आर.बी.एल.निगम, फिल्म समीक्षक सबसे पहली चीज – कठुवा में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ भी है इस बात का किसी के पास क्या सबूत है, जम्मू कश्मीर की पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता, वहां की पुलिस का इतिहास रहा है झूठी रिपोर्ट बनाने का, यहाँ तक की जो सैंपल पुलिस लेती है वो भी फर्जी निकले है।
पुलिस कहती है की मंदिर में तहखाना है, कोई भी मीडिया वाला तहखाना खोज के दिखा दे मंदिर में, वहां कोई तहखाना नहीं, तीसरी चीज – जम्मू कश्मीर पुलिस 3 बार अपनी ही रिपोर्ट बदल चुकी है, और 2 बार डॉक्टर अपनी रिपोर्ट बदल चूका है।
चौथी चीज कोई भी सेक्युलर और महबूबा मुफ़्ती इस मामले में सीबीआई जांच नहीं चाहते – क्या लोगों को मुर्ख समझ कर रखा है, दाउद इब्राहीम के पैसे पर नाचने वाले बॉलीवुड के लोग भी बिना सबूत हिन्दुओ और मंदिर के खिलाफ जहर उगल रहे है, हिन्दुओ और मंदिर को बदनाम कर रहे है, और ये लोग मुहीम चला रहे है, रेप से ज्यादा मंदिर और हिन्दुओ को हाई लाइट कर रहे है।
ऊपर करीना खान तख्ती लिए फोटो में है, वो “देवी” स्थान को हाई लाइट कर रही है, इस देश में आये दिन मदरसे और मस्जिद में रेप होता है “अल्लाह स्थान” बोलकर किसी फिल्म्बाज ने तख्ती पकडी है, बिना सबूत ये मोहतरमा हिन्दुओ के खिलाफ जिहाद कर रही है।
ये वो करीना खान है जिसने अपने बेटे का नाम तैमूर पर रखा, वो तैमूर जो मास मर्डरर था, जो मास रेपिस्ट था, अब ये मैडम बिना सबूत हिन्दुओ और मंदिर को बदनाम करने के लिए तस्वीर खिंचवा रही है, देश को भी देखना चाहिए की जिन फिल्म्बाजो को उन्होंने सर पर बिठा रखा है, वो फिल्म्बाज देश के और हिन्दुओ के खिलाफ किस तरह की नफरत भरी मुहीम चलाते है। जबकि फिल्म नगरी में जरुरत से कहीं यौन-शोषण होता है, किसी में साहस नहीं बोलने का।


समझ नही पता हूँ दोष किस को दूँ, अपने को भी खड़ा पता हूँ, उन्ही लोगो की भीड़ में जो किसी भी घटना कर बस बोल कर या सहानभूति जता कर चुप हो जाते है, तो पहले लोगो को दोषी कहूं या अपने को आप को ? देश मे रोज बलात्कार होते है कही मुस्लिम तो कही हिंदू का नाम आता है कठुआ की बच्ची का तो वो हाल कर दिया कि वो बच्ची ऊपर से देखती होगी तो उस की रूह भी उस दर्द को महसूस करती होगी जो उस के जिस्म में झेला हम लोग उस बच्ची का रोज राजनीति के नाम पर बलात्कार कर रहे है अब तक कि जो जांच और रिपोर्ट देखी उस से तो लगता है कि उस बच्ची को बलि कर दिया कुछ दंगाइयों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए और उस के बाद धर्म का खेल खेलने लगे मुस्लिम व मोदी विरोधी लोग मै मोदी का भगत नही किन्तु सत्य बोलने में आप जो समझे मुझे किन्तु सत्य ये ही है कि बच्ची की मौत का दुख किसी को नही सब को राजनीति करनी है दोषी कौन है सच क्या है वो कोई जानना ही नही चाहता बस हिन्दू का नाम आ जाये और राजनीति करने का मौका मिल जाये ये ही खेल खेल रही है मीडिया से ले कर सोशल मीडिया तक। मानवता तो आज वेश्यालय में जा कर शर्मसार हो रही है जब राजनीति के लिए एक बच्ची को बली दी जा रही है और वेश्यावृत्ति जैसा कार्य करने वाले चरित्र का भाषण दे रहे हो तो शब्द ही नही बचते बोलने को ! ये जो औरत है जिन की पिक पोस्ट में दी है इन्हों ने भी दुख किया बलात्कार पर बेचारी नारी है और लज्जावान है चरित्र व संस्करों की मिसाल पैदा की समाज मे माँ और बहन के चित्रण की उदाहरण है ?