लोकतन्त्र एक ऐसी शासन प्रणाली है-जो 'सम्मोहन' के जादुई खेल से चलायी जाती है। कोई भी ऐसा राजनीतिज्ञ जो इस 'सम्मोहन' की जादुई क्रिया को जानता हो-देर तक किसी देश पर शासन कर सकता है। नरेन्द्र मोदी ने अपने इस सम्मोहन से भाजपा को शिखर तक तो पहुंचा दिया, लेकिन जो साथ अपने सहयोगियों से मिलना चाहिए था, पूर्णरूप से नहीं मिल पा रहा। ऐसा नहीं है कि किसी न नहीं मिल रहा, केवल कुछ ही लोगों का सहयोग मिल रहा है। क्योकि इतने वर्षों तक उन्हें केवल मालपुए खाने की आदत पड़ी हुई थी। अभी भी देख लो, फेसबुक और व्हाट्सअप के जरिए फोटो डाल उच्च पदाधिकारियों की आँखों में धूल झोंकी जा रही है। दिल्ली में ही देख लो, पता नहीं कितने मंडल बिखड़े पड़े हैं। चुनाव के समय पुरानों को पार्टी में उनकी भक्ति को जगा,उच्च पदाधिकारियों के सामने भीड़ जमा करवा देंगे। खैर आते हैं असली मुद्दे पर:
भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पश्चात नेहरूजी देश के प्रधानमंत्री बने तो उनका व्यक्तित्व तो जादुई नहीं था-पर वह 'सम्मोहन' पैदा करने के जादू को अवश्य जानते थे, जिससे लोग उनके प्रति आकर्षित हुए और मजबूती के साथ उनसे जुड़ गये। उनका जादू चल गया और उनके प्रति यह धारणा देश में बन गयी कि वे 'जादुई व्यक्तित्व' के धनी हैं। उनके पश्चात शास्त्रीजी 'सम्मोहन' क्रिया को नहीं जानते थे-पर वे गीता के 'निष्काम कर्मयोग' को अवश्य जानते थे और उनके इसी गुण ने उन्हें देश का महानायक बना दिया। भारत की राजनीति के लिए उनका यह 'निष्काम कर्मयोग' ही वह विशेष गुण था-जिसे वास्तविक अर्थों में 'भारतीय राजधर्म' कहा जा सकता था। 'निष्काम कर्मयोग' राजनीति का अभिन्न अंग है, इसे अपनाने की प्रक्रिया शास्त्री जी के लघुकाल में चली और उनकी संदेहास्पद मृत्यु के साथ ही हमसे अनंत में विलीन हो गयी।
इंदिरा गांधी आयीं तो वह भीतर से सदा भयभीत रहीं, प्रारम्भ में सिंडिकेट से तो बाद में पंजाब के आतंकियों से। सिंडिकेट से डरकर देश में आपातकाल लगा दिया और आतंकियों से डरकर ब्लू स्टार ऑप्रेशन, कर बैठीं। डरते-डरते कड़े निर्णय लेती रहीं और देश की 'आयरन लेडी' बन गयीं। फिर भी यह माना जा सकता है कि उनके पिता नेहरू और उनके स्वयं के शासनकाल में देश को सम्मान मिला और कई क्षेत्रों में देश ने उल्लेखनीय उन्नति की। इंदिरा जी ने भी देश की जनता को सम्मोहन की क्रिया से बांध लिया था। लोगों ने उन्हें एक बार हराया भी पर फिर भी वह सत्ता में लौट आयीं और जीवन के अंतिम क्षणों तक तक देश की प्रधानमंत्री रहीं।
उनके पश्चात देशव्यापी छवि रखने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अटल जी बने। राजीव गांधी एक शरीफ व्यक्ति थे, वह ना तो देश की जनता में सम्मोहन पैदा कर पाये और ना ही देश की राजनीति में 'निष्काम कर्मयोग' की ओर कोई झुकाव कर पाये। अटल जी की भाजपा में एक उदार छवि रही और वह एक अच्छे वक्ता होने के कारण देश की जनता को अपने साथ जोडऩे में सफल रहे। उनके इन दो गुणों के कारण ही भाजपा सत्ता में आयी और वे देश के पी.एम. बन सके।
