प्रवेश मना है?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार  वामपंथी किस तरह दलित और महिला उत्पीड़न से संसद के दोनों सदनों और सडकों पर मोदी सरकार को बदनाम करने शोर-शराबा करते नज़र आते हैं और वास्तविकता से कोसों मील दूर दलित और उनके समर्थक ताल से ताल मिलाते नज़र आते हैं। लेकिन दलित और महिला उत्पीड़न का नंगा नाच मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में देखने को मिला। एक से बढ़कर एक बुद्धिजीवी दलित और महिलाएँ इस पार्टी में विराजमान हैं, लेकिन दलित और महिला उत्पीड़न का स्वांग कर जनता को भ्रमित करने का प्रमाण देखिए।    दलितों, मजदूरों और शोषितों की  बात करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम ने एक बार फिर से अपनी सर्वोच्च संस्था पोलित ब्यूरो में दलितों की एंट्री बंद रखी है। 17 सदस्यों की पोलित ब्यूरो में एक भी दलित नेता को जगह नहीं दी गई है। सीपीएम ने अपने पूरे इतिहास में कभी पोलित ब्यूरो के दरवाजे किसी दलित के लिए नहीं खोले। इस बार उस पर भारी दबाव था कि इसमें किसी दलित को भी मौका दिया जाए, लेकिन इस बार भी उन्हें अछूत का दर्जा ही दिया गया। यह स्थिति तब है जब पार्टी के अंदर कई ...

राज्यसभा चुनाव: हारी हुई बाजी क्यों लड़ रहे हैं रॉबिन देब व सीपीएम

सीपीएम नेता रॉबिन देब पश्चिम बंगाल से राज्यसभा चुनाव में वामफ्रंट के उम्मीदवार हैं. 294 सदस्यीय विधानसभा में वामफ्रंट के फिलहाल 30 विधायक हैं. वैसे जीतकर 32 आये थे. राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 49 विधायकों का वोट मिलना जरूरी है. दूसरी तरफ सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की महेशतला से विधायक कस्तूरी दास के निधन के बाद तृणमूल कांग्रेस विधायकों की संख्या 213 है. ऐसे में तृणमूल कांग्रेस के चार उम्मीदवारों को वोट देने के बाद भी तृणमूल कांग्रेस के पास 17 वोट अतिरिक्त है. तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी पहले ही घोषणा कर चुकी हैं कि पांचवें व अंतिम सीट के लिए अतिरिक्त 17 वोट कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को दिया जाएगा. कांग्रेस विधायकों की संख्या वैसे तो 44 थी लेकिन अभी भी आधिकारिक तौर पर 42 है. इसमें भी कुछ विधायक तृणमूल कांग्रेस से संपर्क में हैं. ऐसे में कांग्रेस उम्मीदवार का जीतना भी तय है. अब सवाल है कि फिर हारी हुई बाजी क्यों लड़ रहे हैं रॉबिन देब व सीपीएम. रॉबिन देब ही क्यों और कोई क्यों नही  राजनीतिक विश्लेषकों के जेहन में कई सवाल हैं. पहला, सीपीएम के तपन कु...

