आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने की देश भर में चर्चा हो रही है। जो भारत में ही सम्भव है। लेकिन बंगाल में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर सबको साँप सूंघ जाता है। क्या इसी को समाजवाद या धर्म-निरपेक्षता कहते हैं?पर हमको लेनिन की प्रतिमाएं तोड़े जाने की सबसे बड़ी घटना के बारे में बताने जा रहे है। ऐसा हुआ था यूक्रेन में. यहां एक साथ लेनिन की 1320 प्रतिमाएं तोड़ दी गई थीं। कोई विरोध नहीं हुआ, लेकिन भारत में मुगलों की बुराई करने या भारत विरोधियों के विरुद्ध मुहिम चलाने पर छद्दम धर्म-निरपेक्षों को असुरक्षा का डर सताने लगता है और देश की जनता को भ्रमित करने प्रदर्शन आदि करने सडकों पर उतर आते हैं।
एक विदेशी की मूर्ति तोड़ने पर किस तरह विधवा-विलाप किया जा रहा है, लेकिन जब लेनिन के अनुयायी अपने चिर-विरोधी भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो रहे थे, क्या तब देश में असुरक्षा की भावना नहीं थी? आखिर यह नाटकबाज़ी और ढोंग कब तक होता रहेगा? क्या ये नेता देशहित सोंच सकते हैं? साम्प्रदायिकता खेल धर्म-निरपेक्षता का स्वाँग करते हैं?
डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की प्रतिमा को अपमानित करने पर चुप्पी क्यों?
कोलकाता में तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की प्रतिमा को अपमानित करना सिद्ध करता है कि लेनिन पक्षकार देशहित में सोंच ही नहीं सकते, शर्म आनी चाहिए इन्हे और इनके समर्थको को। ये लोग डॉ मुख़र्जी के बलिदान को ही नहीं जानते। ये डॉ साहब का ही बलिदान था कि आज हर भारतीय और विदेशी बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर घूमने व हनीमून के लिए जब चाहे चले जाते हैं। डॉ साहब भी इन छद्दमों की तरह सत्ता का सुख भोग सकते थे, लेकिन देशहित में केन्द्रीय मंत्री पद को त्याग देश में दो प्रधानमंत्री पद और परमिट प्रथा को जम्मू-कश्मीर से समाप्त करने बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर कूच कर गए। और शेष भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एवं जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के बीच गुप्तमन्त्रणा के तहत उनको गिरफ्तार कर शेख ने जेल में मार दिया। और जनता में दुष्प्रचार कर दिया गया कि जनसंघ वर्तमान भाजपा मुस्लिम विरोधी है, ताकि तत्कालीन जनसंघ मुख़र्जी की मौत को भुना न सके। यही मुख्य कारण है कि आज भी भारतीय जनता पार्टी को मुस्लिम विरोधी, साम्प्रदायिक कहकर बदनाम किया जाता है। अब निर्णय कीजिए साम्प्रदायिक कौन? डॉ मुख़र्जी की प्रतिमा को अपमानित करने वाले क्या धर्म-निरपेक्ष हो सकते हैं, कभी नहीं। यह उनके साम्प्रदायिक होने के सबसे बड़ा प्रमाण है। डॉ मुख़र्जी के बलिदान उपरान्त ही जम्मू-कश्मीर से प्रधानमंत्री पद समाप्त होने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर जाने पर परमिट लेने की प्रथा समाप्त हुई और नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को जेल में बंद किया था। इसी कांग्रेस ने इन्ही वामपंथियों के बुद्धिजीवी वर्ग से हाथ मिलाकर देश के वास्तविक इतिहास को धूमिल कर मुगलों का गुणगान पाठ्य पुस्तकों में डाला गया। विश्व में भारत ही मात्र ऐसा देश है, जहाँ की जनता अपने ही वास्तविक इतिहास से शिक्षित होते हुए भी किसी अशिक्षित से कम नहीं। वास्तविक इतिहास की बात करने वाले को फिरकापरस्त, दंगाई, साम्प्रदायिक करार करने से नहीं चूकते। जनता स्वयं निर्णय ले कि "देश विरोधी गतिविधियों में कौन लिप्त है और असली साम्प्रदायिक कौन?"