अब बारी आयी मनमोहन सिंह और श्री मोदी की। डा. मनमोहन सिंह गिरती हुई कांग्रेस की आपात पसंद थे, उनके पास कुछ भी नहीं था। वह केवल एक नौकरशाह थे और नौकरशाह होने के कारण वह अपने 'बॉस' को खुश रखना जानते थे। उन्होंने सोनिया गांधी को ही नहीं राहुल गांधी जैसे अति कनिष्ठ (अधिकारी) को भी अपना बॉस माना और अपने इसी गुण के कारण देश पर दस वर्ष शासन कर गये। शेष प्रधानमंत्री परिस्थितियों की पैदाइश थे, उन्होंने जितनी देर भी शासन किया उनके लिए वह पर्याप्त से भी अधिक था।
जहां तक प्रधानमंत्री श्री मोदी का प्रश्न है, गोधरा काण्ड को उछाल कर कांग्रेस और विरोधियों ने ही मोदी का एक सम्मानित व्यक्तित्व बना दिया। जनता में उनका सम्मोहन उन पर उछाली हर कीजड़ निखरती गयी। जनमानस के सामने कोई दूसरा प्रधानमंत्री योग्य नेता नज़र नहीं रहा था। सोनिया, राहुल और प्रियंका गाँधी संविधान के आधार पर प्रधानमंत्री योग्य नहीं। इस बात से समस्त नेता समाज भलीभांति परिचित है। तो उन्होंने जनता में नेहरूकाल की सी सम्मोहन की क्रिया को उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की। यह उनकी बड़ी उपलब्धि रही। नेहरूकाल में देश में 35 से 40 करोड़ नागरिक थे, जबकि मोदी के आने तक ये नागरिक तीन से चार गुणे बढ़ गये। लोगों की शिक्षा भी नेहरूकाल से कई गुणा बढ़ गयी। लोग अपना हित व अहित समझने लगे कि किस व्यक्ति के हाथ में देश को सौंपना उचित होगा? मोदी के लिए कोई 'गांधी' नहीं था-जो नेहरू को देश की अनिच्छा के उपरांत भी गद्दी दे देता। मोदी को स्वयं ही 'गांधी' बनना था और स्वयं ही 'नेहरू' बनना था और वह बन गये। उनके 'गांधी' अर्थात आडवाणी को गम्भीर सदमा लगा कि उनके ना चाहते हुए भी 'भाजपा का नेहरू' देश का पीएम क्यों बन गया? आडवाणी भूल गये कि 1947 में गांधी के नेहरू को देश नहीं चाहता था, पर वह स्वयं चाहते थे और 2014 के 'भाजपा के नेहरू' अर्थात मोदी को देश चाहता था पर 'भाजपा का गांधी' नहीं चाहता था। देश की जनता की जीत हुई और मोदी प्रधानमंत्री बन गये। उनको सम्मोहन और निष्काम कर्मयोग दोनों को निभाना आता है। उन्होंने अपना जादू चला रखा है-यह भी उन्होंने सिद्घ किया है और उन्होंने अथक परिश्रम करके यह भी दिखाया है कि यह 'निष्काम कर्मयोगी' हैं। फिर अडवाणी का राममन्दिर पर उप-प्रधानमंत्री बनने पर चुप्पी साधे रहने से जनता में उनकी छवि धूमिल हो गयी थी।
इस सबके उपरांत भी देश की जनता की समस्याएं जस की तस हैं। माना जा सकता है कि देश की जनता की समस्याओं का कभी भी पूर्ण समाधान नहीं हो सकता। कोई भी प्रधानमंत्री देश की समस्याओं का पूर्ण समाधान कभी दे भी नहीं पाएगा, परंतु मोदी से अपेक्षा थी कि वे अधिकतम समाधान देंगे। उन्होंने देश का वित्तमंत्री अरूण जेटली को बना दिया। यह वही अरूण जेटली हैं-जिन्हें देश की जनता ने 2014 में सांसद बनने के योग्य भी नहीं समझा था और उन्हें चुनावों में हरा दिया था। अब उनकी पैसा घसेटू नीति के चलते एक मतदाता के रूप में स्वयं भी शायद अपने आपको वोट न दें। वैसे बेशर्मी का तो कोई इलाज नहीं।
