लोकतन्त्र एक ऐसी शासन प्रणाली है-जो 'सम्मोहन' के जादुई खेल से चलायी जाती है। कोई भी ऐसा राजनीतिज्ञ जो इस 'सम्मोहन' की जादुई क्रिया को जानता हो-देर तक किसी देश पर शासन कर सकता है। नरेन्द्र मोदी ने अपने इस सम्मोहन से भाजपा को शिखर तक तो पहुंचा दिया, लेकिन जो साथ अपने सहयोगियों से मिलना चाहिए था, पूर्णरूप से नहीं मिल पा रहा। ऐसा नहीं है कि किसी न नहीं मिल रहा, केवल कुछ ही लोगों का सहयोग मिल रहा है। क्योकि इतने वर्षों तक उन्हें केवल मालपुए खाने की आदत पड़ी हुई थी। अभी भी देख लो, फेसबुक और व्हाट्सअप के जरिए फोटो डाल उच्च पदाधिकारियों की आँखों में धूल झोंकी जा रही है। दिल्ली में ही देख लो, पता नहीं कितने मंडल बिखड़े पड़े हैं। चुनाव के समय पुरानों को पार्टी में उनकी भक्ति को जगा,उच्च पदाधिकारियों के सामने भीड़ जमा करवा देंगे। खैर आते हैं असली मुद्दे पर: भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पश्चात नेहरूजी देश के प्रधानमंत्री बने तो उनका व्यक्तित्व तो जादुई नहीं था-पर वह 'सम्मोहन' पैदा करने के जादू को अवश्य जानते थे, जिससे लोग उनके प्रति आकर्षित हुए और मजबूती के साथ उनसे जुड़ गये...