शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि भारतीय राजनीति का स्तर इतना गिर जाएगा। भारत में शायद ही कोई ऐसी पार्टी होगी, जिसमे हिन्दू न हो। उसके बावजूद महात्मा गाँधी से लेकर आजतक जिस नेता अथवा पार्टी को देखो हिन्दू को अपमानित करने से नहीं चुकता। हिन्दूहित की बात करने वाले को साम्प्रदायिक घोषित करने से भी नहीं चूकते। महात्मा गांधी हिन्दुओं से “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम…” कहलवाने का साहस कर सकते थे, लेकिन क्या मुसलमानों से इसी भजन को गाने के लिए कहने का साहस किया? गौ-हत्या बंद करवाने के लिए कोई प्रदर्शन अथवा धरना दिया? यहाँ भी "Divide And Rule" नीति अपनाने से नहीं चुके महात्मा गाँधी। कैबिनेट द्धारा पाकिस्तान को पैसा न दिए के निर्णय के विरुद्ध धरने और भूख हड़ताल की धमकी देंने वाला गाँधी गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध पर क्यों खामोश रहे? महात्मा गाँधी केवल उतना ही बोलते और करते थे, जितना उनके आकाओं द्धारा उनको करने की इजाजत मिलती थी।
राजनीतिक पार्टियाँ अपने स्वार्थ के लिये गोधरा, 1984 सिख नरसंहार आदि का रोना रोते है, लेकिन आज तक किसी भी पार्टी ने महात्मा गाँधी हत्या नहीं "वध" होने पर चित्पावन ब्राह्मणो का हुआ नरसंहार और 1966 में हुए गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने पर साधू-सन्तों के खून से लाल हुई पार्लियामेंट स्ट्रीट की जाँच करवाने की किसी भी पार्टी ने माँग की ? किसके आदेश से हिन्दुओं के खून की होली खेली गयी थी?
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7 नवम्बर 1966 भारतीय इतिहास के काले पन्नों में दर्ज वो दिन, जब तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आदेश से सैकड़ों गौरक्षकों का दिल्ली पुलिस ने बेरहमी से कत्लेआम कर दिया था । कोई मरने वालों की संख्या न जान सके इसलिए दिल्ली पुलिस ने उन गौरक्षकों के पार्थिव शरीरों को भी क्षत-विक्षत करके इधर-उधर फेंक दिया। इन मरने वालों का सिर्फ़ इतना कसूर था कि वो हिन्दू थे और गौरक्षा के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे थे।
हिन्दू जनमानस में “गौमाता” को लेकर कितनी अपार श्रद्धा असीम प्रेम है. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य वजह “कारतूसों में गाय की चर्बी” का मिला होना था। मंगल पाण्डेय जैसे देशभक्त लोगों ने ऐसी सरकार के ख़िलाफ़ बगावत का बिगुल फूंका, सफलता मिली या असफ़लता इससे इन वीर शहीदों के बलिदान का मूल्य कम नहीं हो जाता।
प्रसिद्द इतिहासकार आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार, “7 नवंबर 1966 की सुबह आठ बजे से ही संसद के बाहर लोग जुटने शुरू हो गए थे। उस दिन कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी, जिसे हम-आप गोपाष्ठमी नाम से जानते हैं.गोरक्षा महाभियान समिति के संचालक व सनातनी करपात्री जी महाराज ने चांदनी चैक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया.करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय के सातों पीठ के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, मध्व संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं को पंडित लक्ष्मीनारायण जी ने चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे.
लालकिला मैदान से आरंभ होकर नई सड़क व चावड़ी बाजार से होते हुए पटेल चैक के पास से संसद भवन पहुंचने के लिए इस विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया. रास्ते में अपने घरों से लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे.हर गली फूलों का बिछौना बन गया था.”
यह हिंदू समाज के लिए बड़ा ऐतिहासिक दिन था। इतने विवाद और अहं की लड़ाई होते हुए भी सभी शंकराचार्य और पीठाधिपतियों ने अपने छत्र, सिंहासन आदि का त्याग किया और पैदल चलते हुए संसद भवन के पास मंच पर समान कतार में बैठे. लाखों की भीड़ थी. जम्मू कश्मीर से तक लोग गौरक्षा कानून की मांग को लेकर “संसद”के समक्ष एकत्रित हुए।
लम्बे समय से कांग्रेस और इंदिरा गांधी गौरक्षा कानून को लेकर आश्वासन दे रही थी, लेकिन बहुमत में होने के बावजूद कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर रही थी. अत: संत समाज ने हिन्दू समाज को एकजुट कर संसद के समक्ष घेराव करने का निर्णय किया था. दोपहर 1 बजे यह जनसैलाब संसद के समीप पहुँच गया. मंच से संतों के भाषण हुए. तकरीबन दोपहर के 3 बजे स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए.स्वामी रामेश्वरानंद ने कहा, ‘यह सरकार बहरी है,यह गो हत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी,इसे झकझोरना होगा...सारे सांसदों को खींच-खींच कर बाहर ले आओ, तभी गो हत्या बंदी कानून बन सकेगा.’
इतना सुनना था कि नौजवान संसद भवन की दीवार फांद-फांद कर अंदर घुसने लगे.लोगों ने संसद भवन को घेर लिया और दरवाजा तोड़ने के लिए आगे बढ़े.पुलिसकर्मी पहले से ही लाठी-बंदूक के साथ तैनात थे .भीड़ और आक्रामक हो गई। इतने में अंदर से गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई.लोग मर रहे थे, एक-दूसरे के शरीर पर गिर रहे थे और पुलिस की गोलीबारी जारी थी.कम से कम, पांच हजार लोग उस गोलीबारी में मारे गए थे.
इतने बड़े स्तर पर कत्लेआम को देखकर खुद सरकार डर गयी और ट्रक बुलाकर मृत, घायल, जिंदा-सभी को उसमें ठूंसा जाने लगा.जिन घायलों के बचने की संभावना थी, उनकी भी ट्रक में लाशों के नीचे दबकर मौत हो गई. किसी को पता ही नहीं चला कि सरकार ने उन लाशों को कहां ले जाकर फूंक डाला या जमीन में दबा डाला.
संतों को तिहाड़ जेल में ठूंस दिया गया. केवल शंकराचार्य को छोड़ कर अन्य सभी संतों को तिहाड़ जेल में डाल दिया गया. राजनीतिक दबाव को देखते हुए प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने “तत्कालीन गृहमंत्री” गुलजारी लाल नंदा से त्यागपत्र मांग लिया. घटनाक्रम की पूरी जिम्मेदारी डाल दी गयी गुलजारी लाल नंदा के कंधों पर, जो खुद गौरक्षा कानून बनाने के समर्थक माने जाते थे. जो साधू-संतों का सम्मान करते थे उन पर भला वो गोली चलवाने का आदेश कैसे दे सकते थे ? मतलब साफ़ था “काम इंदिरा गांधी का था नाम गुलजारी लाल का हुआ”.
क्या नेता इस नरसंहार की पुनः जाँच की मांग करेंगे या वोटबैंक के आगे नतमस्तक हो, चुपचाप बैठे रहेंगे ?

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