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मोदी सरकार ने डूब चुके 83000 करोड़ रु और वसूले

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अक्सर मोदी पर विपक्ष फेंकू, जुमलेबाज आदि अनेकों से अलंकृत करते रहते हैं, लेकिन मोदी द्वारा किए देशहित में कार्यों को सार्वजनिक होने में बाधक बन रहे हैं। जिनसे वह स्वयं भलीभांति परिचित भी हैं। हर आदमी दूध का धुला नहीं होता, कमियां होती हैं, परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि गुणों को नज़रअंदाज़ कर अवगुणों को उछाल जनता को भ्रमित किया जाये। लोक सभा और राज्य सभा चलने में अवरोध करते हो, ताकि सरकार काम न कर सके और हम उसका लाभ उठाकर जनता में सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में सफल हो सके। स्वयं किस तरह जनता के धन पर मालपुए खाते रहे और अब मालपुए खाने की राल उनको विचलित कर रही हैं। 
मोदी आलोचना में कोई बुराई नहीं है लेकिन आलोचना के दोहरे मापदंड अपनाना ठीक नहीं है! अगर नोटबंदी में ATM की लाइनों में लग कर लोग मर गये थे जिनके लिए आम तौर पर मोदी और नोटबंदी पर सवाल खड़े किए जाते हैं, तो एक बात समझ में आज तक नहीं आई कि जब पूरा देश राशन की लम्बी लम्बी लाइनों में लगता था, गैस cylinder लेने के लिये लम्बी-लम्बी लाइनों में लगता था, पिक्चर हॉल की टिकट लेने के लिये लम्बी लाइनों में लगता था, रेलवे स्टेशन पर टिकट बुकिंग के लिये और न जाने किस किस काम के लाइनों में लगता था तो तब तो किसी को नहीं सुना गया कि आज अमुक जगह लाइन में लगे होने से इतने लोग मर गये।
अगर बैंक की लाइन में मृत्यु के ज़िम्मेदार मोदी हैँ, तो 1947 विभाजन के नरसंहार का ज़िम्मेदार कौन? अगर बैंक की लाइन में मृत्यु के जिम्मेदार मोदी है, फिर महात्मा गाँधी वध पर हज़ारों चितपावन ब्राह्मणों के हुए भयानक नरसंहार का जिम्मेदार कौन? अगर बैंक की लाइन में मृत्यु के ज़िम्मेदार मोदी हैं, तो हजारों निर्दोष सिखों की हत्या का ज़िम्मेदार कौन? अगर बैंक की लाइन में मृत्यु के ज़िम्मेदार मोदी हैं तो हज़ारों कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का ज़िंम्मेदार कौन? अम्बानी, अदानी, सिंधवी, टाटा, बिरला, माल्या, ललित मोदी, ये मोदी के कार्यकाल में अरबपति बने थे क्या? 85 अरबपतियों को जो 90 हजार करोड़ का लोन दिया गया था, क्या वो मोदी के समय दिया गया? जिस भी अफसर के घर छापा डाला जाए तो करोड़ रुपये तो उसके गद्दे के नीचे ही मिल जाते हैं! क्या ये मोदी के काल में कमाए गये? किस हद की मूर्खतापूर्ण बातें देश में लोग करते हैं!
दूसरे मोदी को GST को लेकर आरोप लगाए जाने पर तो कुछ दम नज़र आता है। इसके लागु होने पर जनता पर अधिक भार पड़ गया है। अभी मंसूरी जाने का अवसर मिला, वहां मंसूरी झील पर 10 रूपए का टिकट लगता था, जो अब GST के कारण 12 हो गया है। जबकि प्रकाशित मूल्य 11.80 रूपए है, यानि 20 पैसे प्रति टिकट टिकट बेचने वाला का लाभ, क्योकि सरकारी खजाने में जमा होंगे 11.80 रूपए प्रति टिकट के हिसाब से। यानि जनता की जेब पर खुला डाका।   
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देश के सरकारी बैंकों का अरबों रुपया लेकर हजम कर जाने वाले उद्योगपतियों के अच्छे दिन खत्म हो गए हैं। भूषण स्टील्स से करीब 56 हजार करोड़ रुपये की वसूली के बाद डर के मारे 21 सौ छोटी-बड़ी कंपनियों ने बैंकों का पैसा लौटा दिया है। ये रकम 83 हजार करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। जिस तरह से भूषण स्टील्स कंपनी को सरकार ने टाटा को बेचकर उससे मिली रकम बैंकों को लौटा दी, उसके बाद कंपनियों में अफरातफरी मच गई। दरअसल मोदी सरकार ने 2016 में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड बिल पास कराया था। इसे IBC के नाम से जाना जाता है। इसी कानून की दहशत ऐसी है कि जो कंपनियां बैंकों का करोड़ों रुपया लेकर लौटाने का नाम नहीं ले रही थीं, वो खुद पैसा जमा करने के लिए बैंकों के आगे लाइन में खड़ी हो गईं।

