भारतीय मानसिकता भी क्या मानसिकता है समझ नहीं आता? हमारे छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता भी अपने मीडिया सहयोगियों से साठगांठ कर 1984 सिख नरसंहार और 2002 गुजरात दंगों पर खूब राजनीति खेल रहे हैं, लेकिन मोहनदास करमचंद गाँधी हत्या नहीं बल्कि नाथूराम गोडसे के शब्दों में वध उपरांत पुणे में चितपावन ब्राह्मणों के हुए नरसंहार पर आजतक सबकी बोलती बंद है, क्यों? क्या चितपावन ब्राह्मण इन्सान नहीं थे? उस समय भारत में केवल कांग्रेस का ही राज था। हर वर्ष नेता दशहरे के अवसर पर रामलीला मंचन स्थलों पर जाकर आनन्द लेते हैं, लेकिन पुरुषोत्तम राम के जीवन से प्रेरणा नहीं। अब इसे छद्दमवाद न कहा जाए तो क्या कहा जाये? प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। पुरुषोत्तम राम ने ब्राह्मण रावण वध उपरान्त नदी में स्नान कर ब्राह्मण वध करने का पश्चाताप किया था, लेकिन गांधी वध उपरान्त 31 जनवरी से 3 फरवरी तक चितपावन ब्राह्मणों का जो नरसंहार हुआ, कितने लोगों ने पश्चाताप किया? कितने लोगों ने पवित्र नदियों में स्नान कर ब्राह्मण हत्याओं पर माफ़ी मांगी?https://www.youtube.com/watch?v=8xNZDWNHcTo https://youtu.be/gyhsvqYXC2c ...