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विरोधियों की नींद हराम करते मोदी के 6 ऐसे काम

आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार  तीसरा साल शुरू होने के साथ ही  नरेंद्र मोदी सरकार अपने पुरे जोश में है। बीते लंबे समय से देश को लूटने और बेवकूफ बनाने वालों का हिसाब-किताब शुरू हो चुका है। चौथे साल के पहले महीने में ही मोदी सरकार ने कई ऐसे बड़े फैसले लिए हैं जिनसे अंदर ही अंदर खलबली मची हुई है। बीते 10 साल में देश को लूटने वाली कांग्रेस सरकार और उसके कुछ कृपापात्रों की पोलपट्टी धीरे-धीरे सामने आ रही है। ये पांचों वो मामले हैं जिनके कारण बीते कुछ साल में देश और यहां रहने वाले हिंदुओं को बदनाम करने की कोशिश की गई थी।  एक छठा काम जो छद्दम धर्म-निरपेक्षों की नींद हराम करने को है, वह अयोध्या में राममन्दिर का मुद्दा है। यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट से निवेदन कर  उन लोगों को, जो अपनी रोज़ी-रोटी और कुर्सी की खातिर खुदाई में मिले मंदिर के अवशेषों को प्रस्तुत न कर गुमराह किया, को भी दण्डित करने के लिए कहें। राममंदिर बनने में किस तरह कांग्रेस और वामपंथी अदालतों को गुमराह करते रहे; और किन लोगों के कहने पर राम और रामसेतु काल्पनिक कहा था। किस तरह आम मुसलमान को सच्...

क्या साहित्य अकादमी वामपंथी विचारधारा से मुक्त होगा?

आर.बी.एल.निगम  हिंदी के कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता हैं, जिसमें ये पंक्ति आती है कि याचना नहीं अब रण होगा  संग्राम बड़ा भीषण होगा  दिनकर की ये पंक्तियां साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव पर लगभग सटीक बैठ रही है। वामपंथी लेखकों के लगभग कब्जे वाली संस्था को इस विचारधारा से मुक्त करवाने के लिए कई लेखकों ने संग्राम का एलान कर दिया है। जीत किसकी होगी, ये तो होने वाले चुनाव में पता चलेगा, लेकिन तस्वीर बहुत कुछ 21 दिसंबर को हुई वर्तमान एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक में साफ हो गयी। साहित्य अकादमी के चुनाव का उद्घोष हो चुका है और 5 साल बाद होनेवाले इस चुनाव को लेकर साहित्यिक हलके में बहुत हलचल है।  साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद को लेकर 9 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। मराठी से भालचंद्र नेमाड़े, ओडिया से प्रतिभा राय, कन्नड़ से चंद्रशेखर कंबार, हिंदी से अरुण कमल, लीलाधर जगूड़ी और रामशरण गौड़ और गुजराती से बलवंत जानी के अलावा दो और नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित थे. इन 9 सदस्यों के लिए साहित्य अकादमी की आमसभा के ...

केरल में होती हत्याओं पर छद्दम धर्म-निरपेक्ष खामोश क्यों?

