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यूनिफार्म सिविल कोड से मुस्लिम समाज में भय क्यों फैलाया जा रहा है?

Image result for imam ahmed bukhariपिछले कुछ दिनों से हर जगह मुस्लिम महिलाओं पर हो रहे ज़ुल्म की कहानी सामने आ रही हैं। मुस्लिम महिलाओं में हलाला का डर हर वक़्त बना रहता हैं।
शादी को जैसे मज़ाक़ बना दिया मुस्लिम पुरुषों ने। खाने में नमक ज़्यादा हो तो तलाक़, लड़की को जन्म दे दिया तो तलाक़, बिजली नहीं आ रही तो तलाक़। तीन तलाक़ का मुद्दा बहुत दिनों से छिड़ा हुआ हैं। सभी मुस्लिम महिलायें एक डर के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं। सभी मुस्लिम महिलाओं को हर वक़्त ये ही डर लगा रहता हैं कि कही उनका शोहर तलाक़ तलाक़ तलाक़ बोल कर उन्हें तलाक़ ना दे दे।
मुस्लिम महिलाएं रो-रो कर  बोल रही की अब मेरी और मेरे बच्चे की जिम्मेदारी कौन लेगा? एक मुस्लिम महिला की उम्र केवल 20 साल और उसके 2 शौहरों ने 2 बार उसको तलाक़ दे दिया। वो अब कह रही की जहर खा लुंगी पर निकाह नहीं करुँगी। वो निकाह के नाम से भी डर रही हैं। हाथ में बच्चा लेकर घूम रही हैं और उनके शोहर दूसरी बार निकाह कर मजे लूट रहे हैं। और साथ में हलाला का तो धंधा ही चल पड़ा है।
नाइश हसन जो मुस्लिम महिलाओं के लिए काम कर रही हैं, उनका कहना हैं कि उनके पास सैंकड़ो मुस्लिम महिलाओ के उदाहरण है, जिनका मौलवी ने महिलाओं का 7-7 बार हलाला किया।
वही दूसरी ओर कट्टरपंथी मुस्लिमों का कहना हैं कि ये तो शरिया में हैं। हम सिर्फ़ शरिया का पालन कर रहे हैं और हमेशा करते रहेंगे। ट्रिपल तलाक़ और हलाला कभी ख़त्म नहीं होगा।
इससे यही साबित होता हैं कि कट्टरपंथी मुस्लिम शरिया के नाम पर अत्याचार हमेशा बनाये रखना चाहते हैं। जब निकाह होता हैं तब तो महिला से तीन बार पूछा जाता हैं कि क्या तुम्हें क़ुबूल हैं, फिर तलाक़ के लिए क्यूँ नहीं पूछा जाता हैं। सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाएं ही अपने सम्मान के लिए पहुँची। और ये कट्टरपंथी महिलाओ से ही उपजे हुए है और उन्ही को बराबरी नहीं देना चाहते, कदाचित बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ठीक कहते है की ये लोग बात से नहीं बल्कि थोपने से ही मानेंगे, क्योंकि सेक्युलर भारत में शरिया नहीं चल सकता, मुस्लिम महिलाओ को बराबरी का हक मिलना ही चाहिए।
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ये है मालपुए खाने वालों का प्रदर्शन, झंडे और  
लेकिन दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम बुखारी नें प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को सख्त चेतावनी दी है। इमाम बुखारी ने अक्टूबर 21  को कहा कि यदि मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक को ख़त्म करने की कोशिश की तो खुद मोदी सरकार ही ख़त्म हो जाएगी।
इमाम बुखारी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि वो यूनिफार्म सिविल कोड को मुसलमानों पर जबरन थोपना चाहते  हैं। इसके बाद इमाम ने देश के सभी हिन्दुओ, मुस्लिमों, दलितों और ईसाईयों को यूनिफार्म सिविल कोड का विरोध करने के लिए कहा। 
Image result for rashtriya muslim manchगौरतलब है कि मुसलमानों को छोड़कर वैसे भी देश के अन्य सभी वर्ग देश का क़ानून मानते हैं। केवल मुसलमान ही मुस्लिम पर्सनल लॉ मानते हैं वो भी आधा-अधूरा। शादियों और तलाक के विषय में वो पर्सनल लॉ मानते हैं और अन्य कई जुर्मों के लिए वो देश का क़ानून मानते हैं जिसमे सज़ा पर्सनल लॉ  के मुकाबले नहीं के बराबर  दी जाती है।
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क्या इन लोगों ने मंगलवार को बिकने वाले मीट के विरुद्ध आवाज़ उठाई?
