एक शिक्षक की व्यथा
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
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| स्कूल के बोर्ड पर सड़क का नाम गलत, न प्रधानाचार्य को परवाह, और न ही किसी और को? |
अधिकारी अफसर विद्यालयों का निरीक्षण कर रहे हैं और रोज अखबारों में आ रहा है कि फलाना स्कूल चेक हुआ और बच्चों से राजधानी पूछी, प्रथम प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या मुख्यमन्त्री का नाम पूछा और बच्चों ने नाम नहीं बताया।
इसी क्रम में एक खबर आयी कि एक शिक्षिका को black board पर अंत्येष्टि शब्द गलत लिखते हुए देखा और उस अध्यापिका का नाम व फोटो अखबार में छाप दिया। सप्ताह एवं महीने के नाम तक अध्यापक ठीक से नहीं लिख पाए/पायी।
अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा करके समाज में, लोगों को, अभिभावकों को क्या सूचना और सन्देश दिया जा रहा है? यही कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को विषय का ज्ञान नहीं है? उनको हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, आदि नहीं आती ?
बड़ा विरोधाभास है
बड़ा विरोधाभास है
एक तरफ सरकार कहती है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन बढे, ज्यादा बच्चे जुड़े, कोर्ट में केस दाखिल किये जा रहे हैं कि सरकारी स्कूल में अफसरों के बच्चे पढ़ाई करें और दूसरी तरफ शिक्षकों की गरिमा और मर्यादा तथा उनके ज्ञान को धूमिल किया जा रहा है| ऐसी खबरें आने के बाद अभिभावकगण और समाज में ये सोच पनपेगी कि मास्टरों को कुछ नहीं आता, "मास्टर" यही शब्द अब संबोधन का ज़िंदा रह गया और गुरु जी जैसे लफ्ज गायब हैं ।
एक सोचनीय तत्व ये है कि अफसर किस उद्देश्य स्कूलों का निरीक्षण करने जाते हैं? अपनी अफसरी दिखाने? अध्यापकों को नीचा दिखाने? उनको अपमानित करने? अपना रौब दिखाने? उनको फटकार लगाने? ....?
यह कृत्य निंदनीय है ......... नकारात्मक है ........ गलत है .......
होना तो यह चाहिए कि अफसरों को शिक्षकों और बच्चों को प्रेरित करना चाहिए, उनका morale up करना चाहिये, उनको boost करना चाहिए, एक जोश भरना चाहिए,कोई कमी दिखे भी तो शिक्षकों और बच्चों में सकारात्मक ऊर्जा भरनी चाहिए, अपमानित करने से तो शिक्षक निराश हो जाएगा। ऐसा करने से अच्छा है कि ऐसे अल्पज्ञान वाले अध्यापकों से निम्न जानकारी लेकर उन पर सख्त कार्यवाही करने के लिए प्रदेश/केन्द्र सरकार से आग्रह करें:--
1. कितने वर्षों से अध्यापक/अध्यापिका हैं?
2. किसके अनुरोध(सिफारिश) से नौकरी पर आए/आयीं?
3. किस विद्यालय से शिक्षा ग्रहण की?
4. कितनी रिश्वत देकर डिग्री और नौकरी मिली?
5. किसकी मध्यस्ता से रिश्वत का लेन-देन हुआ?
