आर.बी. एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार राजनीति भी क्या तेजी से रंग बदलती है, गिरगिट भी शायद इतनी तेजी से रंग बदल पाती । आइये, एक नज़र डालते हैं, दलित, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, जनसुविधा, महँगाई, मिलावट, साम्प्रदायिकता, खाद्य आपूर्ति, किसान आत्महत्या, क़र्ज़ में डूबता किसान, तस्करी, तुष्टिकरण, आरक्षण आदि आदि समस्याओं को लेकर भारत में कितनी पार्टियाँ बन गयी, क्या किसी समस्या का समाधान हुआ ? हाँ, इन मुद्दों पर बनी पार्टियों के नेताओं की तिजोरियाँ जरूर मोटी हो गयी। लेकिन समस्याएँ निरन्तर बढ़ रही हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसान आत्महत्या आज कोई नया मुद्दा नहीं, बहुत पुराना है। इनकी आड़ लेकर कर्जे पर ऐश करने वालों के विरुद्ध कोई आवाज़ नहीं उठाता, क्यों? आखिर कब इस स्वाँग का पर्दाफाश होगा? एक समय था, जब दिल्ली में भी गांव और खेतों की कोई कमी नहीं थी, परन्तु आज उनकी जगह ऊँची-ऊँची इमारतें बन गयी हैं, मॉल और पीवीआर आदि बन गए हैं, और सरकार अथवा बिल्डर ने यह सब बनाने के लिए उन को मोटा धन भी दिया होगा, लेकिन जब धरने की बात होगी, दिल्ली के धन्नासेठ किसान गरीब बनकर आ जाएँगे।...