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नोटों में मिले पेट की बीमारियां फैलाने वाले बैक्टीरिया

आपकी जेब में रखा नोट आपको बीमार बना सकता है। नोट टीबी, अल्जस, पेट की बीमारी जैसे रोग दे सकता है। यह बात कितना सही है?  यह सवाल छोटे व्यापारियों के देशव्यापी संगठन  'कैट'  ने वित्त मंत्री  अरुण जेटली  से पूछा है। 'कैट'  एक रिसर्च रिपोर्ट का हवाला देते हुए इस बात की जांच करने की मांग की है। कैट का कहना है कि ऐसे दावों की जांच कराकर सही तस्वीर सामने लाई जानी चाहिए। यदि दावे सही हैं तो बीमारियों से बचाव के उपाय किए जाने चाहिए।  नोटों से फैलने वाली बिमारियों से का समाधान कब होगा या कब नहीं, प्रश्न यह है कि आखिर जनता बिमारियों से बचने के लिए क्या करे? फल-सब्ज़ियाँ केमिकल से पक रही हैं, दूध, घी, मक्खन, गेहूँ, दालें और मसाले आदि सब में मिलावट, आखिर जनता क्या करे और कहाँ जाए? इन गम्भीर समस्याओं पर उपभोक्ता मंत्रालय को आगे आना चाहिए, लेकिन इस मंत्रालय को कोई चिन्ता नहीं।   रिपोर्ट में क्या है ? रिपोर्ट्स के मुताबिक करेंसी नोट हजारों लोगों के हाथों से होकर गुजरते हैं। इनमें गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोग भी शामिल हैं। इस तरह करेंसी हजारों प्रकार क...

क्या उपभोक्ता मंत्रालय सफ़ेद हाथी है?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार  न्यूज चैनलों एवं पत्र-पत्रिकाओं में सरकार द्वारा जनहित में ग्राहकों को जाग्रत करने विज्ञापन ‘‘जागो ग्राहक जागो’’ प्रसारित होता है, लेकिन भारतीय जनमानस इतना बेहोश है, या यूं कहा जाए कि अपनी मस्ती में मस्त हैं और उसको अपने हितों की एवं कटती जेब की लेशमात्र भी चिन्ता नहीं। मैं यदा-कदा बेंगलुरु एवं हैदराबाद प्रवास पर रहता हूँ। जब भी यहाँ के बाजार अथवा मॉल्स में जाता हूँ, स्पष्ट रूप से ग्राहकों को ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जेब कटवाते देखता हूँ। हैदराबाद में 21 रुपए की दूध की थैली खुलेआम 22 रूपए में बिक रही है। फूल गोभी 20 से 30 रुपए प्रति नग बिक रही है, गोभी का वज़न कितना है, कोई मायने नहीं रखता। चाहे वह 300 ग्राम का है या एक किलो से ऊपर। मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। उपभोक्ता नियमों  का होता उपहास विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश  है, जहां छोटे सिक्के चलन बंद है। जबकि दैनिक समाचार पत्र सेे लेकर रोजमर्रा की कई चीजों जैसे पैट्रोल एवं डीजल की कीमतों में उन छोटे सिक्कों की जरूरत होती है, लेकिन छोटे सिक्के चलन में न होने के कारण ग्राहक को केवल ...

आप भी पीते हैं RO या पैक्ड बोतल का पानी

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार  एक वक्त था जब हम और आप टोटियों और हैंडपंप से आने वाले पानी को यूं ही मुंह लगाकर पी लिया करते थे। हमें किसी चीज की चिंता भी नहीं रहती थी। लेकिन आज तो ऐसा पानी पीना आपके लिए किसी खतरे से कम नहीं। लेकिन बदलते परिवेश में आज सब कुछ बेमानी हो गया है। जिस समय टोटियों और हैंडपंप का पानी पीते तब सरसों का तेल और शुद्ध घी अंगीठी पर रखते ही आसपास के घर तक महक जाते थे, लेकिन आज घर की चारदीवारी में ही पता नहीं चलता, क्यों? किसी नेता ने मंथन करने का प्रयास तक करने का विचार भी नहीं किया होगा। पता नहीं, खाद्य और स्वास्थ्य मंत्रालय क्या कर रहा है? क्या है इन मन्त्रियों का काम, केवल पद लेना? जो गम्भीर चिन्ता का विषय है। चुनावों में जिस पार्टी को देखो, जनहित की बात करती आती है, लेकिन मिलावट का बाजार उतना ही उन्नति कर रहा है, जनता का स्वास्थ्य जाए भाड़ में,  इनको वोट चाहिए और जनता को लॉलीपॉप देकर अपनी जीविका और तिजोरी की चिन्ता करते नज़र आते हैं। फिर जो सरकार जनता को पीने का शुद्ध जल न दे सके, ऐसी सरकार का क्या लाभ?  अभी कु...

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shannomagan
To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)