स्कूलों में योगा करवाने, गायत्री मन्त्र, वन्दे मातरम बोलने या राष्ट्रगान गाने पर किसी मौलाना के विरोध करने से पहले छद्दम समाजवादी और धर्म-निरपेक्ष गैंग इतना विधवा विलाप करने लगते है, कि पूछो मत। मेरी आयु के अधिकतर लोग शायद नगर निगम एवं सरकारी स्कूलों में ही शिक्षा ग्रहण करने गए होंगे। क्या उस समय स्कूलों में PTका पीरियड नहीं होता था, जिसे बदलते परिवेश में योगा का नाम दे दिया गया है; फिर पहले अखाड़े होते थे, जिनकी जगह जिम ने ले ली। वास्तव में कल के अखाड़े आज के जिम कहीं अधिक लाभकारी थे, इस अंतर को शान्त भाव से समझना होगा और जनता को समझाना होगा, न कि अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने बैठ जाएँ। अपने विद्यार्थी जीवन से कुछ वर्ष पूर्व तक किसी स्कूल के नाम के आगे अल्पसंख्यक नहीं लिखा देखा, लेकिन वोट के भूखे इन दोगले नेताओं ने शिक्षा मंदिरों पर घिनौनी राजनीती खेल समस्त वातावरण दूषित कर दिया। हर जगह साम्प्रदायिकता, जरा भी शर्म नहीं आती या आयी शिक्षा क्षेत्र को भी गन्दा करने में। मेवात के जिस स्कूल में जबरदस्ती नमाज पढ़वाने की घटना हुई है, उस अध्यापक के साथ-साथ इन छद्दम धर्म-निरपेक्ष न...