| गैर-भाजपाइयों पर भारी होती त्रिमूर्ति |
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 27 को 11,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार 135 किलोमीटर लंबे ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे को राष्ट्र को समर्पित किया. इस मौके पर कहा कि तीन लाख करोड़ रुपये की लागत से देश में 28,000 किलोमीटर लंबे राजमार्गों का नेटवर्क खड़ा करने का काम किया है। इस कार्यक्रम में मोदी ने अपने भाषण में जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया उससे जाहिर हो चुका है कि उन्होंने 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है।
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| लगभग 24 वर्ष लिखे मेरे स्तम्भ का एक-एक शब्द आज भी चरितार्थ हो रहा है |
जगह-जगह हुए उपचुनावों में गैर-भाजपाइयों द्वारा एकजुट होने को जो भाजपा की घेराबंदी माना जा रहा है, उसमे ज्यादा दम नहीं। बसपा का रिकॉर्ड है कि इस पार्टी ने आजतक उपचुनाव में अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया, ऐसी स्थिति में दूसरी पार्टी को समर्थन देना विपक्षी एकता मानना बेमानी होगी। ठीक यही स्थिति अन्य दलों की है। जबकि लोकसभा चुनाव और उपचुनाव में ज़मीन आसमान का अन्तर है। इतना ही नहीं, जो लोग राहुल गाँधी को देश का भावी प्रधानमंत्री देख रहे हैं, वह भी भ्रम में हैं, क्योंकि इस परिवार से किसी का प्रधानमंत्री बनने का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता, तो 2004 या 2009 में डॉ मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि इसी परिवार से कोई प्रधानमंत्री बन गया होता। फिर अन्य दलों में भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार बहुत हैं। 


यह कांग्रेस का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इतनी पुरानी पार्टी होते हुए, क्षेत्रीय पार्टियों के आंगन में जाकर समझौता कर रही हैं। जो अपने आपमें प्रमाणित कर रहा है कि कांग्रेस धरातल पर आकर पाताल लोक की ओर अग्रसर है। कम्युनिस्ट की भाँति कांग्रेस भी एक दो राज्य तक ही सीमित होती नज़र आ रही है।यह भी देश के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। उसका कारण है, कि जितने बुद्धिजीवी कांग्रेस में आज भी विराजमान हैं, उतने किसी अन्य पार्टी में नहीं। जो हैं भी, सभी अवसरवादी हैं, दूरगामी सोंच वाले नहीं। यदि कांग्रेस को भाजपा के समक्ष खड़ा होना है, तो सर्वप्रथम परिवारवाद को त्यागना होगा और पार्टी में विराजमान बुद्धिजीवियों को सार्वजनिक पटल पर लाना होगा। अभी भी समय है, अन्यथा बहुत देर हो जाएगी, वैसे देर तो हो ही चुकी है।जितने भी गैर-भाजपाई हैं, सभी साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ने और जातिवाद को बढ़ावा देकर माहौल ख़राब कर सत्ता हथियाने को तत्पर हैं। हकीकत यह है कि राजनीती में इनकी रोजी-रोटी ही इस पर आधारित है।


