ऐसे होती है पूजा
इस दिन पूजा करने के लिए लकड़ियों के नीचे गोबर से बनी लोहड़ी की प्रतिमा रखी जाती है। जिसमें गटनि प्रज्जवलित करके भरपूर फसल और समृद्धि के लिए उसकी पूजा होती है। इस आग की सभी परिक्रमा करते हैं जिसके दौरान लोग तिल, मक्का और गेहूं जैसे अनाज डालते हैं। लोहड़ी पर पूजा के बाद गजक, गुड़, मूंगफली, फुलियां, पॉपकॉर्न का प्रसाद चढ़ाया जाता हैं, फिर इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाए भी जाते हैं। इस दिन मक्की की रोटी और सरसों का साग, गन्ने के रस और चावल से बनी खीर बनाने की और पतंग उड़ाने की भी परम्परा है।
शिव और सती से प्रेरित कहानी
ऐसी भी मान्यता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि में दहन की याद में ही लोहड़ी की अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को मां के घर से इस त्योहार पर वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फल आदि भेजा जाता है। ऐसा यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति के प्रायश्चित्त के रूप में किया जाता है। इसके अलावा लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था। दुल्ला ने एक योजना के तहत लड़कियों को मुक्त करवाया और उनकी शादी भी हिन्दू लडको से करनवाने की सभी व्यवस्था भी करवाई।
ये हैं लोहड़ी के गीत
पहला गीत- ‘सुंदर मुंदरिये होय, तेरा कौन बेचारा होय। दुल्ला भट्टी वाला होय, दुल्ले धी बिआई होय। सेर शक्कर पाई होय, कुड़ी दे बोझे पाई होय, कुड़ी दा लाल हताका होय। कुड़ी दा सालु पाटा होय, सालू कौन समेटे होय।’
दूसरा गीत- ‘देह माई लोहड़ी, जीवे तेरी जोड़ी, तेरे कोठे ऊपर मोर, रब्ब पुत्तर देवे होर, साल नूं फेर आवां।
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