एक शिक्षक की व्यथा आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार स्कूल के बोर्ड पर सड़क का नाम गलत, न प्रधानाचार्य को परवाह, और न ही किसी और को? नेताओं को अपने वेतन वृद्धि, सुख-सुविधाओं की तो चिन्ता रहती है, लेकिन शिक्षा के गिरते स्तर और कल के चर्चित नगर निगम एवं सरकारी स्कूलों की होती दुर्दशा की किसी को चिन्ता नहीं। कई स्कूल तो केवल मतदान के ही लिए शेष बचे हैं। इतना ही नहीं, दिल्ली के एक विधायक के कार्यालय से दस गज और निगम पार्षद से तीस गज की दूरी पर नगर निगम स्कूल है, क्या है उस स्कूल की दशा? सीवर भरने पर कई दिनों तक स्कूल के गेट गंदे पानी में डूबे होते है। इतना ही नहीं, स्कूल के नीचे देगें पकती हैं, वह भी गंदे पानी के ढेर पर। नेता हाथ में झाड़ू लेकर तो निकल आते हैं, लेकिन कितने महीनों से सीवरों की सफाई नहीं हुई, किसी को चिन्ता नहीं। क्योकि किसी अधिकारी का बच्चा इन स्कूलों में नहीं पढ़ता। जबकि मुझ जैसे वरिष्ठ इन्ही स्कूलों की देन हैं। दो दशक पूर्व तक नेताओं के उद्देश्य समाज सेवा होता था, लेकिन आज नेताओं ने राजनीति को एक व्यावसायिक बनाकर हर क्षेत्र का बंटाधार कर दिया है। कद...