त्रिपुरा के उप मुख्यमंत्री जीते उप चुनाव, बीजेपी विधायकों की संख्या पहुंची 36

चरिलाम विधानसभा सीट से सीपीएम के उम्मीदवार पलाश देबबर्मा के द्वारा चुनावी मैदान छोड़ने के बाद इस सीट पर बीजेपी के सबसे अमीर उम्मीदवार और राज्य के उप मुख्यमंत्री जिष्णुदेब बर्मा ने यह सीट रिकॉर्ड मतों से सीपीएम को परास्त कर जीत ली है. इसके साथ ही राज्य में बीजेपी विधायकों की संख्या तीन दर्जन यानी 36 हो गई है. वैसे भी इस सीट पर बीजेपी के जिष्णुदेब बर्मा के अलावा सीपीएम के पलाश देबबर्मा, कांग्रेस के अर्जुन देबबर्मा, आईएनपीटी के उमाशंकर देबबर्मा और निर्दलीय ज्योतिलाल देबबर्मा चुनावी मैदान में थे. दरअसल, 2018 विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान सीपीएम के उम्मीदवार रामेन्द्र नारायण देबबर्मा की 11 फरवरी को मौत हो गई थी. इसके बाद ही 12 मार्च उप चुनाव की नई तिथि मुकर्रर हुई थी. गौरतलब है कि चारिलाम सीट से सीपीआई(एम) ने त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव के बाद जारी हिंसा के विरोध में अपना उम्मीदवार हटा लिया था. इस पर बीजेपी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि वामपंथियों ने मैदान छोड़ दिया. चरिलाम सीट का 51 साल का लेखा जोखा  19 चरिलाम विधानसभा सीट पर अब तक ह...

माणिक सरकार के बंगले में टैंक से महिला का कंकाल मिला था, नए सीएम इनकी जांच कराएं: सुनील देवधर

त्रिपुरा में बीजेपी सरकार बनने के बाद आरएसएस नेता सुनील देवधर ने लंबे वक्त तक सत्ता में रहे लेफ्ट के सीएम  माणिक सरकार  पर सवाल उठाए। शनिवार को उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार के बंगले के सेप्टिक टैंक से एक महिला का कंकाल मिला था। देवधर का दावा है कि यह एक राजनीतिक हत्या थी, जिसे जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाला गया। उन्होंने नए सीएम बिप्लब देब से मांग की है कि सभी मंत्रियों को सरकारी बंगले अलॉट करने से पहले इनके टैंकों की जांच और सफाई कराई जाए। बता दें कि बीजेपी ने गठबंधन के साथ 43 सीटें जीतकर 25 साल से सत्ता में काबिज लेफ्ट को बाहर किया है। जनवरी, 2005 में मिला था कंकाल सुनील देवधर ने ट्वीट किया, ''मैं त्रिपुरा के सीएम बिप्लब देब से गुजारिश करता हूं कि वो सभी मंत्रियों को अलॉट हुए सरकारी आवास में बने सेप्टिक टैंकों की सफाई कराएं। क्योंकि यहां 25 साल से सीपीएम सरकार के मंत्री रह रहे थे और खुद पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार के आवास के सेप्टिक टैंक में 4 जनवरी, 2005 को एक महिला का कंकाल मिला था। इस मामले को जानबूझकर दबा दिया गया।'' कौन हैं सुनील देवधर? सु...

जब एक साथ तोड़ी गई थीं लेनिन की 1320 प्रतिमाएं

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार  त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने की देश भर में चर्चा हो रही है। जो भारत में ही सम्भव है। लेकिन बंगाल में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर सबको साँप सूंघ जाता है। क्या इसी को समाजवाद या धर्म-निरपेक्षता कहते हैं?पर हमको लेनिन की प्रतिमाएं तोड़े जाने की सबसे बड़ी घटना के बारे में बताने जा रहे है। ऐसा हुआ था यूक्रेन में. यहां एक साथ लेनिन की 1320 प्रतिमाएं तोड़ दी गई थीं। कोई विरोध नहीं हुआ, लेकिन भारत में मुगलों की बुराई करने या भारत विरोधियों के विरुद्ध मुहिम चलाने पर छद्दम धर्म-निरपेक्षों को असुरक्षा का डर सताने लगता है और देश की जनता को भ्रमित करने प्रदर्शन आदि करने सडकों पर उतर आते हैं।  एक विदेशी की मूर्ति तोड़ने पर किस तरह विधवा-विलाप किया जा रहा है, लेकिन जब लेनिन के अनुयायी अपने चिर-विरोधी भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो रहे थे, क्या तब देश में असुरक्षा की भावना नहीं थी? आखिर यह नाटकबाज़ी और ढोंग कब तक होता रहेगा? क्या ये नेता देशहित सोंच सकते हैं? साम्प्रदायिकता खेल धर्म-निरपेक्षता का...

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)