बापू के जीवन के वो आखरी 5 महीने
दिल्ली के 30 जनवरी मार्ग पर स्थित गांधी स्मृति जहां महात्मा गांधी ने अपने जीवन के आखिरी 144 दिन बिताए थे. विभाजन के बाद दिल्ली और देश भर में हो रही हिंसा की रोकथाम को लेकर गांधी यहीं चर्चा और विमर्श किया करते थे. रोज़ की प्रार्थना सभाएं भी यहीं होती थीं.
अवलोकन करें:--
पहले बिड़ला हाउस के नाम से पहचाने जाने वाली यह जगह वही है जहां महात्मा गांधी को प्रार्थना सभा में जाते हुए नाथू राम गोडसे ने गोली मार दी थी. पूरी दुनिया को हिला देने वाली इस घटना की याद तब रोंगटे खड़े कर देती है जब आप गांधी स्मृति में ठीक उस जगह होते हैं जहां गांधी को पॉइंट ब्लैंक रेंज पर गोली मारी गई थी और जिसे अब एक स्मारक के रूप में बना दिया गया है.
पहले बिड़ला हाउस के नाम से पहचाने जाने वाली यह जगह वही है जहां महात्मा गांधी को प्रार्थना सभा में जाते हुए नाथू राम गोडसे ने गोली मार दी थी. पूरी दुनिया को हिला देने वाली इस घटना की याद तब रोंगटे खड़े कर देती है जब आप गांधी स्मृति में ठीक उस जगह होते हैं जहां गांधी को पॉइंट ब्लैंक रेंज पर गोली मारी गई थी और जिसे अब एक स्मारक के रूप में बना दिया गया है.
बापू की कई यादों को समटेते इस संग्रहालय में शैलजा बतौर रिसर्च एसोसिएट काम कर रही हैं. शैलजा और उनकी टीम यहां आने वाले दर्शकों को संग्रहालय के चप्पे चप्पे की जानकारी मुहैया करवाती हैं. शैलजा बताती हैं कि हर दिन हज़ार से भी ज्यादा लोग संग्रहालय आते हैं और शनिवार-रविवार यह संख्या और बढ़ जाती है. दिलचस्प यह है कि यहां आने वाले हर व्यक्ति के ज़ेहन में बापू से जुड़ी कई जिज्ञासाएं होती हैं लेकिन कुछ सवाल तो ऐसे हैं जिनका सामना शैलजा और उनकी टीम को बार बार करना पड़ता है.
बापू को किसने मारा था?
गणेश इस संग्रहालय में कई सालों से काम कर रहे हैं और हर दिन वह इस सवाल से दो चार होते ही हैं कि बापू को आखिर किसने मारा था. गणेश कहते हैं कि इस बारे में कई लोग जानते हैं लेकिन कई देश-विदेश से आने वाले कई सैलानी ऐसे भी हैं जो अभी भी इस बात से अनजान हैं. वह यहां आकर चौंक जाते हैं कि बापू को इसी जगह पर गोली से मारा गया था.
फिर अगला सवाल होता है कि बापू को किसने मारा, उसका धर्म क्या था और मारने की वजह क्या थी. यह जानकर लोग और भी हैरान रह जाते हैं कि बापू को एक हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति ने ही मार डाला. इसके बाद उनके सवालों की फेहरिस्त बढ़ती ही चली जाती है.
मनु और आभा कौन थी
दूसरा पूछा जाने वाला सवाल है कि वह दो लड़कियां कौन थीं जिनका सहारा लिए बापू तस्वीरों में दिखाई देते हैं और उनका गांधी से क्या रिश्ता था. सुनील भी गांधी स्मृति में ही काम करते हैं और बताते हैं कि जब वह किसी व्यक्ति या परिवार को संग्रहालय दिखा रहे होते हैं तो अक्सर उनका इस सवाल से सामना हो ही जाता है. जवाब में बताया जाता है कि वह मनु और आभा हैं जो बापू की सहायक थीं और उनकी मुहं बोली पोतियां भी.