सोशल मीडिया पर ऐसी सैकड़ों वीडियो आती है कि सिर शर्म से झुक जाता है। आत्मग्लानि होती है कि जब एक शिक्षक अथवा शिक्षिका लगभग अशिक्षित होते हैं। आखिर किस आधार पर ऐसे अशिक्षितों की नियुक्तियाँ की? असली दोषी रिश्वतखोर हैं, जिन्होंने चंद सिक्कों की खातिर अपने पद अथवा रसूक का दुरूपयोग कर देश के उज्जवल भविष्य को बर्बाद करने का घिनौना काम कर देश की प्रतिष्ठा को दाव पर लगा दिया।
अच्छा , इन अफसरों के प्रश्न होते भी ऐसे हैं जो syllabus से बाहर के होते हैं, अफसरों का उद्देश्य सुधारवादी नहीं, आलोचनात्मक दृष्टिकोण लिये होता है कि शिक्षक की गलती नजर आये बस, और हम अपना रौब दिखाए, एक अफसर ने लेफ्टिनेंट शब्द पूछा था शिक्षक से, क्योंकि यह अब अप्रचलित शब्द है और लेफ्टिनेंट अंग्रेजी में lieutenant लिखा जाता है ।
हिन्दी में तो और भी कठिन शब्द हैं जो भ्रमित करते हैं और किताबों में, अखबारों में गलत वर्तनी ही प्रचलित है जैसे उपरोक्त शब्द मिलता है सही शब्द उपर्युक्त कि जगह, कितने लोग जानते हैं कि कैलाश शब्द गलत है और कैलास सही, दुरवस्था सही है दुरावस्था गलत, सुई नहीं सूई शब्द सही है, अध:पतन को अधोपतन लिखा जाता है, हिन्दी भाषा की सही वर्तनी पूरे भारत में ही गिने-चुने लोग सही लिख पायेगे, दो authentic (प्रमाणिक) किताबों में एक में दोपहर सही शब्द माना है और एक ने दुपहर, भगवान जाने स्थाई शब्द सही है या स्थायी? दवाई शब्द तो होता ही नहीं है सही शब्द या तो दवा है या दवाईयाँ, दुकानों पर लिखा मिष्ठान शब्द ही गलत है क्योंकि सही शब्द मिष्टान्न है।
कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता और कोई भी शिक्षक सर्वज्ञ नहीं होता, चाहे कितना भी कोई स्वाध्याय कर लें, शादी न करे, घर से कम निकले, शादी विवाह मृत्यु त्यौहार आदि में जाना बन्द करके कोई शिक्षक सारी जिन्दगी पढ़ाई करे फिर भी किसी न किसी प्रश्न पर वो अटक जाएगा क्योंकि विषय और ज्ञान अनन्त है ।
सरकारी स्कूल का अध्यापक कोई भी हो, वो बुद्धिमान अवश्य होगा, उसका कारण साफ़ है, वो कई परीक्षाएं पास करके शिक्षक बनाता है, बी ए, ऍम ए, बीटीसी, जेबीटी, pre बीएड, फिर बीएड, ऍम एड, tet, ctet, आदि के उपरांत teacher के लिये प्रतियोगी परीक्षा, सिर्फ क्रीम क्रीम प्रतियोगी ही अध्यापक बन पाते हैं ।
कुछ हद तक शिक्षक स्वाध्याय नहीं कर रहा, जिसकी जिम्मेदारी समाज और शिक्षा विभाग की है, आम इन्सान को नहीं पता कि सरकारी teacher के कैरियर में 40% field work है, 40% लिखा पढ़ी और सिर्फ 20% अध्ययन अध्यापन है, field work मतलब शिक्षक गाँव में या शहर में घूमता है, उसको स्कूल परिसर में बैठने का वक्त नहीं, बाल गणना, जनगणना, pulse पोलियो, चुनाव, सर्वे, पोषाहार के लिये दाल सब्जी मिर्च मसाले लाना, अभी चूल्हे cylinder लाने के लिये मशक्कत की, और सबसे बड़ा कार्य b.l.o. गाँव में घूमते रहो, फिर आये दिन ट्रेनिग, नामांकन और वोटर कार्ड बनाने के लिये द्वार-द्वार घूमो, छात्रवृति वाले काम के लिये बच्चों और अभिभावकों से आय प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र की माथापच्ची में पूरा जुलाई निकल जाता है , बोर्ड एग्जाम में तो सिर्फ govt टीचर की ही ड्यूटी लगाती है तो मार्च में सरकारी स्कूल खाली हो जाते हैं, वृक्षारोपण अभियान में पेड़ लेने भागो, निशुल्क पाठ्य पुस्तक लेने भागो, निशुल्क गणवेश भी तो वितरित करना है उसका भी इन्तजाम करना है, राशन कार्ड और आधार कार्ड की ड्यूटी, बैंक का काम, बच्चों की पढ़ाई गयी भाड़ में , रोजाना नई नई सूचनाये विभाग मागता है और तरह तरह की u.c., किसी स्कूल में कमरा office निर्माण कार्य आ गया तो समझो 6 महीने गए, कभी पोषाहार की डाक जाती है to कभी छात्रवृति की, कभी dise बुकलेट भरो, तो कभी अनीमिया गोलियों की डाक, स्कूल आकर कोई आम इन्सान देखे तो पता चलेगा कि सरकारी स्कूल डाकखाना है।
शिक्षक स्वाध्याय कैसे करे? क्या करे? इस अजीबोगरीब माहोल में , और पढ़ाई चाहिए भी किसको? हर कोई पास भर होना चाहता है, डिग्री चाहता है, ज्ञान किसको चाहिए?
