क्या आप जानते हैं कि ‘गाज़ी’ एक पदवी है जो किसी काफिर को मारने से मिलती है ! जानिए कि ‘अकबर’ ने यह ‘गाज़ी’ पदवी कैसे प्राप्त की और इतिहासकारों ने कैसे उसे ‘पापी-धूर्त अकबर’ से ‘अकबर महान’ बनाया..... बैरम खाँ ने निहत्थे और बुरी तरह घायल हिन्दू राजा हेमू के हाथ-पैर बाँध दिये और उसे नौजवान शहजादे अकबर के पास ले गया और बोला- ‘‘आप अपने पवित्र हाथों से इस काफिर को कत्ल कर दें और ”गाज़ी” की उपाधि कुबूल करें।’’ अकबर ने बंदी हेमू का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया। (नवम्बर, 5 ई. 1556) इस तरह अकबर ने 14 साल की आयु में ही गाज़ी (काफिरों का कातिल) होने का सम्मान पाया। इसके बाद हेमू के कटे सिर को काबुल भिजवा दिया गया और धड़ को दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया। हेमू के पिता को नासिर-उल-मलिक के सामने पेश किया गया जिसने उसे इस्लाम कबूल करने का आदेश दिया। उस वृद्ध पुरुष ने कहा- ‘‘मैंने 80 वर्ष तक अपने ईश्वर की पूजा की है; मै अपने धर्म को कैसे त्याग सकता हूँ?’’ मौलाना परी मोहम्मद ने उसके उत्तर को अनसुना कर अपनी तलवार से उसका सर काट दिया। (तारीख-ई-अफगान, अहमद यादगार, अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड 6, पृष्ठ 6...