जब कि मेरी दृष्टि में 90/बलत्कार इन जैसी ओरतो के कारण होते है जो अश्लीलता को अपना अधिकार बता कर समाज मे वासना को इस चरम पर ले जाती है जहाँ मानव वासना में जानवर बन गया है एक तो पहले से ही समाज संस्कार हीन होता जा रहा है क्यों कि औरत जो माँ है आदमी की प्रथम गुरु है वो ही उत्तरदायित्व हीन होती जा रही है दूसरा ऐसे संस्कार हीन समाज मे ये औरते भी अश्लीलता फैलाने में कसर नही छोड़ रही जो आग में घी डालने का कार्य करता है !मै किसी भी अपराध का विरोध करता हूं और मानता हूं कि बलात्कार की सजा मौत हो, पर इस अश्लीलता रूपी आग का क्या न्याय हो जो वासना की चरम सीमा पर पहुँच कर समाज को दूषित कर रही है बलात्कार करने वाला मानव कीड़ा है उस को तो अंत होना जरूरी है किंतु इस अश्लील नाली का भी समाप्त होना उतना ही जरूरी है जिस में से ये कीट पोषित होते है और इस नाली में इन कीटो को पोषक तत्व देने वाली इन अश्लील औरतो का भी, जब तक नाली साफ न होगी किट खत्म न होंगे रोज पैदा होंगे अगर समाज को साफ करना है तो सफाई जरूरी है हर किट की मौत जरूरी है चाहे वो धर्म की आड़ में राजनीति हो या आजादी के नाम पर समाज को किसी भी तरह से दूषित करने वाले हो ! वेद सत्य है वेद ही कानून है वेद का ज्ञान ही अब इस समाज को देश को बचा सकता है।
कठुवा के मामले पर बॉलीवुड के लोग बहुत एक्टिव है, ये लोग "रेप" नहीं बल्कि हिन्दू मंदिर और हिन्दुओ के खिलाफ कैंपेन चला रहे है, भोली भाली जनता को ये लोग ये बताते है की ये तो बहुत ही निष्पक्ष है, और इनके दिल में बहुत करुना है, और ये लोग बेहद ही अच्छे है, पर ये जितने भी लोग कठुवा के मामले पर कैंपेन चला रहे है, देश को इनके बारे में पूरी जानकारी नहीं है, ये लोग खुद को निष्पक्ष बताते है पर अपनी पूरी जानकारी जनता को नहीं बताते और देश के लोग भी इनके बारे में नहीं जानते।
कठुवा पर कैंपेन चलाने वाली पूरा नाम छुपाती है निष्पक्ष मैडम, "आलम" नहीं बताती
ऐसी ही एक टीवी सीरियल और कुछ छोटी फिल्मो में काम करने वाली श्रुति सेठ है, जो खुद को बेहद निष्पक्ष बताती है, ये भी कठुवा मामले पर कैंपेन चला रही है, हालाँकि ये खुद असम बिहार और तमाम इलाकों में हो रही घटनाओं पर चुप है, देखिये ये कठुवा पर किस प्रकार कैंपेन चला रही है। खुद को निष्पक्ष बताकर मैडम मंदिर के खिलाफ कैंपेन चला रही है, हालाँकि असम पर चुप है, ये मैडम इसी प्रकार पहले भी कई मामलों में राष्ट्रवादियों, हिन्दुओ और बीजेपी को निशाने पर लेती हुई आई है, वैसे 39 भारतीयों का ISIS ने जब क़त्ल किया और पूरा देश रोया तो ऐसे लोग छुप थे, 1 त्वीट भी नहीं कर पाते थे।
हमने भी सोचा की इन लोगों के बारे में थोडा रिसर्च करे, और श्रुति सेठ के बारे में रिसर्च करने से पता चला की ये मैडम अपना पूरा नाम छुपाती है, इनका पूरा नाम है "श्रुति सेठ आलम" या "श्रुति आलम", और इनकी शादी नहीं बल्कि इनका निकाह हुआ था, और इनके शौहर का नाम दानिश आलम है।
आपको फोटो में जो शख्स दिख रहा है वो दानिश आलम है जो की श्रुति सेठ आलम का शौहर है, ये मैडम अपने प्रशंसको को नहीं बताती की इनका पूरा नाम क्या है, पर खुद को निष्पक्ष बताकर कठुवा पर तो कैंपेन चलाती है, पर असम पर चुप रहती है, वैसे देश को इनके बारे में भी सब जानना का हक़ तो है इसी कारण आज हमने आपके सामने इनके बारे में ये छोटी सी सच्चाई रखी।
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| पिताश्री एम.बी.एल.निगम |