देश में जाति आधारित कितनी पार्टियाँ बन चुकी हैं, लेकिन इनकी जाति में ही इतना साहस नहीं कि इनसे पूछे कि "पार्टी बनाने से पूर्व तुम्हारी आर्थिक स्थिति क्या थी और आज तुम्हारी तिजोरियाँ भी छोटी पड़ रही हैं और हमारी समस्याएँ वहीं की वहीँ है, क्यों? गरीबी तुम्हारी दूर हो गयी, हमारी क्यों नहीं हुई? तुमने तो अपनी वर्तमान पीढ़ी तो क्या दुनियाँ में आने वाली पीढ़ी का भी प्रबन्ध कर दिया, परन्तु हम उन्ही समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिसके समाधान के लिए तुम्हे अपना तन, मन और धन से समर्थन दिया।" कहीं पादरियों से तो कहीं मौलवियों से बयान दिलवाए जा रहे हैं, अगर वास्तव में मोदी और मोदी सरकार नकारा है, क्यों नहीं उन कमियों को उजागर कर मैदान में आते? दलितों का उत्पीड़न किस पार्टी के राज में नहीं हुआ? उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के कार्यकाल में क्या दलितों का उत्पीड़न नहीं हुआ? अखिलेश के राज में तो आगरा में समाजवादी पार्टी के एक मुस्लिम पदाधिकारी ने रेहड़ी वाले द्वारा रास्ता मांगने पर उसे पेशाब पिलाया गया था, तब कोई नहीं बोला? तब मायावती, कन्हैया, जिग्नेश और अन्य सभी दलित नेताओं को साँप सूंघ गया था। लेकिन उस रेहड़ी वाले के समर्थन आए हिन्दू संगठन। विकासपुरी दिल्ली में बेकसूर डॉ नारंग की मुसलमानों द्वारा हत्या कर दी जाती है, तब किसी को साम्प्रदायिकता नज़र नहीं आयी, अख़लाक़ पर कौओं की तरह बाहर आ गए। क्या इसी का नाम धर्म-निरपेक्षता है? कोई banana republic बोल रहा है, तो किसी को गंगा-यमुना तहजीब खतरे में आने लगती है? बताओ यह आरोप ठीक है या गलत? हिम्मत है तो जवाब दो। 


गांधीवादियों नाथूराम गोडसे की निन्दा करने से पहले कोर्ट में माइक से पढ़कर दिए गोडसे के 150 बयानों को पढ़ो। अगर गाँधी का वध नहीं किया होता, देश बहुत गम्भीर धर्म संकट से गुजर रहा होता। अपने घोषणा-पत्र के साथ उन बयानों को घर-घर तक पहुंचाओ। जस्टिस खोसला ने बयानों को सुन ऐसे ही नहीं कह दिया था कि "...if all the present inside the court and outside the court are asked to give their judgement after hearing the statements, everybody will say Nathuram Godse is not an accused, he is innocent." यह कथन जस्टिस खोसला ने केवल कोर्ट में ही नहीं, अपनी पुस्तक में भी लिखा है। जो सिद्ध करता है कि नेता समाज अपने स्वार्थ के लिए देश को किस सीमा तक भ्रमित कर सकता हैं। ![]() |
Muslims misled over Ayodhya, says KK Mohammed
THE ASIAN AGE. | VARUN SINGH
Published : May 11, 2017, 2:38 am IST
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इसके साथ ही राजनीतिक पंडित 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और विपक्षी दलों की ताकत को लेकर गुणा-भाग करने में जुट गए है। आगामी आम चुनाव के मायने इसलिए भी बढ़ गए हैं क्योंकि एक तरफ जहां बीजेपी है, तो दूसरी तरफ सभी मुख्य विपक्षी दलों के एक साथ लड़ने की तैयारी है। हालांकि ये तो वक्त ही बताएगा कि विपक्षी दलों की एकजुटता 2019 के लोकसभा चुनाव तक कायम रहती है या नहीं।
मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर कराए गए ज्यादातर सर्वे में 2019 में बीजेपी की आसान जीत की बात कही जा रही है, लेकिन राज्यों के विधानसभा की मौजूदा हालत पर नजर डालें तो रास्ते थोड़े मुश्किल दिख रहे है। आइए कुछ आंकड़ों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की राह आसान नहीं होगी या बहुत कठिन है डगर सत्ता की?
29 में से केवल 10 राज्यों में है BJP का पूर्ण बहुमतदेशभर में कुल 29 राज्य हैं, जिसमें से 21 राज्यों की सरकारों में बीजेपी शामिल है. हालांकि इसमें से केवल 10 राज्यों में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार है. मेघालय में बीजेपी भले ही सरकार में शामिल है, लेकिन यहां बीजेपी के केवल 2 विधायक हैं. बिहार में बीजेपी+जेडीयू की गठबंधन सरकार है, लेकिन यहां 243 विधानसभा सीटों में से बीजेपी के पास केवल 53 विधायक हैं. जम्मू कश्मीर में बीजेपी+पीडीपी की सरकार है, लेकिन यहां की 87 सीटों में से बीजेपी के केवल 25 विधायक हैं. गोवा में बीजेपी के मनोहर पर्रिकर की अगुवाई में सरकार चल रही है, लेकिन यहां की 40 सीटों में से बीजेपी के केवल13 विधायक हैं.

