याचना नहीं अब रण होगा
संग्राम बड़ा भीषण होगा
दिनकर की ये पंक्तियां साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद
के लिए होने वाले चुनाव पर लगभग सटीक बैठ रही है। वामपंथी लेखकों के लगभग
कब्जे वाली संस्था को इस विचारधारा से मुक्त करवाने के लिए कई लेखकों ने
संग्राम का एलान कर दिया है। जीत किसकी होगी, ये तो होने वाले चुनाव
में पता चलेगा, लेकिन तस्वीर बहुत कुछ 21 दिसंबर को हुई वर्तमान
एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक में साफ हो गयी। साहित्य अकादमी के चुनाव का
उद्घोष हो चुका है और 5 साल बाद होनेवाले इस चुनाव को लेकर साहित्यिक हलके
में बहुत हलचल है।
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष
पद को लेकर 9 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। मराठी से भालचंद्र नेमाड़े,
ओडिया से प्रतिभा राय, कन्नड़ से चंद्रशेखर कंबार, हिंदी से अरुण कमल,
लीलाधर जगूड़ी और रामशरण गौड़ और गुजराती से बलवंत जानी के अलावा दो और नाम
अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित थे. इन 9 सदस्यों के लिए साहित्य अकादमी की
आमसभा के सदस्य प्रस्ताव भेजते हैं, जिनमें से तीन का चुनाव वर्तमान
एक्जीक्यूटिव कमेटी करती है. यही तीन अध्यक्ष पद के उम्मीदवार होते हैं,
जिनका चुनाव नई आमसभा के सदस्य करते हैं. यह बात साहित्य जगत में जानबूझकर
प्रचारित की गई कि बलवंत जानी सरकार समर्थित उम्मीदवार हैं.
इस प्रचार को लेकर भी कई
लेखकों में एक खास किस्म का विरोध देखने को मिला. इस वक्त जो लेखक
एक्जीक्यूटिव में हैं और तटस्थ माने जा रहे हैं, उनका भी मानना है कि सरकार
को साहित्य अकादमी के चुनाव में दखल नहीं देना चाहिए. इस सोच की वजह से वो
जानी के पक्ष में ना जाकर साहित्य अकादमी की परंपरा की दुहाई देने में लग
गए थे और इसका नतीजा 21 की एक्जीक्यूटिव की बैठक में देखने को मिला, जब
बलवंत जानी को सिर्फ छह वोट मिल सके।
तर्क ये भी दिया गया कि
साहित्य अकादमी में अब तक जो उपाध्यक्ष होता है, वही साहित्य अकादमी का
अध्यक्ष होता आया है। इस लिहाज से देखें, तो कंबार की दावेदारी मजबूत दिखाई
दे रही थी और उनको सबसे ज्यादा वोट यानि 22 लोगों का समर्थन मिला। हिन्दू
एक समृद्ध कबाड़ जैसी विवादस्पद किताब लिखने वाले मराठी लेखक भालचंद्र नेमाड़े
को लेकर ज्यादा उत्साह की वजह जानी को सरकारी उम्मीदवार बनाने का
दुष्प्रचार रहा। भालचंद्र नेमाडे ने एक्जीक्यूटिव में बाजी मारते हुए 21
वोट हासिल किए और अब वो अध्यक्ष पद के चुनाव में मौजूदा उपाध्यक्ष
चंद्रशेखर कंबार के सामने होंगे।
प्रतिभा राय की तो उनको
महिला होने की वजह से एक्जीक्यूटिव कमेटी से चुनाव लड़ने की हरी झंडी मिली
और उनका नाम भी एक्जीक्यूटिव कमेटी ने क्लियर कर दिया. उनको 16 सदस्यों का
समर्थन हासिल हुआ. हिंदी के वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने पहले ही चुनाव से नाम
वापस ले लिया था. वहीं लीलाधर जगूड़ी को सिर्फ तीन वोट मिले और प्रो शफी शौक
को एक वोट. हिंदी भाषा के लेखक विश्वनाथ तिवारी अध्यक्ष पद से रिटायर हो
रहे हैं, लिहाजा हिंदी के उम्मीदवार को समर्थन मिलना कठिन था.
दरअसल, इस बार अध्यक्ष के
चुनाव से ज्यादा दिलचस्प अध्यक्ष के नामांकन का चुनाव हो गया था. अगर
एक्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्यों के पूर्व के ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी
प्रतिबद्धता पर विचार करते हैं, तो कथित तौर पर उपाध्यक्ष कंबार के विरोध
में छह या सात लोग ही नजर आ रहे थे. चूंकि एक्जीक्यूटिव कमेटी में तीन
लोगों के नाम पर विचार होना है, इसलिए हर सदस्य को तीन लोगों के चयन का
अधिकार होगा. यहीं पर खेल होने की गुंजाइश थी.
अगर किसी उम्मीदवार को लोग
वोट डाल भी देते हैं, तो उसके साथ-साथ अन्य दो उम्मीवारों का भी समर्थन कर
देने से तस्वीर बदल जाती है. एक्जीक्यूटिव बोर्ड मे 28 सदस्य होते हैं,
जिनमें मौजूदा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और भारत सरकार के द्वारा नामित दो
सदस्यों के अलावा संविधान से मान्यता प्रापत 22 भाषाओं के प्रतिनिधि होते
हैं. साहित्य अकादमी की बेवसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, भारत सरकार
द्वारा नामित सदस्य हैं, प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार और संस्कृति
मंत्रालय के संयुक्त सचिव.