शिक्षक स्वाध्याय कैसे करे? क्या करे? इस अजीबोगरीब माहोल में , और पढ़ाई चाहिए भी किसको? हर कोई पास भर होना चाहता है, डिग्री चाहता है, ज्ञान किसको चाहिए?
एक तरफ गुणवत्ता सुधारने के लिये ncert books लगा दी गयी और जिनका standard ऐसा कि विज्ञान की किताब पढ़ाने के लिये lab की जरूरत है क्योंकि सारे प्रयोग हैं, सरकारी स्कूल में chalk duster black बोर्ड की व्यवस्था होती नहीं सही से, बाकी lab की बात ..... ? कक्षा कमरे हैं सही लेकिन एक में कबाड़ पडा है, एक में चावल गेहूं और एक में पोषाहार पकाने के लिये लकड़ी भरी है, और एक में ऑफिस अलमारी, एक तरफ ncert books का आदर्शवाद और वहीं बोर्ड result सुधारने के लिये ...........
शिक्षा विभाग भी जादू का खेल है, कभी क्या तो कभी क्या?
कभी एकीकरण, कभी युक्ति युक्तकरण,कभी समानीकरण, कभी स्टाफिंग pattern, शिक्षक को खुद नहीं पता कि उसका पत्ता कब कट जाएगा?
शिक्षक भी इन्सान है, मीडिया भी बस आदर्शवाद का ढकोसला करता है, अंतेष्टि गलत लिखा शिक्षिका ने तो उसका फोटो खींच लिया, किसी बच्चे ने चाहे खुद ही खुद को चोटिल कर दिया हो लेकिन बड़े बड़े अक्षरों में खबर छपेगी
"शिक्षक ने पीटा"
"शिक्षक की करतूत "
"शिक्षक ने पीटा"
"शिक्षक की करतूत "
कोई भी शिक्षक स्कूल में बैठकर time pass नहीं करता, बच्चों को उनके मां बाप भी गलत काम पर पिटाई करते हैं, शिक्षक राक्षस नहीं है, अगर कोई एक शिक्षक गलती करता है तो पूरा शिक्षक समुदाय की गलती सिद्ध नहीं हो जाती, पढ़ाई कोई घुट्टी नहीं है कि बच्चे का मुँह खोला और दो बूँद डाल दी, अनुशासन के लिये भय भी जरूरी होता है, मीडिया को बहुत शौक है सच छापने का तो किसी स्कूल में कुछ दिन काटकर आये, देखे शिक्षक की दोहरी तिहरी जिम्मेदारी और माहौल ,
विश्व का सारा ज्ञान और विकास शिक्षा और शिक्षक के कारण ही वजूद में आया है, सरकारी शिक्षक बहुत ही निरीह और आम इन्सान है, वो अपना 100% देना चाहता है, ये जरूर है कि वो दबावों में है, शिक्षण बस एक नौकरी भर नहीं है। अफसर मीडिया और समाज तीनों शिक्षक के प्रति अनुदार हैं, और शिक्षक की गलत छवि पेश कर रहे हैं।
विश्व का सारा ज्ञान और विकास शिक्षा और शिक्षक के कारण ही वजूद में आया है, सरकारी शिक्षक बहुत ही निरीह और आम इन्सान है, वो अपना 100% देना चाहता है, ये जरूर है कि वो दबावों में है, शिक्षण बस एक नौकरी भर नहीं है। अफसर मीडिया और समाज तीनों शिक्षक के प्रति अनुदार हैं, और शिक्षक की गलत छवि पेश कर रहे हैं।
शिक्षा व्यवस्था के सन्दर्भ में आज से पचास वर्ष पहले श्रीलाल शुक्ल जी ने एक कड़वी मगर सच बात राग दरवारी में लिखी थी, जोआज भी प्रासंगीय है-
"सरकारी शिक्षा रास्ते में पड़ी हुई एक कुतिया है, जिसको कोई भी ठोकर मारकर चला जाता है। जो भी मंत्री, अधिकारी आते हैं बजाय इसके कि वह शिक्षा व्यवस्था को ठीक करें, शिक्षकों को जिम्मेदार मानकर बात शुरू करता है। हर आदमी सरकारी शिक्षा के
खिलाफ वक्तव्य देकर चला जाता है, मगर उसके लिए कुछ नहीं करता।"