अब इन जेटली साहब की नीतियों के चलते सारा जोर व्यक्ति से अधिक से अधिक टैक्स वसूलने पर दिया जा रहा है। क्योकि जेटली या पार्षद से लेकर किसी मंत्री को टैक्स देना नहीं पड़ता, तो इन्हे क्या मालूम कि हर बात पर टैक्स का भार क्या होता है? जेटली देश के लोगों का रक्त चूस रहे हैं और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी शांत हैं। देश के तीन लाख कारखाने बंद हो गये हैं, यह जेटली की जीत नहीं, हार है। क्योंकि इन कारखानों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी भी घर बैठ गये हैं। कितनी ही गृहिणियों को घर का चूल्हा जलाने में समस्या होने लगी है। लोग अपनी ही कमाई को भी कहीं सही जगह लगाने से इस समय बच रहे हैं, किसान अपनी मुआवजा राशि को भी छुपा रहा है, उसे भी वह मन चाहे ढंग से व्यय नहीं कर सकता। यह स्थिति मोदी सरकार के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती।
आज देश के मतदाता को विपक्ष के पास राहुल जैसा अपरिपक्व नेता दिखायी दे रहा है-इसलिए वह भाजपा के साथ है। राहुल गांधी की उपस्थिति भाजपा को लाभ दे रही है, यदि कांग्रेस की ओर से कोई एक 'मोदी' रण के बीच आकर यह कह दे कि वह कांग्रेस की ओर से अब से मुस्लिम तुष्टिकरण नहीं करेगा, धारा 370 को समाप्त कराने में वह देश की जनता की भावनाओं का सम्मान करेगा और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कराना उसका भी संकल्प होगा, साथ ही समान नागरिक संहिता लागू कराना और भारत को विश्वगुरू बनाने की दिशा में ठोस कार्य करना उसका उद्देश्य होगा-तो सारी स्थिति में व्यापक परिवर्तन आ जाएगा।
जेटली ने पूर्व वित्तमंत्री रहे यशवंत सिन्हा और पी. चिदंबरम को आंकड़ों के मकडज़ाल में फांसकर उनका मुंह बंद कर दिया है। उनका आंकड़ों का जादू चल गया है-पर जमीन का सच ये है कि देश में आम मतदाता की परेशानियां बढ़ी हैं-घटी नहीं हैं। देश में भ्रष्टाचार पूर्ववत है और नौकरशाही पूर्व की भांति ही मौज ले रही है। कांग्रेस के शासनकाल में काला धन बाजार में घूमता रहता था। जिससे लोग निर्माण आदि के कार्य कराते थे। उससे मजदूरों को काम मिलता था। अब यह सारी प्रक्रिया रूक गयी है। जेटली जी कोई ऐसा आंकड़ा दें-जिससे कालाधन तो रूके ही साथ ही आम आदमी को रोजगार भी मिले और बेरोजगार हुए लोगों को आत्महत्या करने से बचाया जा सके। समय तानाशाही का नहीं है-समय लोकतंत्र का है। अकेले मोदी के नाम से ही भाजपा की नैया पार नहीं लगेगी। अब जनता जेटली जैसे मंत्रियों के कार्यों का हिसाब भी मांगेगी। भाजपा को 2019 की नहीं 2024 की चिन्ता करनी चाहिए।
गुजरात में 14 सीटों पर भाजपा केवल नोटा के कारण हारी, देखे तालिका
हार का
सीट नोटा को वोट अन्तर
1.Chota 5870 1093
Udaipur
2.Dangs 2184 768
3.Dasada 3796 3728
4.Deodar 2988 972
5.Dhanera 3214 2518
6.Kaprada(S 3868 170
7.Mansa 3000 524
8.Modasa 3515 147
9.Morbi 3069 3069
10.Morva 4962 4366
Hadaf
11.Sojitra 3112 2388
12.Talaja 2918 1779
13.Wankner 3170 1361
14.Lunawada 3419 3200