इन 6 राज्यों से हैं बीजेपी के ज्यादातर विधायकदेश में कुल 4139 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें से बीजेपी के पास 1516 सीटें हैं. गौर करने वाली बाती यह है कि इसमें से 950 सीटें छह राज्यों से आती हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान. बाकी के 23 राज्यों को मिलाकर बीजेपी के पास 566 विधानसभा सीटे हैं.
इन राज्यों में बीजेपी के हैं गिनती के विधायकआंध्र प्रदेश की 294 विधानसभा सीटों में से केवल 9 पर बीजेपी के विधायक हैं. वहीं केरल की 140 विधानसभा सीटों में से केवल एक पर बीजेपी के विधायक हैं. पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से केवल 3 पर बीजेपी का कब्जा है. पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें से केवल 3 पर बीजेपी के विधायक हैं. इसी तरह तेलंगाना की 119 विधानसभा सीटों में से केवल 5 विधायक बीजेपी के हैं.
दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से केवल 3 पर बीजेपी विधायक हैं. उड़ीसा की 147 सीटों में से केवल 10 पर बीजेपी के विधायक हैं. नागालैंड की 60 में से केवल 12 पर बीजेपी के विधायक हैं. तमिलनाडु, मिजोरम और सिक्किम में बीजेपी की एक भी सीट नहीं है.
आंकड़े बयां कर रहे हैं कि साल 2019 में अगर सारे विपक्षी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ते हैं तो बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती हो सकती है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी कई मौकों पर विपक्षी दलों की एकता से मुश्किल होने की बात स्वीकार चुके हैं. ऐसे में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह को मिलकर नए सिरे से 'मिशन 2019' की रणनीति बनानी होगी.
किस पार्टी का चाणक्य क्या रणनीति बनाता है, जनता को भी अपनी रणनीति बनानी होगी। जो भी पार्टी किसी भी चुनाव में वोट माँगने आए, उससे निम्न प्रश्न करिए:--
1. कब तक देश को धर्म और जाति के नाम पर बांटा जाएगा?
2. कब तक बेकसूर जनता की लाशों पर रोटियाँ सेकी जाएँगी?
3. देश को वास्तविक इतिहास से कब अवगत करवाया जाएगा?
4. देश के वास्तविक इतिहास को धूमिल करने वाले इतिहासकारों को कब दण्डित किया जाएगा? विदेशों में किसी को देश के इतिहास से छेड़छाड़ करने की इजाजत नहीं। भारत है कि जहाँ इतिहास से छेड़छाड़ करने वालों को सम्मानित किया जाता है और वास्तविकता की बात करने वाले को फिरकापरस्त, दंगाई, साम्प्रदायिक और न जाने कितने नामों से बदनाम किया जाता है।
5. देश से भ्रष्टाचार की अर्थी कब निकालोगे?
6. देश से तुष्टिकरण का जनाजा कब निकालोगे?
7. देश से आरक्षण के नाम कब तक प्रतिभाशाली युवा/युवतियों का शोषण बन्द होगा?
8. कोर्ट में झूठी गवाही(रामजन्मभूमि आदि केस) देने वालों पर कब कानून बनाओगे?
9. धर्म और जाति के आधार पर निर्णय लेने कब बन्द होंगे?
10. चुनाव में धन और शराब पर पाबन्दी कब लगेगी?आदि आदि।
जिस दिन जनता जागृत होकर नेताओं से उपरोक्त प्रश्नों को दूर करने का दबाव बनाएंगे, जनता की आधी से ज्यादा समस्याएँ अपने आप दूर हो जाएंगी। क्योकि चुनाव में धन और शराब वितरण ही आम नागरिकों को नितरोज नई समस्या पैदा करवाती है। आतंकवादियों के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट भी खुल जाती है, लेकिन आम नागरिक अदालतों के चक्कर ही काटता रहता है।



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