"सरकारी शिक्षा रास्ते में पड़ी हुई एक कुतिया है, जिसको कोई भी ठोकर मारकर चला जाता है। जो भी मंत्री, अधिकारी आते हैं बजाय इसके कि वह शिक्षा व्यवस्था को ठीक करें, शिक्षकों को जिम्मेदार मानकर बात शुरू करता है। हर आदमी सरकारी शिक्षा के
खिलाफ वक्तव्य देकर चला जाता है, मगर उसके लिए कुछ नहीं करता।"
एक वो भी दौर था शिक्षा का
तब परीक्षाएं इतने हल्के में नहीं ली जाती थी, परीक्षा का नाम सुन के अजीब सी घबराहट हो जाती थी, और जी तोड़ मेहनत के साथ पढ़ाई शुरू, फिर स्कूल में अच्छे नंबर लेकर अच्छे कॉलेज में दाखिला,
तब कॉलेज के प्रिंसिपल, एचओडी देश के राष्ट्रपति से भी ज्यादा पॉवरफुल लगते थे, कॉलेज में सर्वसुविधा युक्त जैसी तो कोई बात नहीं होती थी फिर भी वहां से पढ़ने को बच्चो की होड़ सी लग जाती थी, क्या गज़ब का नॉलेज होता था उन पढ़ाने वालो का, जिन्हे हम सही मायने में गुरु कहते है, वो क्लास में आके एक बच्चे से सिर्फ सब्जेक्ट का सिलेबस पूछ के बिन कोई किताब देखे शुरू से लेके आखिरी तक का हर कांसेप्ट समझा जाते थे, तब शिक्षको से पैर छू के आशीर्वाद लेना भगवान से आशीर्वाद लेने के बराबर माना जाता था,
लेकिन धीरे धीरे शिक्षा का व्यवसायीकरण हो ही गया, इसमें एजुकेशन की क्वालिटी बढ़ाये जाने के बजाये सिर्फ पैसा कमाने पे जोर दिया जाने लगा। आज स्थिति यह हो गयी है,कि शिक्षा पर अध्यापक/अध्यापिका का ध्यान ही नहीं। बस प्रति माह वेतन मिलता रहे, विद्यार्थियों का भविष्य जाये भाड़ में।
शिक्षा एवं संस्कारों का आभाव
जब हम स्कूल में पढ़ते थे, किसी को कमीज की बाहें मोड़ने की आज्ञा नहीं थी थी। स्कूल ड्रेस कोड के अनुसार ही स्कूल ड्रैस पहनी जाती थी और आज आधुनिकता के नाम पर हाथों में मोबाइल, स्कूटी/स्कूटर एवं छात्राओं के गले,और कान में सोने की चेन-बालियां और हाथों में चूड़ी। याद आता है, चावड़ी बाजार में गली राजा केदारनाथ गली में आर्य समाज स्कूल,प्रधानाचार्य थी श्रीमति सेन। कोई लड़की हाथ में चूड़ी तक पहनकर नहीं आ सकती थी। अगर आ भी गयी तो प्रार्थना के ही बीच में उसकी चूड़ी उतरवा कर रख ली जाती थी और अगले दिन केवल माता या पिता के बिना स्कूल में प्रवेश वर्चित होता था। यही नहीं, सभी कन्या स्कूलों में कन्या को रोटी, और व्यंजन बनाने की प्रक्टिकल ट्रेनिंग देने के साथ-साथ अपने सामने भी स्कूल में बनवाते थे, आज बताओ कितने स्कूल में यह शिक्षा दी जाती है। यह स्थिति सभी कन्या स्कूलों की थी। उस समय विद्यालय का उद्देश्य बच्चों में शिक्षा के साथ संस्कार देना होता था। आज परिस्थितियाँ एकदम विपरीत है। अभिभावकों की खुंडे उस्तरे से हजामत
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| क्या चार वर्ष का बच्चा बना सकता है? |

आज शिक्षा कम डोनेशन की भरमार है