गुस्सा तो था लेकिन जनता भाजपा को हटाना नही, सबक देना चाहती थी। कांग्रेस के प्रति कोई प्रेम नही था। अब कर्नाटक में भी ऐसी ही सूरत आती दिख रही है। उसके पीछे राजस्थान और मध्य प्रदेश चुनाव तैयार हैं और जेटली की यही खूनचूस नीति रही, कोई बड़ी बात नहीं की भाजपा के हाथ से दोनों तो नहीं, बल्कि एक राज्य जरूर निकल जाएगा।
विपक्ष में बैठकर खूब महंगाई का रोना-रोते थे और अब क्या हुआ? रसोई गैस 741 की हो गयी। जेटली साहब जनता की मत सुनो, बस मतदाता के बीच रहने वाले भाजपा कार्यकर्ता और पदाधिकारियों से ही पूछ लो, दूध का दूध और पानी का पानी आपके और सरकार के सामने आ जाएगा। रस्सी उतनी ही खींचो जितनी खिंच सके, ज्यादा खींचोगे टूट जाएगी।
जेटली साहब यह सब आरोप किसी विपक्षी का नहीं, बल्कि यह वेदना भाजपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की है, जो जनता के बीच जाकर पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। दो वर्ष निरन्तर उनकी वेदना सुनते-सुनते कान पक गए। किसी पार्टी मीटिंग में बोलने से डरते है कि पार्टी से निलम्बित न कर दिया जाऊँ।
भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पश्चात नेहरूजी देश के प्रधानमंत्री बने तो उनका व्यक्तित्व तो जादुई नहीं था-पर वह 'सम्मोहन' पैदा करने के जादू को अवश्य जानते थे, जिससे लोग उनके प्रति आकर्षित हुए और मजबूती के साथ उनसे जुड़ गये। उनका जादू चल गया और उनके प्रति यह धारणा देश में बन गयी कि वे 'जादुई व्यक्तित्व' के धनी हैं। उनके पश्चात शास्त्रीजी 'सम्मोहन' क्रिया को नहीं जानते थे-पर वे गीता के 'निष्काम कर्मयोग' को अवश्य जानते थे और उनके इसी गुण ने उन्हें देश का महानायक बना दिया। भारत की राजनीति के लिए उनका यह 'निष्काम कर्मयोग' ही वह विशेष गुण था-जिसे वास्तविक अर्थों में 'भारतीय राजधर्म' कहा जा सकता था। 'निष्काम कर्मयोग' राजनीति का अभिन्न अंग है, इसे अपनाने की प्रक्रिया शास्त्री जी के लघुकाल में चली और उनकी संदेहास्पद मृत्यु के साथ ही हमसे अनंत में विलीन हो गयी।
इंदिरा गांधी आयीं तो वह भीतर से सदा भयभीत रहीं, प्रारम्भ में सिंडिकेट से तो बाद में पंजाब के आतंकियों से। सिंडिकेट से डरकर देश में आपातकाल लगा दिया और आतंकियों से डरकर ब्लू स्टार ऑप्रेशन, कर बैठीं। डरते-डरते कड़े निर्णय लेती रहीं और देश की 'आयरन लेडी' बन गयीं। फिर भी यह माना जा सकता है कि उनके पिता नेहरू और उनके स्वयं के शासनकाल में देश को सम्मान मिला और कई क्षेत्रों में देश ने उल्लेखनीय उन्नति की। इंदिरा जी ने भी देश की जनता को सम्मोहन की क्रिया से बांध लिया था। लोगों ने उन्हें एक बार हराया भी पर फिर भी वह सत्ता में लौट आयीं और जीवन के अंतिम क्षणों तक तक देश की प्रधानमंत्री रहीं।
अब बारी आयी मनमोहन सिंह और श्री मोदी की। डा. मनमोहन सिंह गिरती हुई कांग्रेस की आपात पसंद थे, उनके पास कुछ भी नहीं था। वह केवल एक नौकरशाह थे और नौकरशाह होने के कारण वह अपने 'बॉस' को खुश रखना जानते थे। उन्होंने सोनिया गांधी को ही नहीं राहुल गांधी जैसे अति कनिष्ठ (अधिकारी) को भी अपना बॉस माना और अपने इसी गुण के कारण देश पर दस वर्ष शासन कर गये। शेष प्रधानमंत्री परिस्थितियों की पैदाइश थे, उन्होंने जितनी देर भी शासन किया उनके लिए वह पर्याप्त से भी अधिक था।| 2012 में पेट्रोल मूल्य वृद्धि पर भाजपा का प्रदर्शन |
