रॉफेल के मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी,एनडीए सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। संसद में अविश्वास प्रस्ताव के बाद सड़क पर वो चीख चीख कर कहते हैं कि मौजूदा सरकार में जबरदस्त घोटाला हुआ। सरकार जानबूझ कर अपने आप को पाकसाफ साबित करने में जुटी है। लेकिन केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि राफेल डील की कीमत के बारे में राहुल गांधी को ये बताना चाहिए कि सौदे की कीमत क्या था। सच तो ये है कि यूपीए सरकार ने डील की कीमत जितनी तय की थी उसकी तुलना में एनडीए सरकार ने डील की कीमत 9 फीसद कम तय की।रॉफेल डील पर बीजेपी ने कांग्रेस पर साधा निशाना
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि राहुल गांधी इतने हताश हो गए है कि झूठ बोलने की पराकाष्ठा कर रहे है। राहुल गाँधी अपने झूठे प्रचार के क्रम में देश हित की कितनी अनदेखी करेंगे? रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस की तो ये आदत रही है कि जब वो सत्ता में नहीं रहते हैं तो तरह तरह के झूठ बोलते रहते हैं। कांग्रेस की तरफ से जब जब आरोप लगाए गये वो गलत साबित हुए। किसी भी तरह से कांग्रेस सत्ता में आना चाहती है लिहाजा वो अनर्गल आरोप लगा रही है।
राहुल गाँधी का आरोप अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के बहाने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को सरकार के खिलाफ 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने का एक मुद्दा मिल गया है। यह मुद्दा होगा राफेल बनाम बोफोर्स। गौरतलब है कि 1989 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के प्रधान मंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी को बोफोर्स तोप की खरीद में हुए कथित घोटाले के चलते हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस इस बार बाजी पलटना चाहती है और नरेन्द्र मोदी की सरकार को बोफोर्स सौदे की कथित दलाली का जवाब राफेल विमान की खरीद में हुए घपले से देना चाहती है।
गौरतलब है कि पिछले एक से दो दशक के बीच भारत को
सुरक्षा के मोर्चे पर तमाम पड़ोसी देशों से मिल रही चुनौतियों का सामना
करने के लिए वायुसेना की ताकत को बढ़ाने के मद्दे नज़र लड़ाकू विमान खरीदने
का का निर्णय लिया गया था। इसकी पहल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी
वाजपेयी के कार्यकाल में हुई थी लेकिन 126 लड़ाकू विमानों की खरीद का यह
प्रस्ताव उनकी उत्तराधिकारी कांग्रेस सरकार में परवान चढ़ा था। यूपीए सरकार
में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी की अगुवाई वाली रक्षा खरीद परिषद ने
अगस्त 2007 में 126 एयरक्राफ्ट की खरीद को मंजूरी दे दी। फिर बिडिंग यानी
बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई और अंत में लड़ाकू विमानों की खरीद का
आरएफपी जारी कर दिया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक लड़ाकू विमानों की रेस में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्टा राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्कॉन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे, लेकिन राफेल ने बाजी मारी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक लड़ाकू विमानों की रेस में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्टा राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्कॉन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे, लेकिन राफेल ने बाजी मारी।
कहा गया कि राफेल की कीमत दौड़ में शामिल बाकी जेट्स की
तुलना में काफी कम थी और इसका रख-रखाव भी काफी सस्ता था। दूसरी तरफ, ये 3
हजार 800 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है। यही वजह थी कि डील राफेल के पाले
में गई। उसके बाद भारतीय वायुसेना ने कई विमानों का तकनीकी परीक्षण और जांच
किया। यह प्रक्रिया 2011 तक चलती रही। वायुसेना ने जांच-परख के बाद 2011
में कहा कि राफेल उसके पैरामीटर पर खरे हैं। अगले साल यानी 2012 में राफेल
को बिडर घोषित किया गया और इसके उत्पादन के लिए डसाल्ट एविएशन के साथ
बातचीत शुरू हुई। हालांकि तमाम तकनीकी व अन्य कारणों से यह बातचीत 2014 तक
किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। 2012 से लेकर 2014 के बीच बातचीत किसी नतीजे
पर न पहुंचने की सबसे बड़ी वजह थी विमानों की गुणवत्ता का मामला। कहा गया
कि डसाल्ट एविएशन भारत में बनने वाले विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी
लेने को तैयार नहीं थी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी एकमत वाली
स्थिति नहीं थी। मामला अटका रहा। साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में
आए तो दोबारा राफेल को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई। वर्ष 2015 में पीएम मोदी
फ्रांस गए और उसी दौरान राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर समझौता किया
गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक समझौते के तहत भारत ने जल्द से
जल्द उड़ान के लिए तैयार 36 राफेल लेने की बात की थी। पीएम मोदी के सामने
हुए समझौते में यह बात भी थी कि भारतीय वायु सेना को उसकी जरूरतों के
मुताबिक तय समय सीमा के भीतर विमान मिलेंगे। वहीं लंबे समय तक विमानों के
रखरखाव की जिम्मेदारी फ्रांस की होगी। आखिरकार सुरक्षा मामलों की कैबिनेट
से मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के बीच 2016 में आईजीए हुआ।
भारत-फ्रांस के बीच समझौता होने के करीब 18 महीने के भीतर विमानों की
आपूर्ति शुरू होने की बात थी। लेकिन इसी बीच ‘राफेल डील’ को लेकर सत्तारूढ़
भाजपा और कांग्रेस समेत अन्य विपक्षियों के बीच जुबानी जंग शुरू हो गई.
खरीद में अपारदरर्शिता के आरोप लग रहे हैं।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यूपीए 126 विमानों के
लिए 54,000 करोड़ चुका रही थी। वहीं अब मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए
58,000 करोड़ रुपये दे रही है। कांग्रेस का आरोप है कि अब एक विमान का दाम
1555 करोड़ रुपये हैं। जबकि कांग्रेस ने 428 करोड़ रुपये में डील तय की
थी। कांग्रेस लगातार डील की रकम को सार्वजनिक करने की मांग पर अड़ी है।
जबकि भाजपा दोनों देशों के बीच हुए सुरक्षा समझौते की गोपनीयता का हवाला दे
रही है।
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