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डियर निब्बा-निब्बी! रोना-धोना छोड़ खुद को मेच्योर बनाओ, क्योंकि जीवन ‘सैयारा’ है…

                                                   

                                     फिल्म सैयारा का एक सीन (फोटो साभार: Indianexpress)
                                     सैयारा मैं सैयारा, सैयारा तू सैयारा
                                     
सितारों के जहाँ में मिलेंगे अब यारा

वैसे तो ऊपर की पंक्तियाँ सलमान खान और कटरीना कैफ की फिल्म ‘एक था टाइगर’ के एक गाने की हैं। यह फिल्म 2012 में रिलीज हुई थी। 13 साल बाद एक बार फिर अरबी भाषा का शब्द ‘सैयारा’ चर्चा में है। मोटे तौर पर सैयारा का अर्थ गतिमान या सफर होता है। पर जब यह शायरी का लिबास ओढ़ती है तो इसका उपयोग प्रेम/आकर्षण के लिए भी होता है। मोटे तौर पर यह आकर्षण दैहिक ही होता है।

अभी सैयारा (Saiyaara) नाम से एक फिल्म आई है। इसमें मुख्य भूमिका में अहान पांडे और अनीता पड्डा हैं। ‘यश राज फिल्म’ के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन मोहित सूरी ने किया है।

अब इस फिल्म से दिल्ली के साकेत में रहने वाले हाईकोर्ट के वकील प्रियांशु तिवारी की आपबीती पर चलते हैं। प्रियांशु बताते हैं कि वे जिस चार मंजिला इमारत में रहते हैं, एक दिन उसकी छत पर वह रात का भोजन करने के बाद खुले आसमान को देखने पहुँचे थे। यहाँ उन्हें उस इमारत में रहने वाली पड़ोस की एक लड़की मिली। उसने सैयारा उसी दिन देखी थी, जिस दिन यह फिल्म रिलीज हुई थी। कई घंटों बाद भी वह इस फिल्म से ‘प्रभाव’ से उबर नहीं पाई थी। वह अचानक से इस फिल्म की कहानी प्रियांशु को सुनाने लगती है।

 यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि एक ही इमारत में रहने के बावजूद दोनों का इससे पहले कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कोई संवाद नहीं हुआ था। प्रियांशु बताते हैं कि कहानी सुनाते हुए लड़की बार-बार इमोशनल हो रही थी। उन्हें इस कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी उस लड़की ने हाथ पकड़कर करीब दो घंटे तक जबरदस्ती कहानी सुनाई। इस दौरान वह कई बार फूट-फूटकर रोई भी।

प्रियांशु बताते हैं कि पूरी कहानी सुनने के बाद भी उन्हें यह समझ नहीं आया कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जो कोई फूट-फूटकर रोने लगे? कोई युवा लड़की इसे जीवन से जोड़ ले?

इस ‘पागलपन’ के अकेले प्रियांशु ही पीड़ित नहीं हैं। या फिर उनकी इमारत में रहने वाली वह लड़की ही पागल नहीं है। सोशल मीडिया पर तो ऐसे वीडियोज की बौछार लगी है, जिसमें कई लड़के-लड़कियाँ थिएटर में ही इस फिल्म को देखते हुए चींखते-चिल्लाते रोते नजर आते हैं। हैं।

किसी वीडियो में रोता हुआ दिखने वाला कोई सिरफिरा आशिक है, जिसे उसे कथित प्रेमिका छोड़कर जा चुकी है। और वह किसी नई प्रेमिका की तलाश है।  

इस पागलपन ने सैयारा के बॉक्स ऑफिस के प्रदर्शन को भी चर्चा में ला दिया है। फिल्म 6 दिन में ही करीब ₹150 करोड़ की कमाई कर चुकी है। साल 2025 की ब्लॉकबस्टर मूवी में शामिल हो चुकी है। वर्ल्डवाइड कलेक्शन में अक्षय कुमार की ‘केसरी-2’ और सनी देओल की ‘जाट’ को पीछे छोड़ दिया है।

मीडिया ‘सैयारा’ की कमाई और ‘यश राज फिल्म’ की प्रमोशन रणनीति के आगे बिछ गई है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी नई पीढ़ी के इस ‘पागलपन’ पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। यह सत्य है कि हर पीढ़ी ऐसी ही किसी बेतुकी ‘प्रेम कहानी’ के पीछे पागल होती है। मेरे से पहले की पीढ़ी ‘तेरे नाम’ के ‘राधे’ तो उससे भी पहले की पीढ़ी ‘डर’ के ‘राज’ को देखकर इसी तरह पागल हुई थी। पर हमें समझना होगा प्रेम और आकर्षण एक नहीं है।

मैं मानती हूँ हर लड़की/लड़का उस उम्र में आते हैं, जब वे इन दोनों को एक ही समझ बैठते हैं। अपनी दबी इच्छाओं (जो अक्सर दैहिक होते हैं) को प्रेम का नाम देकर विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षित होते हैं। मैं यह भी समझती हूँ उम्र के इस दौर में शरीर के हार्मोन भी बहुत तेजी से बदलते हैं। लेकिन इससे प्रेम और आकर्षण एक नहीं हो जाते।

भले बॉलीवुड की फिल्में या उसके गाने जैसे 16 बरस की बाली उम्र को सलाम, मैं 16 बरस की तू 17 बरस का, ऐसा पहली बार हुआ है 17-18 सालों में… यह बताते हों कि प्रेम करने की आयु यही होती है, लेकिन वास्तविक सत्य तो यही है कि लड़का हो या लड़की उसके लिए, यह उम्र अपने ज्ञान का कोष बढ़ाने, खुद को परिपक्व बनाने, अपने करियर की दिशा तय करने की होती है। इसी से यह तय होता है कि हमारी जिंदगी कितनी सैयारा (गतिमान) होगी। वैसे भी जिंदगी एक वास्तविकता है, किसी शायर की कल्पना नहीं।

जिस दौर में प्रेम को लिव-इन रिलेशन के तौर पर परिभाषित किया जाता हो, जिस दौर की Gen Z सिच्वुएशनशिप, ब्रेडक्रम्बिंग, बेंचिंग, घोस्टिंग, लव बॉम्बिंग, कफिंग सीजन, पॉकेटिंग, ड्राई डेटिंग, रिज जैसे टर्म से परिभाषित करती हो, जो अपने शरीर के भीतर आ रहे बदलावों को लेकर ऐसी चर्चाएँ करती हो जो छाती और योनि के ईर्द-गिर्द सिमटी हो, उसे प्रेम और आकर्षण का फर्क ऐसे समयकाल में बताना जब वह डोपामाइन, सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के प्रभाव में हो, कठिन है।

पर हमें फिर भी यह बात करनी होगी। बार-बार करनी होगी। क्योंकि जीवन का सैयारा (गतिमान) होना कठिन फैसलों पर ही निर्भर करता है।

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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