भारत के सर्वाधिक साक्षरता वाले प्रदेश में लाल आतंक की बर्बरता अपने चरम पर है । भारत के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का एवं राष्ट्रीय मीडिया का इस पर चुप्पी साधे रखना वाकई बेहद शर्मनाक है। वैसे तो सामाजिक असमानता,जलीकट्टू के दौरान पशुओं पर हो रहे अत्याचार, मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए भारत में वामपंथी लोग आपको यत्र-तत्र घडियाली आंसू बहाते हुए मिल जायेंगे पर केरल में हो रही एक के बाद एक हत्याओं पर इस वर्ग का मौन इस बर्बर कार्य को इनकी मौन स्वीकृति देता हुआ प्रतीत होता है ।  1978 में जब पत्रकारिता में पदापर्ण करने से आज तक केरल में संघ एवं भाजपा कार्यकर्ताओं की हो रही हत्याओं का सिलसिला रुका नहीं है। अख़लाक़ की भीड़ द्वारा मौत होने पर छद्दम धर्म-निरपेक्ष किस तरह विधवा-विलाप करते नज़र आए, लेकिन केरल में होती हत्याओं पर अंधे,गूंगे और बहरे बने बैठे हैं। क्या इनका खून खून नहीं, अख़लाक़ का ही खून खून था? लेकिन तब से लेकर यही देखा है कि किसी भी गैर-हिन्दू की हत्या होने पर समाजवाद और धर्म-निरपेक्षता संकट में नज़र आ जाती है। परन्तु केरल में होती हत्याओं पर छद्दमों के साथ-साथ मीडिया भी चुप्पी साधे रहत...

विधायिका अल्का लाम्बा के चीन दौरे कौन प्रायोचित करता है?-- कपिल मिश्रा

चीन ने जो डोकलाम मुद्दे पर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतीय गणराज्य को जो मिनी युद्ध की अपने ऑफिशियल सरकारी अखबारों के ज़रिये धमकी दी हैं, वो सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक खेल खेल रहा है लेकिन इसके प्रतिवाद में भारत सरकार की प्रतिक्रिया के अतिरिक्त किसी भी दूसरे विपक्षी या विरोधी नेता की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, मतलब 60 सालों तक देश में राज करने वाली कांग्रेस व् अन्य धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार दल चीन की इस धमकी पूरी तरह खामोश है, चीनी थिंक टैंक को मैं पाकिस्तानियों से ज्यादा समझ दार समझता था परंतु चीन ने यह दिखा दिया है कि वह पाकिस्तान ही नहीं बल्कि तालिबानों से भी नीचे गई गुजरी मानसिकता रखते हैं , चीन ने जो भारत के परमाणु देशों के ग्रुप में एंट्री का विरोध किया वह दुखद है, लेकिन इससे भी ज्यादा शर्मनाक ये रहा की चीन ने जो एक आतंकवादी मसूद अज़हर के लिए बार-बार वीटो करके आतंकवाद का समर्थन किया वो निसंदेह चीन को आतंकवादीओ का स्पष्ट समर्थक बताती है। चीन में अब किसी सभ्य समाज की सोच नहीं है, पूरा विश्व चीन की विस्तारवादी नीतियों से परेशान है वह किसी भी दूसरे देश के देशों की समुद्रीय सीमा में भी...

ईएमएस नंबूदरीपाद : भारत में कम्युनिस्ट राजनीति के अगुआ

राजनीति के इतिहास में जब-जब कम्युनिस्ट आंदोलन की बात होगी, तब-तब एलमकुलम मनक्कल सनकरन (ईएमएस) नंबूदरीपाद याद किए जाएंगे. ईएमएस ने अपना जीवन कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूत करने में गुजार दिया. उन्होंने लगभग 70 साल देश और समाज की सेवा में बिताए. वे न सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, बल्कि उनके कारण ही कम्युनिस्ट पार्टी सियासत से सरकार तक पहुंच सकी. 1957 में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी केरल की कम्युनिस्ट सरकार आजाद भारत में किसी राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी और पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के वे पहले मुख्यमंत्री थे. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनका अहम योगदान रहा है. ईएमएस नंबूदरीपाद का जन्म 13 जून 1909 को केरल के मलप्पुरम जिले के एलमकुलम पैरिनथलमन्नातुलक में उच्च जाति के नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. ये जब छोटे थे तभी इनके पिता परमेश्वरन नंबूदरीपाद का निधन हो गया. इनका पालन-पोषण इनकी माता ने किया. नंबूदरीपाद की प्रारंभिक शिक्षा पलघाट और त्रिचुर में हुई. इन्होंने कई वर्षों तक संस्कृत का अध्ययन किया. इनकी मा...

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)