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पहले उत्तर प्रदेश में लग रहा था कि कांग्रेस केे लिए इस बार राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी यहां से जिताना संभव नहीं होगा-पर अब ऐसा नहीं है। आज कांग्रेस की स्थिति में सुधार है, और लगता है कि कांग्रेस अपनी वर्तमान 44 लोकसभाई सीटों को 88 या 100 के ऊपर भी कर सकती है। भारत कांग्रेस विहीन न होकर 'कांग्रेस की ओर चलो' की राह पर यदि चलता है तो इसमें अरूण जेटली की रक्त निचोडऩे वाली आर्थिक नीतियां अधिक जिम्मेदार होंगी। अभी भी समय है, प्रधानमंत्री मोदी जेटली से जितनी जल्दी हो वित्त मंत्रालय किसी अनुभवी व्यक्ति को दें, यदि वर्तमान सीटों को बनाए रखना है। गुजरात में देख ही लिया, कि किसी तरह इज्जत बच गयी, वरना नैय्या तो डूब ही गयी थी। ये बहाना कि पाटीदार आंदोलन और राहुल गाँधी का मन्दिरों के चक्कर काटना तो मात्र डूबते को तिनके का सहारा था, इससे ज्यादा और कुछ नहीं। असलियत में जनता टैक्स और रोज बदलती नीतियो से ज्यादा दुखी हो रही है। जिस तरह अकेला चना भाड़ नहीं फूंक सकता, ठीक उसी भाँति अकेले मोदी कुछ नहीं कर सकते। यह मंत्रिमंडल का काम है, मोदी के साथ कदम से कदम मिलाए। मोदी किसी आलोचना को अपने गले का हार बनाने में सक्षम है, और यह खूबी मोदी मंत्रिमंडल में नहीं। गुजरात में सरकार बनने में मोदी ही की मुख्य भूमिका है। अन्यथा जिसको देखो पद लालसा के पीछे भाग रहा था और आज भी भाग रहा है।
सैनिटरी पैड पर GST लगाने में शर्म नहीं आई
जल्द ही अक्षय कुमार बॉलीवुड एक्टर की एक फिल्म पैडमैन सिनेमाघरों मे आने वाली है। इस फिल्म सेनेटरी नैपकीन के मुद्दे को लेकर बनी है। अब जिस का असर औरतों मे दिख रहा है। महिलाओं ने हज़ार सेनेटरी नैपकीन प्रधानमंत्री को भेजने की तैयारी कर ली है। साथ ही इन नैपकिन पर मैसेज भी लिखा हुआ है। इसकी वजह है महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दिनों मे उपयोग की जाने वाली सेनेटरी नैपकीन को भी जीएसटी के दायरे मे लाए जाने से उसकी मूल्य बढ़ गई है।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर की महिलाओं ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ सेनेटरी नैपकीन को कर मुक्त करने के लिए अभियान चलाया है। और साथ ही फैसला लिया है कि महिलाओं के हस्ताक्षरित एक हजार नैपकीन अथवा पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री को भेजेंगी। ग्वालियर निवासी प्रीति देवेंद्र जोशी ने कहाकि एक ओर तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वच्छता अभियान चला रहे हैं अथवा दूसरी ओर सेनेटरी नैपकीन को लग्जरी सामान मे शामिल किए हुए है। किशोरियों से लेकर 40 वर्ष की उम्र तक हर महिला को हर महीने चार-पांच दिनों तक इसकी अवश्कता पड़ती है।