अंतिम समय में बापू इन्हीं का सहारा लेकर प्रार्थना सभा की ओर जा रहे थे. रास्ते में उन्होंने आभा को डांट भी लगाते हुए कहा कि ‘तुम्हारी वजह से मुझे प्रार्थना में 10 मिनट की देरी हो गई.’ वहीं जब सामने से नाथुराम गोडसे गांधी की तरफ झुके, मनु को लगा वह बापू के पैर छूने के लिए बढ़े हैं. आभा ने कहा कि बापू को पहले ही प्रार्थना में देर हो गई है. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है.
क्या बापू भी मैगी खाते थे..?
दरअसल गांधी स्मृति, पहले बिड़ला हाउस था जहां बिड़ला परिवार रहा करता था. आज़ादी के आंदोलन के वक्त इस कोठीनुमा घर के आगे के दो कमरे बापू के लिए थे और वह जब भी दिल्ली आते थे, तो यहीं बतौर मेहमान रहा करते थे. बापू की हत्या के बाद पांच नंबर का ये बंगला सरकार द्वारा ले लिया गया और इसका नाम गांधी स्मृति रखा गया.
बापू के उन दो कमरों में अभी भी उनका बिस्तर, तकिया चरखा, घड़ी, आदि संजोकर रखा गया है. इन्हीं सब सामान में वे चम्मच और छूरी कांटे भी हैं जिनका इस्तेमाल बापू किया करते थे. यहां कार्यरत स्मिता बताती हैं कि कांटा यानि फॉर्क को देखकर अक्सर लोग हैरान रह जाते हैं और उत्साह में पूछ लेते हैं कि क्या बापू भी मैगी खाते थे.
बापू की शादी हुई थी, उनके कितने बच्चे थे..?
ललिता बताती हैं कि बापू की शादी और उनके बच्चों को लेकर भी लोगों में काफी दिलचस्पी दिखाई पड़ती है. बापू के निजी जीवन से अनजान कई लोग यह जानकर चौंक जाते हैं कि बापू की शादी भी हुई थी. ललिता कहती हैं कि यह ‘न्यूज़ ब्रेक’ करने पर उनसे अगला सवाल पूछा जाता है कि लेकिन बापू तो ब्रह्मचर्य का पालन करते थे ना..? यह भी कम ही लोग जानते हैं कि बापू के चार बच्चे हैं – हरीलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास गांधी.
बापू के जीवन, उनके मूल्यों और उनसे जुड़े विवादों से संबंधित अपनी कई जिज्ञासाओं को लेकर गांधी स्मृति में लोग आते हैं. कुछ को जवाब मिल जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो सवालों की एक और गठरी लेकर अपने घर लौटते हैं.( साभार: न्यूज18 के लिए कल्पना शर्मा की रिपोर्ट )
मोहनदास करमचंद गांधी मुसलमानो से डर गए थे -
यह एक विवादस्पद मगर सच है कि १९०८ में एक घटना के बाद गाँधी में मुसलामानों के प्रति कड़ा रवैया बदलकर पक्षपात करना शुरू किया। हुआ यूं कि दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सरकार ने वहां रहने वाले भारतीयों पर ३ पौंड का टेक्स लगाया, गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से इस विषय में बहस की जिसे मुसलामानों ने सहयोग नहीं दिया तब गाँधी ने इसकी जबरदस्त आलोचना की एक सामूहिक वकतव्य में इस्लाम पर कड़ी बात भी कही जिससे मुसलामानों में रोष बढ़ा, १० फरवरी १९०८ को मीर आलम नामक पठान की अगुआई में एक दस्ते ने गाँधी की उनके निवास पर बेरहमी से पिटाई की और जान से मार डालने की धमकी भी दी। डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि इस घटना के बाद गाँधी जी ने आपत्तिजनक वक्तव्य तो देने बंद कर ही दिए, साथ ही उनकी सभी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते रहे और उनके अपराध तक को शह देने लगे।
