आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार जब से केन्द्र में मोदी सरकार सत्ता में आयी है, एक के बाद एक बैंक घोटाले सामने आ रहे हैं। हैरानी इस बात की होती है, बैंकों में इतने घोटाले हो रहे थे, जनता को पागल बनाकर हमारे निर्वाचित नेता सदन में क्या शोर-शराबा करने, अपनी तिजोरियाँ भर 56 भोग का सेवन कर राजशाही ज़िन्दगी का आनन्द लेने जाते हैं? क्या घोटाले उनके इशारे पर हो रहे थे? यदि नहीं, क्यों नहीं सरकार या रिज़र्व बैंक से इस पर अंकुश लगाने और धन वसूली के लिए दबाव बनाया गया? अपने 6 दशक से अधिक जीवन में जनसेवा को व्यापारिक रूप लेते नहीं देखा। नितरोज होते घोटाले इसी व्यापारिक होती जनसेवा ही का परिणाम है। क्योकि अपने दम पर कोई भी एक पैसे तक का घोटाला नहीं कर सकता, बशर्ते राजनीतिक संरक्षण न हो। दूसरी हैरानी की बात यह है कि कोई बदकिस्मत नेता ही लपेटे में आता है, अन्यथा सब कोर्ट से बरी हो जाते हैं, जैसाकि 2g स्कैम में हुआ। नेताओं का दिमाग राष्ट्र निर्माण में कम, छद्दम धर्म-निरपेक्षता के भक्त बन समाज में नफरत फ़ैलाने में अधिक लगता है, जैसाकि निम्न लेख प्रमाणित क...