नए आईबीसी कानून का खौफ

मोदी सरकार ने आईबीसी कानून में संशोधन करके इंतजाम कर दिया था कि अगर किसी कंपनी पर नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) में कार्रवाई शुरू हो जाएगी तो वो नीलाम हो रही कंपनी के लिए बोली नहीं लगा पाएगा। अब तक ये कंपनियां अपनी ही नीलामी में सस्ती बोली लगाकर कंपनी को वापस हथिया लिया करती थीं। इससे बैंक बहुत मामूली रकम की ही वसूली कर पाया करते थे। नए कानून के तहत बैंक के लोन की तीन महीने की किस्त बंद होती है उस रकम को एनपीए घोषित कर दिया जाता है। जबकि पहले बैंक के अधिकारी और कंपनियां मिलीभगत करके लंबे समय तक इस रकम को एनपीए होने से बचाए रखती थीं। जिन 21 सौ कंपनियों ने हड़पी हुई रकम बैंकों को लौटाई है, उनमें से लगभग 98 फीसदी रकम 2014 से पहले यानी मनमोहन और सोनिया गांधी की सरकार के समय में दी गई थी। मोदी सरकार ने जब आईबीसी में संशोधन की प्रक्रिया शुरू की थी तो उद्योग जगत ने कड़ा विरोध किया था। क्योंकि एस्सार ग्रुप के रुइया, भूषण ग्रुप के सिंघल और जयप्रकाश ग्रुप के गौड़ जैसे नामी-गिरामी औद्योगिक घरानों को रेजॉलुशन प्रोसेस में भाग लेने से रोक दिया गया।

भूषण स्टील्स से भी हुई वसूली

अभी कुछ दिन पहले ही टाटा ग्रुप ने कर्ज में डूबी भूषण स्टील लिमिटेड कंपनी के 72 फीसदी हिस्से का अधिग्रहण कर लिया था। इस कंपनी पर करीब 40000 करोड़ रुपये का सरकारी बैंकों का कर्ज था। इस तरह से कंपनी अब टाटा के हाथ में चली गई और बैंकों को उनकी डूबी हुई रकम वापस मिल गई। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में नए IBC कानून के तहत ये पहला फैसला था। जिसमें इतना सख्त नतीजा आने से जनता का पैसा डकार कर बैठ चुके उद्योगपतियों की नींद हराम हो गई। कुछ महीने पहले ही नरेंद्र मोदी सरकार ने उन 12 कंपनियों के नाम सार्वजनिक कर दिए थे जिनके पास देश के बैंकों की डूबी हुई कुल रकम का चौथाई हिस्सा है। इसे सबसे प्राथमिकता वाला क्षेत्र मानते हुए मोदी सरकार ने एक-एक करके सबसे वसूली का काम शुरू कर रखा है।

किसके काम आएगी ये रकम

अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि पैसा आ गया तो उससे जनता का क्या फायदा? दरअसल यह सोचना बिल्कुल गलत है। गरीबों के कल्याण और देश में बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है। देसी बैंकों के कंगाल होने कारण सरकार को इसके लिए विदेशी बैंकों का मुंह ताकना पड़ता है। ये सारी रकम अब देश में गरीबों के लिए योजनाओं में काम आएगी और बैंकों के बुरे दिन भी खत्म होंगी। इससे वो असली जरूरतमंदों को आसानी से पैसा दे सकेंगे।

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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