इमाम ने मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि यूनिफार्म सिविल कोड भारत के 26 करोड़ मुसलमानों की भावनाओं के खिलाफ है। इमाम ने कहा कि विवाह और तलाक के बारे में मुसलमानों को किसी भी सरकारी सुझाव या सलाह की जरुरत नहीं है। गौरतलब है कि कई मुस्लिम महिला संगठन  4 शादियों और ट्रिपल तलाक का विरोध कर रहे हैं। उनके मुताबिक़ ट्रिपल तलाक महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उलंघन है।
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बस सेल्फी लेकर भुनाने का रास्ता 
अब आपकी बारी
स्वांग देखिये: महिला रैली में पुरुष कहाँ से आ गए?
वैसे यूनिफार्म सिविल कोड जनसंघ के समय से ही पार्टी के घोषणा पत्र में रहा है। 1996 में एनडीए सरकार बनाने के लिये भाजपा ने अपनी पुरानी तीन मांगों को त्याग सरकार बनाने पर भाजपा की आलोचना भी खूब हुई थी, और होनी भी चाहिए थी। विपक्ष में बैठना स्वीकार करना था, लेकिन इन तीनों को नहीं त्यागना था। मध्यवर्द्धि चुनाव तो होने ही थे, तब भाजपा शायद अपने ही दम पर सरकार बना लेती। परंतु तब राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव था। जो आज नहीं बल्कि आज दृढ़ शक्ति अपने चरम पर है, उसी कारण वर्तमान सरकार इस मुद्दे को उठाने का साहस कर पायी है।  अब वो समय आ गया है जब सरकार को देश में यूनिफार्म सिविल कोड लागू कर देना चाहिए। अगर सरकार यूनिफार्म सिविल कोड देश में लागू कर देती है तो  2019 में होने वाले चुनावों में, अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने पर जो ध्रुवीकरण नहीं हुआ था, वो होकर रहेगा। उस स्थिति में मुस्लिम समाज को विषम परिस्थितियों से गुजरना होगा। और शायद ही कोई छद्दम धर्म-निरपेक्ष/समाजवादी इनके साथ खड़ा हो।
इस सन्दर्भ में अवलोकन करें :--
जब से तीन तलाक़ को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है और भारत सरकार के हलफ़नामे को लेकर राजनीति गरमाई है, तब से ही मुस्लिम संगठन इसका...
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भाजपा और संघ के मुस्लिम  प्रकोष्ठ  एकजुट होकर सड़क पर क्यों नहीं आते?
लेकिन भाजपा और संघ इस मुगालते में न रहे, कि अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ इस मुद्दे पर साथ देंगे। जब कार्यकाल में संघ के इस प्रकोष्ठ नेता अपनी रिपोर्ट प्रकाशित करने आते, मेरा उनसे एक ही प्रश्न होता "क्या कारण है मुस्लिम क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त होती है? कहने को भाजपा के साथ-साथ अब तो संघ ने भी प्रकोष्ठ खोल दिया है? ये दोनों हाथों से लड्डू खाना कब छोड़ोगे?" मेरी बात सुन तिलमिलाहट देखते बनती थी। लेकिन चेहरा पीला पड़ जाता जब उनको मेरे श्रीमुख से यह सुनने को मिलता "भाईजान मेरी शिकायत सम्पादक से लेकर सरसंघचालक और सरसंघचालक से लेकर अटल बिहारी तक जाकर किसी से भी कर दो, कोई डर नहीं। लेकिन मेरे प्रश्न का संतोषजनक उत्तर जरूर दिलवा देना।" भारतीय राजनीति इतनी अधिक गन्दी हो चुकी है, दुनिया में मिसाल मिलनी मुश्किल है। जो समाज बहुसंख्यक के बाद दूसरे स्थान पर है, अल्पसंख्यक कैसे हो सकता है? इस मुद्दे पर भी बहस जरुरी है।  
यदि भाजपा और संघ द्धारा संचालित यह दोनों प्रकोष्ठ सरकार का पक्ष मजबूत करने के लिए उन लोगों के विरुद्ध धरना, प्रदर्शन अथवा भूख हड़ताल क्यों नहीं करते, जो सरकार को डराने की हिम्मत कर रहे हैं।फिर वो चाहे नेता हो या इमाम। टीवी परिचर्चा में देखो तो इन पार्टियों के हिन्दू प्रवक्ता ही सामने आते हैं, ये प्रकोष्ठ क्या केवल मालपुए खाने के लिए हैं ?      

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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