और कहाकि सेनेटरी नैपकीन प्रथम से ही महंगा था, जिस के कारण हर महिला नैपकीन आसानी से नहीं ले पाती थीं। अब नए कर लग जाने से और भी महंगा हो गया है। ऐसे मे सेनेटरी नैपकीन का उपयोग मध्यवर्ग की महिलाएं तक नहीं कर पाएंगी। गरीब परिवार की महिलाएं तो इसे खरीदने की सोच भी नहीं सकतीं।
इस अभियान का समर्थन करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता हरिमोहन भसनेरिया ने कहाकि कई महिलाओं ने महंगा होने के बाद से इन नैपकीन का उपयोग करना ही बंद कर दिया है। वे फटे-पुराने कपड़े के टुकड़े से काम चला लेती है। इससे संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। जब घर की महिला ही स्वस्थ्य नहीं रहेगी, संक्रमणग्रस्त हो जाएगी, तो परिवार का क्या हाल होगा।
इस अभियान से जुड़ीं उषा धाकड़ ने कहाकि इस अभियान के जरिए किशोरियों, युवतियों व महिलाओं से नैपकीन पर उनका नाम अथवा संदेश लिखवाया जा रहा है। अभियान का पहला चरण पांच मार्च तक चलेगा। पोस्टकार्ड के साथ हस्ताक्षर युक्त एक हजार पैड प्रधानमंत्री को भेजकर हम मांग करेंगे कि सेनेटरी नैपकीन पर लागू 12% जीएसटी सहित अन्य करों को खत्म किया जाए।
जारी किए गए महिलाओं द्वारा पोस्टर मे इस बात का साफ उल्लेख हैकि देश मे महिलाओं की बहुत बड़ी आबादी पैड का उपयोग नहीं कर पाती। कई तो ऐसी हैं जो इसके बारे मे जानती तक नहीं। ग्रामीण महिलाओं मे संक्रमण फैलने मे उनकी अज्ञानता भी बड़ा कारण है। सरकार को हर महिला को सेनेटरी नैपकीन नि:शुल्क मुहैया कराना चाहिए, मगर उसे लग्जरी आइटम बनाकर उन्हें स्वच्छ रहने से वंचित किया जा रहा है।
इस अभियान से जुड़ीं उषा धाकड़ ने कहाकि इस अभियान के जरिए किशोरियों, युवतियों व महिलाओं से नैपकीन पर उनका नाम अथवा संदेश लिखवाया जा रहा है। अभियान का पहला चरण पांच मार्च तक चलेगा। पोस्टकार्ड के साथ हस्ताक्षर युक्त एक हजार पैड प्रधानमंत्री को भेजकर हम मांग करेंगे कि सेनेटरी नैपकीन पर लागू 12% जीएसटी सहित अन्य करों को खत्म किया जाए।
जारी किए गए महिलाओं द्वारा पोस्टर मे इस बात का साफ उल्लेख हैकि देश मे महिलाओं की बहुत बड़ी आबादी पैड का उपयोग नहीं कर पाती। कई तो ऐसी हैं जो इसके बारे मे जानती तक नहीं। ग्रामीण महिलाओं मे संक्रमण फैलने मे उनकी अज्ञानता भी बड़ा कारण है। सरकार को हर महिला को सेनेटरी नैपकीन नि:शुल्क मुहैया कराना चाहिए, मगर उसे लग्जरी आइटम बनाकर उन्हें स्वच्छ रहने से वंचित किया जा रहा है।
महिला जागृति अभियान में लगे सामाजिक कार्यकर्ता हरिमोहन के मुताबिक, इस अभियान मे मध्य प्रदेश के अलावा बिहार, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रदेशों की महिलाओं की भी हिस्सेदारी बढ़ रही है।
रूपरेखा के तहत 5 मार्च को एक हजार नैपकीन प्रधानमंत्री को पोस्टकार्ड के साथ भेजे जाएंगे. दूत्य चरण मे एक लाख अथवा तीसरे चरण मे पांच लाख नैपकीन भेजे जाएंगे।