त्रिपुरा मे लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने एवं कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यालयों में तोड़े-फोड़ किये जाने को लेकर हो रहे हिंसा के खिलाफ बिहटा मे विरोध दिवस के रूप मे विरोध मार्च निकाला गया,जो बिहटा बजार होते हुए पोस्ट औफिस रोड व स्टेशन पर नुक्कड़ सभा मे तब्दील हो गयी। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि देश में संघी आंतकवाद का दौड़ शुरू हो गया है। पेरियार और अंबेडकर की मुर्ति तोड़ने के बाद त्रिपुरा मे क्रांति के महानायक लेनिन की मुर्ति तोड़ कर साबित कर दिया की ये देशभक्ति के नाम पर हिटलर से बदला ले रहे है।
दुसरे विश्व युद्ध मे लेनिन के कारण ही हिटलर को खुदकुशी करनी पडी थी। इस देश के शहिदे आजम भगत सिंह और उनके साथियों का रोल मॉडल लेनिन थे। वक्ताओं ने कहा कि जो हिटलर की चाल चलेगा वो हिटलर की मौत मरेगा।
अवलोकन करें :--
वक्ताओं मे मुख्यरूप से माले नेता गोपाल सिंह, पुर्व सांसद रमेश्वर प्रसाद, मुखिया राजेश प्रसाद गुप्ता, जगरनाथ चौधरी,ऐपवा नेत्री माधुरी गुप्ता, रिता गुप्ता, सुरेंद्र यादव समेत अन्य शामिल थे।
जब यूक्रेन, सोवियत रूस से टूटकर अलग राष्ट्र बना तो वहां लेनिन की 5 हजार से ज्यादा प्रतिमाएं थीं। 2017 मेंं 1320 लेनिन प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया गया. बताया जाता है कि जिस समय यूक्रेन में खाक्रिव फ्रीडम स्क्वायर ग्राउंड में लगी लेनिन की प्रतिमा को गिराया गया था, तब वहां पर हजारों की संख्या में लोग थे. ये सभी लोग लेनिन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। आज यूक्रेन में लेनिन की गिनी-चुनी प्रतिमाएं ही शेष हैं. दुनिया भर में भी लेनिन की प्रतिमाएं गिराने का सिलसिला तब शुरु हुआ था, जब रूस में कम्युनिस्ट शासन का पतन आरंभ हुआ था।

लेनिन का असली नाम था व्लादिमीर इलिच उल्यानोव. उनका जन्म 22 अप्रैल 1870 को वोल्गा नदी के किनारे बसे सिम्ब्रिस्क शहर में हुआ था. बाद में वो लेनिन के नाम से मशहूर हुए. इतिहास में लेनिन का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है.
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने की देश भर में चर्चा हो रही है। जो भारत में ही सम्भव है। लेकिन बंगाल में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर सबको साँप सूंघ जाता है। क्या इसी को समाजवाद या धर्म-निरपेक्षता कहते हैं?पर हमको लेनिन की प्रतिमाएं तोड़े जाने की सबसे बड़ी घटना के बारे में बताने जा रहे है। ऐसा हुआ था यूक्रेन में. यहां एक साथ लेनिन की 1320 प्रतिमाएं तोड़ दी गई थीं। कोई विरोध नहीं हुआ, लेकिन भारत में मुगलों की बुराई करने या भारत विरोधियों के विरुद्ध मुहिम चलाने पर छद्दम धर्म-निरपेक्षों को असुरक्षा का डर सताने लगता है और देश की जनता को भ्रमित करने प्रदर्शन आदि करने सडकों पर उतर आते हैं।
एक विदेशी की मूर्ति तोड़ने पर किस तरह विधवा-विलाप किया जा रहा है, लेकिन जब लेनिन के अनुयायी अपने चिर-विरोधी भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो रहे थे, क्या तब देश में असुरक्षा की भावना नहीं थी? आखिर यह नाटकबाज़ी और ढोंग कब तक होता रहेगा? क्या ये नेता देशहित सोंच सकते हैं? साम्प्रदायिकता खेल धर्म-निरपेक्षता का स्वाँग करते हैं?
डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की प्रतिमा को अपमानित करने पर चुप्पी क्यों?
