महात्मा गांधी का वो कमरा जहां सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ आखिरी मीटिंग करने के बाद बापू शाम की प्रार्थना सभा के लिए 10 मिनट लेट निकले और फिर कभी लौटकर नहीं आ पाए। उस रोशनीदार कमरे में गांधी के स्मृति शेष को देखते हुए और इस बात को महसूस करते हुए कि बापू अपने आखिरी पलों में यहीं थे, मुमकिन है कि आप भावुक हो जाएं और जो थोड़े जज़्बाती हैं उनकी आंखों से सचमुच ही झर झर आंसू बहने लगते है। नाथू राम गोडसे के दिए पब्लिक एड्रेस सिस्टम से 150 बयानों पर भी बहस जरुरी हैं। दूसरे, यह कि गाँधी वध उपरान्त चित्पावन ब्राह्मणों के हुए नरसंहार की क्यों नहीं जाँच करवाकर, दोषियों को दण्डित किया गया? क्या चित्पावन ब्राह्मणों की जान जान नहीं थी? 1984 दंगों बाद सिखों को कम से कम इज़्ज़त से देखा जाने लगा था, लेकिन चितपावन ब्राह्मणों का तो काफी समय तक तिरस्कार किया गया था। गम्भीर बहस होने पर स्पष्ट होगा कि महात्मा गाँधी वध देश के हित में था या अहित में। अगर आज महात्मा गाँधी जीवित होते, पता नहीं, अब तक भारत के कितने टुकड़े हो गए होते, क्योकि तुष्टिकरण गाँधी के खून में था। बापू के जीवन के वो आख...