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माना जा सकता है कि मोदी 2019 में प्रधानमंत्री बन सकते हैं, और हमारा मानना है कि वह देश के प्रधानमंत्री पुन: बनने भी चाहिएं, परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था को एक व्यक्ति को सौंपकर वह निश्चिंत होकर बैठ जाएं। मोदीजी बढ़ते राजस्व से खुश तो हो सकते है। लेकिन जिस तरह अपनी प्रेस कांफ्रेंस में आंकड़ों का जाल बिछा कर भ्रमित करते, शायद वही भ्रमित आंकड़े मोदी की राह में फूल नहीं काँटे बिछा रहे हैं। यह किसी और का मत नहीं, बल्कि भाजपा के ही कुछ पदाधिकारियों का है, जो पेशे से व्यापारी भी हैं।और 2019 से पहले गुजरात के विधानसभा चुनाव हमें में बहुत कुछ बता दिया हैं कि हवा का रूख क्या है?पहले उत्तर प्रदेश में लग रहा था कि कांग्रेस केे लिए इस बार राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी यहां से जिताना संभव नहीं होगा-पर अब ऐसा नहीं है। आज कांग्रेस की स्थिति में सुधार है, और लगता है कि कांग्रेस अपनी वर्तमान 44 लोकसभाई सीटों को 88 या 100 के ऊपर भी कर सकती है। भारत कांग्रेस विहीन न होकर 'कांग्रेस की ओर चलो' की राह पर यदि चलता है तो इसमें अरूण जेटली की रक्त निचोडऩे वाली आर्थिक नीतियां अधिक जिम्मेदार होंगी। अभी भी समय है, प्रधानमंत्री मोदी जेटली से जितनी जल्दी हो वित्त मंत्रालय किसी अनुभवी व्यक्ति को दें, यदि वर्तमान सीटों को बनाए रखना है। गुजरात में देख ही लिया, कि किसी तरह इज्जत बच गयी, वरना नैय्या तो डूब ही गयी थी। ये बहाना कि पाटीदार आंदोलन और राहुल गाँधी का मन्दिरों के चक्कर काटना तो मात्र डूबते को तिनके का सहारा था, इससे ज्यादा और कुछ नहीं। असलियत में जनता टैक्स और रोज बदलती नीतियो से ज्यादा दुखी हो रही है। जिस तरह अकेला चना भाड़ नहीं फूंक सकता, ठीक उसी भाँति अकेले मोदी कुछ नहीं कर सकते। यह मंत्रिमंडल का काम है, मोदी के साथ कदम से कदम मिलाए। मोदी किसी आलोचना को अपने गले का हार बनाने में सक्षम है, और यह खूबी मोदी मंत्रिमंडल में नहीं। गुजरात में सरकार बनने में मोदी ही की मुख्य भूमिका है। अन्यथा जिसको देखो पद लालसा के पीछे भाग रहा था और आज भी भाग रहा है।
जेटली ने पूर्व वित्तमंत्री रहे यशवंत सिन्हा और पी. चिदंबरम को आंकड़ों के मकडज़ाल में फांसकर उनका मुंह बंद कर दिया है। उनका आंकड़ों का जादू चल गया है-पर जमीन का सच ये है कि देश में आम मतदाता की परेशानियां बढ़ी हैं-घटी नहीं हैं। देश में भ्रष्टाचार पूर्ववत है और नौकरशाही पूर्व की भांति ही मौज ले रही है। कांग्रेस के शासनकाल में काला धन बाजार में घूमता रहता था। जिससे लोग निर्माण आदि के कार्य कराते थे। उससे मजदूरों को काम मिलता था। अब यह सारी प्रक्रिया रूक गयी है। जेटली जी कोई ऐसा आंकड़ा दें-जिससे कालाधन तो रूके ही साथ ही आम आदमी को रोजगार भी मिले और बेरोजगार हुए लोगों को आत्महत्या करने से बचाया जा सके। समय तानाशाही का नहीं है-समय लोकतंत्र का है। अकेले मोदी के नाम से ही भाजपा की नैया पार नहीं लगेगी। अब जनता जेटली जैसे मंत्रियों के कार्यों का हिसाब भी मांगेगी। भाजपा को 2019 की नहीं 2024 की चिन्ता करनी चाहिए।हार का
सीट नोटा को वोट अन्तर
1.Chota 5870 1093
Udaipur
2.Dangs 2184 768
3.Dasada 3796 3728
4.Deodar 2988 972
