इतिहास पर फिल्म निर्मित करना कोई गलत काम नहीं है। ताकि जनता को इतिहास के उन तथ्यों को जानने का अवसर मिले, जिन्हें कुंठित इतिहासकारों ने चन्द चांदी के टुकड़ों की खातिर धरती में दबा दिया है। लेकिन कुंठित इतिहास पर फिल्म को चर्चित करने के लिए इतिहास से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। फिल्म निर्मित करनी है तो वास्तविक इतिहास पर करो। क्या भारत से बाहर किसी भी देश में कोई इतिहासकार या फ़िल्मकार देश के इतिहास के साथ खिलवाड़ करने का साहस कर सकता है? लेकिन यह संभव है केवल भारत में। जहाँ आक्रमणकारियों के इतिहास का पढ़ाया जाता है, उस पर टिप्पणी करने वालों को साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता है। जैसाकि कल (जनवरी 28 को) राजस्थान में लीला भंसारी के साथ दुर्व्यवहार करने को हिन्दू आतंकवाद का नाम दे दिया गया। शर्म आती है, ऐसी ओछी मानसिकता वालों को भारतीय कहने पर। यदि किसी विदेश में ऐसी घटना घटित हुई होती, सरकार द्धारा ही इतिहास से छेड़छाड़ करने वालों पर सख्त कार्यवाही हो गयी होती। क्या कोई फ़िल्मकार या इतिहासकार राष्ट्र को यह सच्चाई बताने का साहस कर पाएगा कि "अकबर के दरबार में कोई अन...