| डॉ राजेन्द्र प्रसाद नेहरू मंत्रिमंडल के साथ (प्रथम पंक्ति में बैठे डॉ मुख़र्जी ) |
कोलकाता में तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की प्रतिमा को अपमानित करना सिद्ध करता है कि लेनिन पक्षकार देशहित में सोंच ही नहीं सकते, शर्म आनी चाहिए इन्हे और इनके समर्थको को। ये लोग डॉ मुख़र्जी के बलिदान को ही नहीं जानते। ये डॉ साहब का ही बलिदान था कि आज हर भारतीय और विदेशी बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर घूमने व हनीमून के लिए जब चाहे चले जाते हैं। डॉ साहब भी इन छद्दमों की तरह सत्ता का सुख भोग सकते थे, लेकिन देशहित में केन्द्रीय मंत्री पद को त्याग देश में दो प्रधानमंत्री पद और परमिट प्रथा को जम्मू-कश्मीर से समाप्त करने बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर कूच कर गए। और शेष भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एवं जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के बीच गुप्तमन्त्रणा के तहत उनको गिरफ्तार कर शेख ने जेल में मार दिया। और जनता में दुष्प्रचार कर दिया गया कि जनसंघ वर्तमान भाजपा मुस्लिम विरोधी है, ताकि तत्कालीन जनसंघ मुख़र्जी की मौत को भुना न सके। यही मुख्य कारण है कि आज भी भारतीय जनता पार्टी को मुस्लिम विरोधी, साम्प्रदायिक कहकर बदनाम किया जाता है। अब निर्णय कीजिए साम्प्रदायिक कौन? डॉ मुख़र्जी की प्रतिमा को अपमानित करने वाले क्या धर्म-निरपेक्ष हो सकते हैं, कभी नहीं। यह उनके साम्प्रदायिक होने के सबसे बड़ा प्रमाण है। डॉ मुख़र्जी के बलिदान उपरान्त ही जम्मू-कश्मीर से प्रधानमंत्री पद समाप्त होने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर जाने पर परमिट लेने की प्रथा समाप्त हुई और नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को जेल में बंद किया था। इसी कांग्रेस ने इन्ही वामपंथियों के बुद्धिजीवी वर्ग से हाथ मिलाकर देश के वास्तविक इतिहास को धूमिल कर मुगलों का गुणगान पाठ्य पुस्तकों में डाला गया। विश्व में भारत ही मात्र ऐसा देश है, जहाँ की जनता अपने ही वास्तविक इतिहास से शिक्षित होते हुए भी किसी अशिक्षित से कम नहीं। वास्तविक इतिहास की बात करने वाले को फिरकापरस्त, दंगाई, साम्प्रदायिक करार करने से नहीं चूकते। जनता स्वयं निर्णय ले कि "देश विरोधी गतिविधियों में कौन लिप्त है और असली साम्प्रदायिक कौन?" लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने पर भाकपा माले ने निकाला विरोध मार्च
| विरोध मार्च करते भाकपा माले कार्यकर्ता |
दुसरे विश्व युद्ध मे लेनिन के कारण ही हिटलर को खुदकुशी करनी पडी थी। इस देश के शहिदे आजम भगत सिंह और उनके साथियों का रोल मॉडल लेनिन थे। वक्ताओं ने कहा कि जो हिटलर की चाल चलेगा वो हिटलर की मौत मरेगा।
अवलोकन करें :--
वक्ताओं मे मुख्यरूप से माले नेता गोपाल सिंह, पुर्व सांसद रमेश्वर प्रसाद, मुखिया राजेश प्रसाद गुप्ता, जगरनाथ चौधरी,ऐपवा नेत्री माधुरी गुप्ता, रिता गुप्ता, सुरेंद्र यादव समेत अन्य शामिल थे।
क्यों हुआ था ये
जब यूक्रेन, सोवियत रूस से टूटकर अलग राष्ट्र बना तो वहां लेनिन की 5 हजार से ज्यादा प्रतिमाएं थीं। 2017 मेंं 1320 लेनिन प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया गया. बताया जाता है कि जिस समय यूक्रेन में खाक्रिव फ्रीडम स्क्वायर ग्राउंड में लगी लेनिन की प्रतिमा को गिराया गया था, तब वहां पर हजारों की संख्या में लोग थे. ये सभी लोग लेनिन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। आज यूक्रेन में लेनिन की गिनी-चुनी प्रतिमाएं ही शेष हैं. दुनिया भर में भी लेनिन की प्रतिमाएं गिराने का सिलसिला तब शुरु हुआ था, जब रूस में कम्युनिस्ट शासन का पतन आरंभ हुआ था। कौन थे लेनिन
लेनिन का असली नाम था व्लादिमीर इलिच उल्यानोव. उनका जन्म 22 अप्रैल 1870 को वोल्गा नदी के किनारे बसे सिम्ब्रिस्क शहर में हुआ था. बाद में वो लेनिन के नाम से मशहूर हुए. इतिहास में लेनिन का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है.रूस में क्रांति
वो पढ़ाई में अच्छे थे.1887 में कजान विश्वविद्यालय के विधि विभाग में उन्होंने एडमिशन लिया, लेकिन विद्यार्थियों के क्रांतिकारी प्रदर्शन में हिस्सा लेने की वजह से यूनिवर्सिटी ने उन्हें निष्कासित कर दिया. लेकिन 1891 में उन्होंने लॉ डिग्री हासिल कर ली थी. उन्होंने वकालात शुरू की. मार्क्सवादियों के नेता बन गए.
कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा. लेनिन के नेतृत्व में ही 1917 में रूस की क्रांति हुई. रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक पार्टी) के संस्थापक लेनिन के मार्क्सवादी विचारों को ‘लेनिनवाद’ के नाम से जाना जाता है. लोगों के दिल में विश्वयुद्ध को लेकर गुस्सा था, इसलिए बोलशेविक खेमे के लोग सरकार के खिलाफ उतर आए. धीरे-धीरे बोलशेविकों ने सरकारी इमारतों में कब्जा करना शुरू कर दिया. फिर वो समय भी आया जब सत्ता पर बोलशेविक काबिज हो गए. यही रूसी क्रांति थी. 54 साल की उम्र में स्ट्रोक की वजह से उनका निधन हुआ था.

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