जबसे भारत में चुनाव प्रक्रिया का श्रीगणेश हुआ है, तभी से किसी न किसी कमी के कारण चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया जाता है। लेकिन परिणाम वही ठाक के तीन पात। मुझसे वरिष्ठ पत्रकारों एवं नेताओं को ज्ञात होगा कि पहले ही चुनाव में चुनाव आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लब पन्त की मिलीभगत से लोकतन्त्र की निर्मम हत्या की थी यानि रामपुर से लगभग 6000 वोटों से विजयी हिन्दू महासभा के बिशन सेठ को पराजित घोषित कर पराजित मौलाना आज़ाद को विजयी घोषित किया गया था। क्या हुआ चुनाव आयोग का? कुछ नहीं हुआ। फिर किस कारण कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को अयोग्य घोषित किया था? एक बार तो बैलेट पेपर और उस पर मोहर लगाने वाली स्याही को रूस से मंगवाने का आरोप भी लगा था। जिस पर तत्कालीन भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता प्रो बलराज मधोक ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि "मोहर लगाई "दीपक" पर, बक्से खुलने पर मोहर निकली "गाय बछड़े" पर।" उस समय दीपक जनसंघ का और गाय बछड़ा कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था। इंदिरा गाँधी की हत्या उपरान्त सिखों के भा...