उनके समय में जीएसटी को लेकर की गई पहली रिसर्च
1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे, उसी दौरान इस पर चर्चा शुरू हो गई थी। उसके बाद साल 2003 में वित्त केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह की पहल पर केंद्र सरकार को सर्विस टैक्स लगाने का अधिकार देने के लिए संविधान में संशोधन किया गया था। फाइनेंस मिनिस्टर जसवंत सिंह ने अपने सलाहकार और पूर्व वित्त सचिव विजय केलकर को फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी और बजट मैनेजमेंट (एफआरबीएम) एक्ट को लागू करने का जिम्मा सौंपा। इस टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में विदेश में अपनाए गए गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) पर पेश की। इस रिपोर्ट में राज्यों के लिए 7 फीसदी और केंद्र के लिए 5 फीसदी टैक्स की दरें तय की गई थी। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के ही समय में जीएसटी का कॉन्सेप्ट सामने आया था।
साल 2014 में हुआ तेजी से हुआ काम
अवलोकन करें:--
जीएसटी की नींव रखने में वाजपेयी का था अहम रोल
1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में फाइनेंस मिनिस्टर यशवंत सिन्हा ने टैक्स सुधारों के अधूरे कार्यों को पूरा करने का बीड़ा उठाया था। वाजपेयी और सिन्हा की पहल पर केंद्र और राज्यों की सरकारें सेल्स टैक्स विवाद को खत्म करने पर सहमत हो पाईं। जनवरी, 2000 से विभिन्न कमोडिटीज पर देश भर में समान टैक्स की दरें लागू करने पर सहमति बनी। इसके साथ ही देश में वैट लागू करने की प्रक्रिया शुरू हुई। वैट देश में 1 अप्रैल 2005 को लागू हुआ था। वैट के बाद विदेश में कारगर हुए जीएसटी टैक्स सिस्टम पर सरकार ने रिसर्च कराई।
संसद में पास कराने में विफल रही थी सरकार
2013-14 में यूपीए सरकार विधेयक को संसद से पास कराने में विफल रही। जीएसटी बिल लैप्स कर गया। हालांकि, तत्कालीन यूपीए सरकार ने हार नहीं मानी। नए टैक्स सिस्टम की रीढ़ माने जाने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्सेशन नेटवर्क (जीएसटीएन) को प्रमोट करने के लिए इंफोसिस के पूर्व सीइओ नंदन निलेकणी की अगुवाई में एक कमेटी बनायी गई। कमेटी ने सभी हिस्सेदारों को जीएसटी के फायदे बताए और इसे लागू करने की अपील की।
अटल सरकार का कार्यकाल प्राइवेटाइजेशन का था
1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान पीएसयू कंपनियों के प्राइवेटाइजेशन का गोल्डन पीरियड रहा। वाजपेयी हमेशा से इस बात के पक्षधर थे कि बिजनेस में सरकार की भूमिका कम से कम होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने अपनी सरकार में अलग से डिसइन्वेस्टमेंट डिपार्टमेंट बनाया था। उनके कार्यकाल में देश की सबसे बड़ी कार मेकर कंपनी मारुति सुजुकी समेत अन्य कंपनियों का निजीकरण हुआ था।
अरूण शौरी बने थे डिसइन्वेस्टमेंट डिपार्टमेंट के हेड
पीएसयू कंपनियों में सरकार की दखलनदाजी कम करने और कंपनियों के बेहतर परफॉर्मेंस और ग्रोथ के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने अलग से डिसइन्वेस्टमेंट डिपार्टमेंट बनाया था। एनडीए सरकार ने अलग से कैबिनेट कमिटी ऑन डिसइन्वेस्टमेंट (CCD) का निर्माण किया जिसके हेड अरूण शौरी थे। इसका मकसद सरकारी कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी कम करना और ट्रांजैक्शन जल्द से जल्द पूरा करना था।
इन कंपनियों का हुआ निजीकरण
वाजपेयी सरकार के दौरान भारत एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड (BALCO), हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, मारुति उद्योग लिमिटेड, मॉर्डन फूड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, एचडीएल लिमिटेड, सीएमसी लिमिटेड, इंडिया पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड, विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) होटल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के अंतर्गत 2 होटल यूनिट्स और इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ITDC) के 17 होटल प्राइवेट कंपनियों को बेचे गए।

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