हमारे देश में आरक्षण पर लंबे समय से बहस चली आ रही है कि क्या विद्यालयों, उच्च शिक्षा संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण से असमानता को बढ़ावा मिल रहा है ? इस पर लोगों की अपनी-अपनी विचार धाराएं एवं दृष्टिकोण हैं। इस मामले में विरले लोग ही अपने विचारों में परिवर्तन करना चाहते हैं। यही कारण है कि आरक्षण पर देश कभी एकमत नहीं हो पाया।सवर्ण तबके के लोगों को लगता है कि अधिकारहीन लोगों को सामाजिक जन प्रतिनिधित्व के लिए सरकारी सहायता देने की कोई आवश्यकता नहीं है। आरक्षण के प्रति यह विरोध तीन आ धा रों पर है। सुशिक्षित और सवर्ण वर्ग में कुछ लोग यह मानते हैं कि विद्यालयों और नौकरियों में श्रेष्ठता के आधार पर सीट दी जानी चाहिए। इसका परोक्ष अर्थ यह है कि परीक्षाओं और साक्षात्कार में कुछ वर्गों को दी जाने वाली छूट गलत है। इस मांग के साथ वे यह भूल जाते हैं कि सदियों से दमित-शोषित वर्ग; जिसे शिक्षा, कौशल और अन्य सामाजिक एवं अर्थिक सुविधाओं से वंचित रखा गया, आज अचानक ही अधिकार संपन्न वर्गों से प्रतियोगिता में बराबर कैसे खड़ा हो जाए ?दरअसल, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन एकाएक नहीं हो जाते। इन्हें सफल हो...