मेरा तो जन्म ही पिताश्री के फिल्म व्यवसाय में रहते हुआ है। और आज भी यदाकदा फिल्मों पर लिखता रहता हूँ। मेरे पिताश्री एम.बी.एल.निगम 50 के दशक के चर्चित फिल्म वितरकों में सम्मिलित थे। उस समय परेड ग्राउंड,लाल किला, पर इनका अपना प्रेम टॉकीज़ के नाम से सिनेमा घर था। जो दरिया गंज से कश्मीरी गेट की ओर जा रही सड़क बनाने के कारण बन्द करना पड़ा था। लगभग 4 वर्ष कमाल अमरोही साहब के प्रोडक्शन कंट्रोलर रहे। (किसी कारणवश पाकीज़ा का निर्माण रुक गया था, उस समय फिल्म में अभिनेता गोविन्दा के पिताश्री अरुण ने भी काम किया था। इनके 600 रूपए बकाया थे, जिसे लेने के लिए अरुण साहब ने अपनी पत्नी निर्मला को भेजा। लेकिन अरुण साहब की कोई लिखत न होने के कारण मेरे पिताश्री ने भुगतान से साफ मना कर दिया। परन्तु कमाल साहब के आग्रह करने पर केवल 10/15 रूपए ही देकर, अरुण को खुद आने के लिए बोल दिया। निर्मला जी और कमाल साहब ने बहुत कहा "निगम साहब, ये अरुण साहब की बीबी है", पिताश्री ने कहा कि "फ़िल्मी शादी है, क्या पता दोनों का तलाक़ हो गया हो तो हमारे 600 रूपए का नुकसान मै तो भरूँगा नहीं।" अगले दिन अरुण साहब पिताश्री की बातें दोहराते खूब हँसे। अब सब इतिहास बन चुका है। )
खैर, आज किसी गैर-हिन्दू लड़की/महिला के बलात्कार पर जब बॉलीवुड के लोग विरोध में जो बोलते हैं, सर्वप्रथम उन्हें अपनी गिरिवान में झांक कर देखना चाहिए। जहाँ कदम-कदम पर यौन-शोषण होता रहता है। किसी की आवाज़ नहीं निकलती, क्यों? आए दिन समाचार आते रहते हैं कि कास्टिंग काउच ने या फलां निर्माता या निर्देशक ने यौन-शोषण किया या कोशिश की। मेरी ही आयु की डेज़ी ईरानी आज इतने वर्षों उपरान्त यौन-शोषण की बात बोल रही हैं, यह बॉलीवुड को ही सिद्ध करना है कि वहाँ किस सीमा तक यौन-शोषण होता रहता है। तमन्ना भाटिया कहती हैं कि "वह अपने मेकअप आर्टिस्ट के साथ सोती हैं", क्या है ये मजाक? आखिर शालीनता भी कोई चीज़ होती है। गूगल पर nude bollywood पर देखिए कितने असभ्य चित्र भरे पड़े हैं, जिनका आज तक किसी ने खण्डन तक नहीं किया। क्यों? क्या जनता में चर्चित रहने के लिए इतने असभ्य पोज़, शालीनता की सारी सीमाएँ ही लाँघ दी? यह कौन-से धर्म में लिखा है?
देश में आपातकाल के दौरान तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री ने एक आयोजन उपरान्त रात्रि में उस समय की एक चर्चित अभिनेत्री का यौन-शोषण करने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन निर्माता-निर्देशक बी.आर.चोपड़ा के ही कारण वह अपनी शीलता की रक्षा कर पायीं, क्या हुआ उस अभिनेत्री का? चोपड़ा साहब के अलावा लगभग सभी ने काम देना बंद कर दिया, कभी-कभार धारावाहिक या विज्ञापनों में नज़र आ जाती है। 80 के दशक की एक और चर्चित नायिका को एक साक्षात्कार में इसी गन्दगी के विरुद्ध आवाज़ उठाने के भयंकर परिणाम भुगतने पड़े। यानि फिल्में ही मिलनी बंद हो गयीं।
80 के ही दशक में स्वतन्त्र पत्रकारिता करते एक निर्माता-निर्देशक से फिल्मों में बढ़ती फूहड़ता पर पूछने पर, दिल्ली स्थित अपने कार्यालय में बुलाकर चित्र दिखाकर मेरे प्रश्न का मेरे से ही उत्तर देने को कहा। देखिए फिल्मों में काम करने के लिए कैसे-कैसे चित्र भेजे जा रही हैं। हम तो फिर भी तन पर कपडे दे रहे हैं, उसके बावजूद निर्माता-निर्देशक को दोषी बताया जाता है।
संक्षेप में केवल इतना ही कहना है, राजेश खन्ना और मुमताज़ अभिनीत एक फिल्म आयी थी "रोटी", जिसका यह सम्वाद बहुत चर्चित हुआ था, "पहला पत्थर वही मारेगा, जिसने कोई पाप नहीं किया हो"; इसी तरह का सम्वाद ऋषि कपूर और रंजीता अभिनीत फिल्म "लैला मजनू" में था कि "पहला पत्थर वही मारे, जिसने कभी प्यार न किया हो", बॉलीवुड वाले पहले अपने यहाँ फैली गन्दगी के विरुद्ध इसी शैली में बोलकर दिखाएँ, जिसने भी मुँह खोला, कोई एक्स्ट्रा में भी काम नहीं देगा।






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