यह एक विवादस्पद मगर सच है कि १९०८ में एक घटना के बाद गाँधी में मुसलामानों के प्रति कड़ा रवैया बदलकर पक्षपात करना शुरू किया। हुआ यूं कि दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सरकार ने वहां रहने वाले भारतीयों पर ३ पौंड का टेक्स लगाया, गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से इस विषय में बहस की जिसे मुसलामानों ने सहयोग नहीं दिया तब गाँधी ने इसकी जबरदस्त आलोचना की एक सामूहिक वकतव्य में इस्लाम पर कड़ी बात भी कही जिससे मुसलामानों में रोष बढ़ा, १० फरवरी १९०८ को मीर आलम नामक पठान की अगुआई में एक दस्ते ने गाँधी की उनके निवास पर बेरहमी से पिटाई की और जान से मार डालने की धमकी भी दी। डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि इस घटना के बाद गाँधी जी ने आपत्तिजनक वक्तव्य तो देने बंद कर ही दिए, साथ ही उनकी सभी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते रहे और उनके अपराध तक को शह देने लगे।
23 दिसंबर 1926 :
श्रद्धानंद स्वामी जब बीमार थे और बिस्तर पर लेटे थे तब अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने उन्हें चाकू से गोद कर मार डाला, श्रद्धानंद स्वामी एक आर्य समाज के प्रचारक थे और धर्म परिवर्तन कर चुके मुसलामानों को शुद्धि योजना द्वारा वापस हिन्दू धर्म में लाना चाहते थे, गाँधी का बड़ा बेटा हीरालाल जो मुसलमान बन चुका था इन्ही स्वामी द्वारा वापस हिन्दू बना था। एक मुसलमान महिला, जो स्वामी के पास हिन्दू धर्म में वापस जाने के लिए आयी तब उसके मुस्लिम पति के अदालत का सहारा लेकर स्वामी पर इलज़ाम भी लगाया लेकिन अदालत ने स्वामी को बरी कर दिया इस घटना से कई मुस्लिम खफा हो गए और कुछ ही दिनों में उनकी हत्या कर दी गयी। तब गाँधी ने कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में कांग्रेस की कांफ्रेंस में कहा – भाई रशीद का जुर्म मैं नहीं मानता बल्कि नफरत फैलाने वाले ही जिम्मेदार हैं यानिकी उनहोंने स्वामी जी को ही दोषी ठहराया।
धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के जरिये गाँधी का यही मुस्लिम तुष्टिकरण देश के विभाजन का भी कारण बना, जब २६ मार्च १९४० को जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की अवधारणा पर जोर दिया तब गाँधी का वक्तव्य था – अन्य नागरिकों की तरह मुस्लिम को भी यह निर्धारण करने का अधिकार है कि वो अलग रह सके, हम एक संयुक्त परिवार में रह रहे हैं ( हरिजन , 6 अप्रैल 1940 ).
अगर इस देश के अधिकांश मुस्लिम यह सोचते हैं कि एक अलग देश जरूरी है और उनका हिदुओं से कोई समानता नहीं है तो दुनियाँ की कोई ताक़त उनके विचार नहीं बदल सकती और इस कारण वो नए देश की मांग रखते है तो वो मानना चाहिए, हिन्दू इसका विरोध कर सकते है ( हरिजन , 18 अप्रैल 1942 ).
