मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर रात में खुले स्थान में परिवार और आस पड़ोस के लोगों के साथ मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर पूजा की जाती है। लोहड़ी पौष के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद माघ संक्रांति से पहली रात को होती है। लोहड़ी मुख्यत: पंजाब का पर्व है। ऐसा लगता है कि इसके प्रत्येक शब्द को लोहड़ी की पूजा के समय प्रयोग होने वाली वस्तुओं से लिया गया है, जैसे ल लकड़ी से ओह गोहा मतलब सूखे उपले और ड़ी रेवड़ी से लेकर बन गया लोहड़ी। ऐसा माना जाता है कि श्वतुर्यज्ञ का अनुष्ठान मकर संक्रांति पर होता था, संभवत: लोहड़ी उसी का अवशेष है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग सहायक होती है और यही व्यावहारिक आवश्यकता ‘लोहड़ी’ को मौसमी पर्व का स्थान देती है। ऐसे होती है पूजा इस दिन पूजा करने के लिए लकड़ियों के नीचे गोबर से बनी लोहड़ी की प्रतिमा रखी जाती है। जिसमें गटनि प्रज्जवलित करके भरपूर फसल और समृद्धि के लिए उसकी पूजा होती है। इस आग की सभी परिक्रमा करते हैं जिसके दौरान लोग तिल, मक्का और गेहूं जैसे अनाज डालते हैं। लोहड़ी पर पूजा के बाद गजक, गुड़...