लेकिन आजकल जिस टाइप से प्राइवेट स्कूल और कॉलेज वाले मोटी फीस और डोनेशन लेने लगे हैं, तब से स्टूडेंट, स्टूडेंट नहीं रहे कस्टमर बन गए, जिसने मोटी फीस देके एडमिशन लिया वो रेगुलर कस्टमर और जिसने बड़ा डोनेशन देके एडमिशन लिया वो प्रिविलेज कस्टमर, टीचर भी आजकल किताब देख देख के पढ़ाने लग गए, वो टीचर और स्टूडेंट के बीच की सम्मानजनक दूरी अब दोस्ती यारी में बदल गयी,बच्चो में नैतिकता खत्म होते गयी, प्रणाम करने वालो को बैकवर्ड माना जाने लगा,आम जनता से लेकर मन्त्री तक इस बात का जवाब दे कि यदि स्कूलों में पढ़ाई हो रही होती,फिर क्यों बच्चे ट्यूशन पर जाते हैं? बच्चा नर्सरी में गया नहीं, चल बेटा ट्यूशन पर। यदि ट्यूशन न लगवाई जाये बच्चा नर्सरी से आगे पढ़ नहीं सकता। कोई विड़ला ही बच्चा होता है जो बिना ट्यूशन के अपनी शिक्षा ग्रहण कर पता/पाती है। यह वह कटु सच्चाई है जिसे कोई झूडला नहीं सकता। वेतन से कहीं अधिक कमाई ट्यूशन से हो रही है।
ऐसे कॉर्पोरेट टाइप के स्कूल/कॉलेज से अधिकतर बच्चे आधे अंग्रेज और आधे हिन्दुस्तानियो का खतरनाक मिक्सचर बन के निकलते हैं, और जगह जगह अपनी भद्द पिटवाते हैं,
इसलिए हमारे गुरूजी कहते थे, कभी भी शिक्षा देने के कार्य को व्यापार की तरह नहीं किया जाना चाहिए, और उनकी बात सोलह आने सच ही थी "अभावो में ही निखर के ही प्रतिभाएं सामने आती
दिल्ली में कल के चर्चित स्कूलों की शोचनीय स्थिति के लिए दोषी कौन?
इन हस्तियो ने की इस स्कूल से पढ़ाई
पूर्व सासंद एम अफजल ने इस स्कूल से अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी की है। अफजल का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों ने इस स्कुल से पढ़ाई की शुरुआत की क्योंकि प्राइवेट स्कुल के महंगे होने की वजह से उनमे पढ़ नहीं सके। वहीं यही कहा जाता है कि कई अभिभावकों की उम्मीदों की किरण इस स्कूल से जुड़ी हुई है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सैय्यद अहमद खान और भारतीय हॉकी लीजेंड मिर्जा एमएन मसूद भी इस स्कूल के छात्र रहे हैं। वहीं पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी, पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी. इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी, मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी के कुलपति असलम परवेज और प्रख्यात ऊर्दू प्रोफेसर गोपीचंद नारंग भी यहां से पढ़ाई कर चुके है।
दिल्ली के अजमेरी गेट में स्थित
पूरानी दिल्ली के अजमेरी गेट स्थित यह स्कूल सरकारी सहायता प्राप्त है। बता दें कि यह स्कूल 1990 से छठी कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से कराता रहा है। स्कूल के प्रिंसिपल का कहना है कि 2008 से एक भी अध्यापक की नियुक्ति नहीं हूई है। गौरतलब है कि 2008 में ही सात अध्यापक और एक गार्ड की नियुक्ति हुई थी।
मंत्रालय ने लौटा दी प्रमोशन वाली फाइल
एनबीटी की खबर के मुताबिक, स्कूल ने 44 अध्यापकों के प्रमोशन वाली फाइल शिक्षा मंत्रालय़ को भेजी थी लेकिन मंत्रालय ने बिना किसी वजह के फाइल को वापस कर दिया। जानकारी के मुताबिक मंत्रालय के इस फैसले से स्कूल को बहुत बड़ा झटका लगा। वहीं स्कूल को 31 अध्यापकों की जरुरत है।
अनुबंधीय अध्यापकों के भरोसे था स्कूल