12 जून 1947 को जब कांग्रेस सेशन में बंटवारे के मुद्दे पर विचार हुआ तब पुरुषोत्तम दास टंडन, गोविन्द वल्लभ पन्त, चैतराम गिडवानी आदि ने इसका तर्क के साथ घोर विरोध किया था तब गाँधी ने सारे वक्ताओं को किनारे कर 45 मिनट की जो स्पीच दी उसका सार इस प्रकार है अगर कांग्रेस ने बंटवारे को स्वीकार नहीं किया तो कुछ और ग्रुप ( संभवतः नेता जी सुभाष चन्द्र बोस) कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देंगे और देश में भूचाल जैसा आ जाएगा। दुसरे शब्दों में गाँधी ने मुसलामानों को पाकिस्तान बनाने के लिए प्रेरित ही किया। इस घटना के बाद वल्लभ भाई ने भी बंटवारा स्वीकार करने का फैसला किया।
बंटवारे के बाद भी गाँधी की नीतियों ने देश का जो नुक्सान किया वो इस प्रकार है, 23% मुस्लिम जनसँख्या के लिए 32 % भूमि पाकिस्तान को दी गयी, बंटवारे के बाद मुख्य कदम था जल्द से जल्द पापुलेशन एक्सचेंज, यानिकी मुस्लिम को पाकिस्तान और हिन्दुओं को भारत में पुनर्वास दिलाना, जिसकी वकालत जिन्ना और माउंट बेटन दोनों ने की थी और मुस्लिम लीग के प्रस्ताव में यह मुद्दा शामिल था। लेकिन गाँधी ने कुछ मुसलामानों की अनिच्छा के चलते गाँधी ने इसे “इम्प्रक्टिकल” करार दिया, बिहार में दंगे भड़कने पर भी मुस्लिम लीग का यह प्रस्ताव लागू नहीं किया गया। माउंट बेटन ने जब नेहरु पर दबाव डाला तब नेहरु ने गाँधी की ओर देखा और गाँधी ने इसे स्वीकार नहीं किया, नतीज़तन हिन्दुओं ( मुख्यतया सिख और सिन्धी) का भारत में पलायन तो हुआ लेकिन मुसलामानों का पाकिस्तान में न के बराबर और जिनका पाकिस्तान पलायन हुआ वो मुहाजिर कहलाये यानि दोयम दर्जे के पाकिस्तानी।
गाँधी के विरोध के कारण ही “वन्दे मातरम” राष्ट्रगान नहीं बन पाया, दक्षिण अफ्रीका में गांधी इसे बहुत पसंद करते थे उन्होंने लिखा था ” यह संवेदना में आदर्श है और मधुर भी, यह सिर्फ देशभक्ति जगाता है और भारत को माँ की तरह गुण गाता है ” परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ मुस्लिम इसे नापसंद करते है तब उनहोंने सामूहिक सभा में गाना बंद कर दिया और जन गण मन राष्ट्रगीत बनाया गया। बंटवारे के बाद जब सिन्धी और पंजाबी दिल्ली में केम्प में रह रहे थे तब गाँधी ने वहां का दौरा किया और कहा- मुस्लिम अगर पाक को हिन्दू विहीन करते हैं तो हमें नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि हौसला रखना चाहिए
गाँधी के विरोध के कारण ही “वन्दे मातरम” राष्ट्रगान नहीं बन पाया, दक्षिण अफ्रीका में गांधी इसे बहुत पसंद करते थे उन्होंने लिखा था ” यह संवेदना में आदर्श है और मधुर भी, यह सिर्फ देशभक्ति जगाता है और भारत को माँ की तरह गुण गाता है ” परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ मुस्लिम इसे नापसंद करते है तब उनहोंने सामूहिक सभा में गाना बंद कर दिया और जन गण मन राष्ट्रगीत बनाया गया। बंटवारे के बाद जब सिन्धी और पंजाबी दिल्ली में केम्प में रह रहे थे तब गाँधी ने वहां का दौरा किया और कहा- मुस्लिम अगर पाक को हिन्दू विहीन करते हैं तो हमें नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि हौसला रखना चाहिए
इस प्रकार गाँधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण का इतिहास रच कर दिखा दिया और कांग्रेस उनके नक़्शे कदम पर चलकर आगे बढती रही और धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा ही रच दी !


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