शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि भारतीय राजनीति का स्तर इतना गिर जाएगा। भारत में शायद ही कोई ऐसी पार्टी होगी, जिसमे हिन्दू न हो। उसके बावजूद महात्मा गाँधी से लेकर आजतक जिस नेता अथवा पार्टी को देखो हिन्दू को अपमानित करने से नहीं चुकता। हिन्दूहित की बात करने वाले को साम्प्रदायिक घोषित करने से भी नहीं चूकते। महात्मा गांधी हिन्दुओं से “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम…” कहलवाने का साहस कर सकते थे, लेकिन क्या मुसलमानों से इसी भजन को गाने के लिए कहने का साहस किया? गौ-हत्या बंद करवाने के लिए कोई प्रदर्शन अथवा धरना दिया? यहाँ भी "Divide And Rule" नीति अपनाने से नहीं चुके महात्मा गाँधी। कैबिनेट द्धारा पाकिस्तान को पैसा न दिए के निर्णय के विरुद्ध धरने और भूख हड़ताल की धमकी देंने वाला गाँधी गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध पर क्यों खामोश रहे? महात्मा गाँधी केवल उतना ही बोलते और करते थे, जितना उनके आकाओं द्धारा उनको करने की इजाजत मिलती थी। राजनीतिक पार्टियाँ अपने स्वार्थ के लिये गोधरा, 1984 सिख नरसंहार आदि का रोना रोते है, लेकिन आज तक किसी भी पार्टी ने महात्मा गाँधी हत्या नहीं "वध" होन...