भारत में प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के नाम से मनाया जाने के बावजूद इतनी अपमानित क्यों हो रही है?विश्व के किसी भी देश में जाइए, वहाँ की राष्ट्रीय भाषा का ही चलन है। यहाँ से अनुवादक साथ जाता है। अभी केरल में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान अनुवादक देख ऐसा लगा, शायद प्रधानमन्त्री अपने देश में नहीं किसी विदेश में जनता को संबोधित कर रहे हैं। जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अपने ही देश में अपनी ही राष्ट्रभाषा का अनादर हो रहा है। यह एक गम्भीर चिंता का विषय है। दिल्ली से बाहर किसी भी अन्य प्रान्त में जाइए वहाँ की भाषा न बोलने पर खुंडे उस्तरे से हज़ामत बनाई जाती है। क्यों? मॉल को छोड़ बाजार में प्रिंटेड रेट से ज्यादा देने पड़ते हैं। इस बात का व्यक्तिगत अनुभव है। जिसे देख आभास होता है कि इस राज्य में सरकार नाम की चीज़ ही नहीं। इस आरोप को अनेकों बार अपने लेखों में लिख भी चूका हूँ। 1946 से लेकर 1949 तक जब भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया जा रहा था, उस दौरान भारत और भारत से जुड़े तमाम मुद्दों को लेकर संविधान सभा में लंबी लंबी बहस औ...