जिस तरह से इस बार साहित्य
अकादमी के अध्यक्ष के चुनाव को लेकर सरगर्मी है, उसके पीछे कई कारण हैं. एक
तो जिस तरह से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर चंद लेखकों ने साहित्य अकादमी
पुरस्कार वापसी का पूरा खेल खेला था और बाद में उसकी हवा निकल गई थी, उसको
लेकर वामपंथी और सरकार की विचारधारा का विरोध करनेवाले लेखकों को साहित्य
अकादमी के अध्यक्ष के चुनाव में एक अवसर दिखाई दे रहा है. वो साहित्य
अकादमी के बहाने सरकार के विरोध की राजनीति को हवा देना चाह रहे हैं.
एक्जीक्यूटिव की बैठक के
पहले तो कई लेखक ये भी दावा कर रहे थे कि भाजपा भले ही गुजरात में चुनाव
जीत जाए, लेकिन जश्न के लिए वक्त दो या तीन दिन का ही मिलेगा, क्योंकि
साहित्य अकादमी में बलंवत जानी को अध्यक्ष पद के लिए नामांकन नहीं मिलेगा.
अब मंशा जब इस तरह की हो, तो सोचा जा सकता है कि चुनाव में क्या क्या दांव
पर लगा होगा.
साहित्य अकादमी की मौजूदा
जनरल काऊंसिल की बैठक 20 और 21 दिसबंर को दिल्ली में आयोजित की गई थी. पहले
दिन वर्तमान जनरल काउंसिल ने अगले आम सभा के नए सदस्यों का चुनाव किया.
साहित्य अकादमी के संविधान के मुताबिक आमसभा में भारत सरकार को 5 सदस्यों
को नामित करने का अधिकार है. जिनमें से एक-एक संस्कृति विभाग, सूचना और
प्रसारण मंत्रालय और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से होते हैं. दो अन्य सदस्यों
को संस्कृति मंत्री नामित करते हैं.
हर राज्य और संघ शासित प्रदेशों से भी 3-3 नामांकन मंगाए जाते हैं,
जिनमें से एक का चुनाव किया जाता है. इनके अलावा वर्तमान जनरल काउंसिल के
पास साहित्य अकादमी से मान्यता प्राप्त प्रत्येक भाषा से एक-एक विद्वान को
अगले जनरल काऊंसिल के लिए चुनने का अधिकार होता है. इतना ही नहीं 20
विश्वविद्यालयों और पोस्ट ग्रेजुएट विभागों के प्रतिनिधियों को भी चुना
जाता है.
इसके अलावा जनरल काउंसिल को
अगली आमसभा के लिए 8 प्रतिनिधि को नामित करने का अधिकार भी होता है.
प्रकाशकों की संस्थाओं से जो नाम आते हैं, उनमें से भी एक का चुनाव किया
जाता है. संगीत नाटक अकादमी और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की भी
नुमाइंदगी होती है. 20 दिसबंर को होनेवाली बैठक में इन सदस्यों का ही चयन
हुआ. अगले दिन यानि 21 दिसंबर को एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक हुई, जिसमें
अध्यक्ष पद के तीन उम्मीदवारों का चयन हुआ.
दरअसल पुरस्कार वापसी मुहिम
के बाद से ही साहित्य अकादमी पर कब्जे को लेकर वामपंथी लेखकों ने कमर कस ली
थी. पिछले एक साल से उनकी तैयारी चल रही थी और विश्वविद्यालयों से नाम
भिजवाने से लेकर संस्थाओं के नुमाइंदों के नाम भी मंगवाने का संगठित प्रयास
किया गया जा रहा था. वामपंथी लेखकों को ये आशंका थी कि भाजपा शासित
राज्यों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जो तीन नाम आएंगे, उनके आधार पर
अगले जनरल काऊंसिल में सरकार समर्थक लेखकों का दबदबा होगा. लिहाजा उन्होंने
भी अपनी गोटियां सेट करनी शुरू कर दी थी.
गैर भाजपा शासित राज्यों के
विश्वविद्यालयों, संस्थाओं और प्रकाशकों की संस्था से ऐसे नाम मंगवाए गए थे
जो कि अगर वामपंथी नहीं हों, तो सरकार विरोधी हों या फिर राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ से दूरी रखते हों. उनकी ये मुहिम लंबे समय से चल रही थी,
जिसमें उनका अनुभव उनका साथ दे रहा था. साहित्य अकादमी के एक पूर्व अध्यक्ष
भी इस काम में उनकी मदद कर रहे थे. वामपंथ और दक्षिणपंथ के लेखकों की ये
लड़ाई इतनी दिलचस्प हो गई है कि पूरे देश के साहित्यक हलके में साहित्य
अकादमी की दिल्ली में होनेवाली दो दिनों की बैठक पर सबकी नजरें टिकी थीं।जिस दिन साहित्य अकादमी वामपंथ के चुंगल से मुक्त हो गया, देश का वास्तविक इतिहास स्वतः उजागर होने लगेगा। इन्ही वामपंथियों ने चंद चाँदी के सिक्कों के लालच में आकर देश के वास्तविक इतिहास को ही धूमिल कर मुग़ल आतताइयों का गुणगान भारतवासियों को पढ़ने को विवश किया।

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