एक पारिवारिक समारोह में मेरे पिताश्री एम.बी.एल.निगम के साथ प्रो नन्द किशोर निगम(वास्केट में) भले ही गांधी की धोती , तेरे खातिर गहना था ..... मुझे दिखा दो बस वो फंदा, जिसे भगत सिंह ने पहना था ... चलो मान लिया कि चरखे ने ही, उन सारे अंग्रेजों को पटका था ... पर हमको दे दो वो पावन रस्सी , जिस पर मेरा बिस्मिल लटका था... हम मान रहे कि नेहरू ने ही, भारत आज़ाद कराया था ... पर हमें सुना दो फिर वो धुन, जिसे राजगुरु ने गाया था ?? चलो आजादी के महायुद्ध में, सारा कार्य तुम्हारा था .. पर हमें दिला दो वो अंतिम गोली , जिसे शेखर ने खुद को मारा था .... "1857 में जो लड़ाई शुरू की, नब्बे साल वो लड़ाई चली, और ब्रिटिश को बाहर कर दिया.. और देश आजाद हो गया, उन सभी सेनानियों को हम नमन सलाम करते हैं. हम प्रणाम करते हैं. कितने वीर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, पंडित नेहरू, भगत सिंह, राजगुरु, सभी जो फांसी पर चढ़े, क्रांतिवीर सावरकर जी, बाकी महान स्वतंत्रता सेनानी, कितने लाठियां खाई, कितनी गोलियां खाईं, कितने प्रदर्शन हुए, कितने जेल गए, कितने फांसी पर लटके....