शिक्षा विभाग अध्यापकों के प्रमोशन को लेकर नकारात्मक रुख अपनाए हुआ है। विभाग की शर्ते है कि नयें अध्यापकों की नियुक्ति के लिए स्कूल के किसी भी अध्यापक को प्रमोशन नहीं दिया जाएगा क्योंकिं जब तक वे 44 मामलें लंबित रहेंगे तब तक कोई नियुक्ति नहीं होगी। गौरतलब है कि स्कूल में अस्थायी तौर पर पढ़ाने वाले अध्यापकों से काम चलाया जा रहा है और 25 नए अनुबंधीय अध्यापकों की नियुक्ति भी की गई है।
फंड की कमी के चलते हुआ बुरा हाल
स्कूल को हेरिटेज का दर्जा मिलने से इसकी मरम्मत नहीं करवाई जा सकती है और इसके लिए दिल्ली विकास बोर्ड अधिकृत है। बता दें कि इस स्कूल में खेल का सबसे बड़ा मैदान है लेकिन फंड की कमी के चलते इसकी भी हालत खस्ता होती जा रही है। गौरतलब है कि 1692 में गजीउद्दीन खान के इस स्कूल की स्थापना की थी और यह एशिया के सबसे पुराने स्कुलों में से एक है।
कई वर्ष इस स्कूल के एक हिस्से में दिल्ली कॉलेज, जिसे आज ज़ाकिर हुसैन कॉलेज के नाम से जाना जाता है, था। और इसी कॉलेज ने मुझ समेत न जाने कितने विद्यार्थी देश को दिए। जहाँ तक स्कूल ग्राउंड की बात है उस पर अपने विद्यार्थी जीवन से ही अनदेखा किया जा रहा था। जबकि उस समय धन की कोई समस्या भी नहीं थी।
वास्तव में यदि गंभीरता से विश्लेषण किया जाने पर प्रशासनिक लापरवाही ही उजागर होगी। पब्लिक स्कूलों के खुलने से अधिकांश सरकारी एवं मान्यता प्राप्त स्कूलों के बद से बदतर स्थिति होने के लिए केवल और केवल सरकार ही ज़िम्मेदार है।
अधिकतर मुस्लिम अपने बच्चों को इसी स्कूल में भेजते थे। लेकिन गैर-मुस्लिम अपने बच्चों को दरिया गंज स्थित ए.एस.वी.जे. संस्कृत स्कूल, जैन स्कूल,रामजस, डीएवी एवं कमर्शियल, खालसा एवं फ्रांसिस के अतिरिक्त चावड़ी बाजार में आर्य समाज और जामा मस्जिद पर इन्द्रप्रस्थ कन्या आदि स्कूल थे। इन स्कूलों में इतनी प्रतिस्पर्धा थी, जिसका शब्दों में उल्लेख करना सूरज को दीया दिखाना है। आज क्या हालात हो गयी है इन स्कूलों की। किसी भी दिल्ली या केन्द्र सरकार ने चिन्ता नहीं की। बेला रोड स्थित घटा मस्जिद के निकट गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन रामजस स्कूल के पीटी अध्यापक का उस स्कूल तक डर था। आज अध्यापक का किसको डर है ? इसकी ज़िम्मेदार भी दिल्ली एवं केंद्र सरकारें हैं। संस्कृत स्कूल हमारे समय में "गाँधी टोपी" स्कूल के नाम से चर्चित था। आज जिस नेता को देखो गाँधी की माला जप रहा है,लेकिन जिन स्कूलों देश को एक से बढ़कर एक विद्धवान, स्वतन्त्रता सैनानी दिए, उन स्कूलों की इतनी दुर्दशा। बहुत शर्म की बात है। आरक्षण पहले भी था, लेकिन आज इतना अधिक शोर हो गया है,दूसरी श्रेणी वालों को नौकरी करने में मुश्किल हो रही है। स्कूलों की हालात सुधारने के हर पहलु पर संकीर्णता से विचार करना होगा। आज स्कूल केवल प्रमाण-पत्रों के लिए है, वास्तविक शिक्षा तो माँ-बाप को बच्चे की ट्यूशन लगवाकर ही होती है। आज नर्सरी से लेकर उच्चतर शिक्षा तक 70 से 80 प्रतिशत विद्यार्थी ट्यूशन पर ही आश्रित हैं। जितना बड़ा स्कूल उतनी मोटी ट्यूशन फीस।




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