5.Dhanera 3214 2518
6.Kaprada(S 3868 170
7.Mansa 3000 524
8.Modasa 3515 147
9.Morbi 3069 3069
10.Morva 4962 4366
Hadaf
11.Sojitra 3112 2388
12.Talaja 2918 1779
13.Wankner 3170 1361
14.Lunawada 3419 3200
गुस्सा तो था लेकिन जनता भाजपा को हटाना नही, सबक देना चाहती थी। कांग्रेस के प्रति कोई प्रेम नही था। अब कर्नाटक में भी ऐसी ही सूरत आती दिख रही है। उसके पीछे राजस्थान और मध्य प्रदेश चुनाव तैयार हैं और जेटली की यही खूनचूस नीति रही, कोई बड़ी बात नहीं की भाजपा के हाथ से दोनों तो नहीं, बल्कि एक राज्य जरूर निकल जाएगा।
जेटली शायद जनता को मूर्ख या पागल समझते हैं। उनको नहीं शायद यह नहीं मालूम कि मोदी ने जनता की आंखें खोल दी हैं। दिन-प्रतिदिन ब्याज दर कम हो रही है, जिस कारण अब बैंक कर्मचारी स्वयं म्यूच्यूअल फण्ड में पैसा रखने की सलाह देते नज़र आ रहे हैं, जो अब से पहले कभी नहीं सुना गया था।
समाचारों के बाजार में चर्चा है कि बैंक खाताधारियों से रूपए जमा करवाने, निकलवाने, पासबुक में प्रविष्टि करवाने और अन्य सेवाओं का शुल्क लिया जाएगा। हालाँकि इस समाचार का खंडन कर दिया गया है, लेकिन यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि बिना चिंगारी के कभी धुआँ नहीं निकलता। यदि किसी प्रकार से इस काम को अंजाम दे दिया गया, स्पष्ट रूप से मोदी की राह में सबसे बड़े बाधक होने का प्रमाण दे दोगे।
जेटली साहब क्या ड्रामा कर रहे हो? जेटली साहब मोदी की राह में रोड़ा मत बनो। ज्यादा लालच अच्छा नहीं होता। महंगाई काबू में नहीं। सर्दी में 7 से लेकर 10 रूपए बिकने वाला आलू 20 रूपए, 7/8 रूपए बिकने वाली मूली 20 रूपए, यही स्थिति बधुए और सरसों के साग की है, टमाटर 40/50 रूपए, अरबी 15 रूपए पाव, बिक रहा है। समाचारों के बाजार में चर्चा है कि बैंक खाताधारियों से रूपए जमा करवाने, निकलवाने, पासबुक में प्रविष्टि करवाने और अन्य सेवाओं का शुल्क लिया जाएगा। हालाँकि इस समाचार का खंडन कर दिया गया है, लेकिन यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि बिना चिंगारी के कभी धुआँ नहीं निकलता। यदि किसी प्रकार से इस काम को अंजाम दे दिया गया, स्पष्ट रूप से मोदी की राह में सबसे बड़े बाधक होने का प्रमाण दे दोगे।
विपक्ष में बैठकर खूब महंगाई का रोना-रोते थे और अब क्या हुआ? रसोई गैस 741 की हो गयी। जेटली साहब जनता की मत सुनो, बस मतदाता के बीच रहने वाले भाजपा कार्यकर्ता और पदाधिकारियों से ही पूछ लो, दूध का दूध और पानी का पानी आपके और सरकार के सामने आ जाएगा। रस्सी उतनी ही खींचो जितनी खिंच सके, ज्यादा खींचोगे टूट जाएगी।
जेटली साहब यह सब आरोप किसी विपक्षी का नहीं, बल्कि यह वेदना भाजपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की है, जो जनता के बीच जाकर पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। दो वर्ष निरन्तर उनकी वेदना सुनते-सुनते कान पक गए। किसी पार्टी मीटिंग में बोलने से डरते है कि पार्टी से निलम्बित न कर दिया जाऊँ।

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