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खंजर से चीरी कोख, निर्वस्त्र की गई बहन… सब भूल जाओ, जिया की चाँद बाली पर लिखो नज्म: Arfa Khanum को क्यों भायी इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊँगा’?

घर की माँ-बहन-बेटी का चाहे बलात्कार हो जाए, गर्भवतियों की कोख चीर दी जाए, चाहे एक साथ सारी महिलाएँ अपना गला खुद रेतने को मजबूर हो जाएँ… लेकिन आपकी स्मृति में रहनी चाहिए एक मुस्लिम लड़की की चाँद बालियाँ, उसके प्रेम में लिखी गई सिख लड़के की नज्म और लाहौर के सरगोधा की गलियाँ…

यही मकसद है 12 जून को पर्दे पर आई इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ का। इस फिल्म में कलाकार के तौर पर दिलजीत दोसांझ, नसीरुद्दीन शाह मुख्य कलाकार हैं। फिल्म कैसी है इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि इसकी तारीफ करने वालों में एक नाम आरफा खानम शेरवानी जैसों का भी है जिन्हें ये फिल्म विभाजन के जख्मों पर मरहम लगाने वाली एक ‘कविता’ जैसी लगती है।

आरफा इस फिल्म को देखकर रोने लगती हैं क्योंकि उनसे ये नहीं देखा जाता है कि कैसे इतने समय बाद पर्दे पर कीनू की कहानी के रूप में उनके नैरेटिव का कंटेंट आया है।

इंटरनेट पर फिल्म के बारे में पढ़ने चलेंगे तो पता चलेगा इम्तियाज अली ने कहने को ये फिल्म विभाजन के दर्द को बयाँ करते हुए बनाई है, लेकिन जब देखेंगे तो खुद से सवाल पूछेंगे कि क्या सच में ये फिल्म विभाजन की त्रासदी का सही चित्रण करती है, या फिर ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के नाम पर इतिहास को धुँधला करने का एक और बॉलीवुड प्रयास है?

फिल्म की मूल कहानी एक सिख बुजुर्ग ‘कीनू’ (नसीरुद्दीन शाह) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिन्हें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर 1947 के विभाजन के दौरान लाहौर में छूटा अपना पहला प्यार याद आता है। यह प्यार एक मुस्लिम लड़की ‘जिया’ से था, जो विभाजन की वजह से मुकम्मल नहीं हो सका। भारत आकर कीनू सब भुलाकर कड़ी मेहनत से वो सब हासिल करता है जो लाहौर में छूट गया था, लेकिन जीवन के आखिरी पलों में वे जिया पर आकर दोबारा रुक गए है, उनकी यादश्त में सिर्फ जिया और जिया की कहानी चल रही है। उन्हें ये दर्द नहीं है कि उनकी घर की औरतों के साथ क्या हुआ…

फिल्म में कीनू जब अपने पोते (दिलजीत दोसांझ ) को यह प्रेम कहानी सुनाने की शुरुआत करते हैं, वहीं से फिल्म का नैरेटिव साफ होने लगता है।

सबसे शर्मनाक चीज ये पकड़ में आती है कि फिल्म निर्माता यहाँ क्रिएटिव लिबर्टी और सौहार्द बनाने की आड़ में बड़ी चालाकी से मजहबी दंगाइयों को ढाँकने की कोशिश करते हैं और मजहबी दंगाइयों को MARS से आए प्राणी बताकर पेश करते हैं।

फिल्म में विभाजन के दर्द को, गैर-मुस्लिमों पर हुए अत्याचार को पूरी तरह एक सूफियाना रोमांस के पर्दे के पीछे छिपा दिया है। विभाजन की इस अथाह पीड़ा को एक प्रेम कहानी के तौर पर परोसा गया है।

ढाई घंटे की इस फिल्म में माताओं-बहनों के साथ हुई बर्बरता, बच्चियों के गले रेते जाने और खचाखच भरी लाशों की ट्रेनों के उस खौफनाक सच को महज 5 से 10 मिनट के दृश्यों में समेट कर किनारे कर दिया गया।

फिल्म का अंत होते-होते उस खूनी इतिहास को इस तरह भुला दिया जाता है, मानो वह कोई बड़ी घटना थी ही नहीं।

फिल्म में गैर-मुस्लिम औरतों के साथ हुई वीभत्सता को एक डॉयलॉग ‘हमारे घर को श्राप है कि कोई औरत नहीं बचेगी’ जैसे डॉयलॉग के साथ भी समेटने का प्रयास हुआ है।

देखने वालों को ये लगे कि बुजुर्ग कीनू के भीतर अब भी महिलाओं के साथ हुए अत्याचार का दर्द है और पर्दे पर उनके साथ वीभत्सता करने वालों की कहानी भी न आए।

क्या सिर्फ एक डॉयलॉग या 5-7 मिनट के सीन से आप सोच सकते हैं कि विभाजन के वक्त हिंदू-सिख औरतों के साथ दंगाइयों ने क्या किया होगा।

प्रेम कहानी के नाम पर विभाजन का दर्द बताने का दावा करने वाली ये फिल्म बिलकुल वैसी करतूत है जैसा कुछ समय पहले विधु विनोद ने ‘शिकारा’ परोस कर की थी। उसमें भी कश्मीरी पंडितों के वास्तविक विस्थापन और दर्द को बताकर फिल्म ‘शिकारा’ का प्रमोशन हुआ और आखिर में वो सिर्फ एक प्रेम कहानी निकली। इस बार भी पीड़ितों की चीखों को दबाकर उनके दर्द का सरलीकरण किया जा रहा है।

फिल्म में जगह-जगह सोच-समझकर ‘बैलेंसिंग एक्ट’ दिखाने की कोशिश हुई है। कहानी में दिखाया गया है कि अगर सामने मजहबी दंगाई थे, तो ‘मुस्तफा’ जैसे लोग भी थे जिन्होंने अपनों को खोकर भी सिख परिवार की जान बचाई।

बेशक इतिहास में इंसानियत के ऐसे उदाहरण रहे होंगे, लेकिन फिल्म निर्माता ने जिस तरह उन्हें पेश किया है और जैसे मजहबी कट्टरपंथ को ढाका है, उससे उनकी मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि उजड़े हुए हिंदू-सिख घरों के पीछे उनके पड़ोस में रहने वाले मजहबी कट्टरपंथियों का हाथ नहीं था, बल्कि मानो वे लोग किसी दूसरे ग्रह ‘मार्स’ से आए थे।

इम्तियाज अली की मंशा तब और ज्यादा बेनकाब हो जाती है, जब वे विभाजन का दर्द बताते-बताने अचानक लेबनान और गाजा की समकालीन क्लिप्स चलाने लगते हैं।

एक बार को ये देख ऐसा लग सकता है कि वे इसे यहाँ विस्थापन की पीड़ा बयान करने के लिए दिखाते हैं लेकिन हकीकत में उनका मकसद दर्शकों के दिमाग में एक खास तरह की राजनीतिक धारणा को बिठाना था।

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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