अटल बिहारी वाजपेयी के ओजस्वी भाषणों के मुरीद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी थे। देश में 1957 में दूसरे संसदीय चुनाव में वाजपेयी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से पहली बार जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। तब उन्होंने सदन में जो भाषण दिया था, उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को खासा प्रभावित किया था।
विदेश मामलों में वाजपेयी की जबरदस्त पकड़ ने नेहरू को भी उनका कायल बना दिया था। हालांकि तब उनकी गिनती 'बैक बेंचर्स' यानी संसद में पिछली बेंचों पर बैठेने वाले सांसद के तौर पर होती थी, पर वह दौर ही कुछ ऐसा था कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेता एक-दूसरे को परस्पर सम्मान देते थे और उनकी अनदेखी करने की बजाय महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी राय को तवज्जो देते थे।
नेहरू और वाजपेयी से जुड़ा एक किस्सा मशहूर है कि एक बार जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भारत दौरे पर आए तो नेहरू ने वाजपेयी का उनसे परिचय यह कहते हुए कराया कि 'ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। हमेशा मेरी आलोचनाएं करते हैं, लेकिन मैं भविष्य को लेकर इनमें बहुत संभावनाएं देखता हूं।' यहां तक कि एक बार उन्होंने वाजपेयी का परिचय किसी विदेशी मेहमान से संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया था।
नेहरू के मन में वाजपेयी के लिए यह स्नेह एकतरफा नहीं था। वाजपेयी भी वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेहरू का पूरा सम्मान करते थे। वरिष्ठ पत्रकार किंगशुक नाग ने अपनी किताब 'अटल बिहारी वाजपेयी- ए मैन फॉर ऑल सीजन' में ऐसी ही एक घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने और कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के दफ्तर पहुंचे तो वहां उन्होंने नेहरू की पहले से लगी तस्वीर गायब देखी।
इसके बाद उन्होंने तुरंत सेक्रेट्री से इस बारे में पूछा तो पता लगा कि अधिकारियों ने यह सोचकर जानते-बूझते हुए नेहरू की तस्वीर वहां से हटा दी थी कि दोनों परस्पर विरोधी दल के नेता रहे और शायद इसलिए वाजपेयी इसे पसंद न करें। लेकिन वाजपेयी ने नेहरू की वह तस्वीर वहां लगाने के आदेश दिए।
वाजपेयी की शख्सियत कुछ ऐसी थी कि आपसी वैचारिक मतभेद के बावजूद इंदिरा गांधी भी कई मुद्दों पर उनसे सलाह-मशविरा करती थीं। जब इन्दिरा गाँधी एक सिख को राष्ट्रपति बनाना चाहती थीं, तो चर्चा के लिए अटल जी को बुलाया। अटल जी ज्ञानी जेल सिंह के स्थान पर कई सिख विद्वानों के नाम दिए, उनमे एक नाम था गुरदयाल सिंह ढिल्लों का। लेकिन इंदिराजी ज्ञानीजी को ही बनाने को आतुर थीं। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आईं, जब तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी, विचार-विमर्श के लिए अटल जी को ही बुलाती थीं।
कहा तो यहां तक जाता है कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' तक की उपमा दी थी, जिसमें भारत की जीत हुई थी। हालांकि प्रधानमंत्री बनने के बाद एक इंटरव्यू में वाजपेयी ने इससे इनकार किया था।
जब दो भारत रत्न मिले।
कुछ वर्षों पूर्व जब लता जी और अटलजी की मुलाकात हुई तो अटलजी बहुत हल्के मुड में थे। इधर उधर की बातों के बीच अटलजी लता जी से बोले लताजी जी आपको पता है, आपके ओर मेरे नाम मे समानता है,यू भी कह सकते है कि आप और मै हमनाम है लता जी बोली में समझी नहीं। आपके ओर मेरे नाम मे समानता कैसे हो गयी। अटलजी बोले सिर्फ मेरे नाम को उल्टा करके पढ़ो तो मेरी बात समझ मे आ जायेगी। आगे अटल, पीछे लता। यह कहकर अटलजी ओर लता जी खूब हँसे थे।
Atal
Lata
इस महाकवि ने पहले ही कर दी थी अटल की मौत की भविष्यवाणी
पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महाकवि गोपालदास ‘नीरज’ अच्छे दोस्त थे. दोनों ने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पढाई की थी. कॉलेज के दिनों में अटल और गोपाल दास का मिलना-जुलना होता ही रहता था और उस दौरान दोनों एक-दूसरे के अच्छे परिचित भी बन गए थे. गोपाल दास महाकवि होने के साथ-साथ अच्छे ज्योतिष भी माने जाते थे. गोपाल दास ने एक बार कहा था कि उनकी और वाजपेयी की कुंडली काफी हद तक एक-दूसरे से मिलती है.
अवलोकन करें:-
साल 2009 में तो गोपाल दास ने भविष्यवाणी करते हुए हैरान कर देने वाला खुलासा किया था. उन्होंने कहा था कि उनके और वाजपेयी जी के निधन में एक महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होगा और वास्तव में ऐसे ही हुआ. गोपाल दास ने 19 जुलाई को इस दुनिया को अलविदा कहा था और अटल बिहारी का निधन उनसे 29 दिन बाद यानि 16 अगस्त को हुआ. इतना ही नहीं उन्होंने ये भी कहा था कि दोनों को ही अपने अंतिम समय में गंभीर रोगों से जूझना पड़ेगा और ये सच भी साबित हुआ.
गोपाल दास ‘नीरज’ ने साहित्य और कला के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं. गोपाल दास के गीत दुनियाभर में मशहूर है और उन्होंने अपनी इस कला के जरिए बड़ा नाम कमाया है. वही अटल बिहारी वाजपेयी ने भी राजनीति के क्षेत्र में सफलता हासिल की है.
विदेश मामलों में वाजपेयी की जबरदस्त पकड़ ने नेहरू को भी उनका कायल बना दिया था। हालांकि तब उनकी गिनती 'बैक बेंचर्स' यानी संसद में पिछली बेंचों पर बैठेने वाले सांसद के तौर पर होती थी, पर वह दौर ही कुछ ऐसा था कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेता एक-दूसरे को परस्पर सम्मान देते थे और उनकी अनदेखी करने की बजाय महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी राय को तवज्जो देते थे।
नेहरू और वाजपेयी से जुड़ा एक किस्सा मशहूर है कि एक बार जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भारत दौरे पर आए तो नेहरू ने वाजपेयी का उनसे परिचय यह कहते हुए कराया कि 'ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। हमेशा मेरी आलोचनाएं करते हैं, लेकिन मैं भविष्य को लेकर इनमें बहुत संभावनाएं देखता हूं।' यहां तक कि एक बार उन्होंने वाजपेयी का परिचय किसी विदेशी मेहमान से संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया था।
नेहरू के मन में वाजपेयी के लिए यह स्नेह एकतरफा नहीं था। वाजपेयी भी वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेहरू का पूरा सम्मान करते थे। वरिष्ठ पत्रकार किंगशुक नाग ने अपनी किताब 'अटल बिहारी वाजपेयी- ए मैन फॉर ऑल सीजन' में ऐसी ही एक घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने और कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के दफ्तर पहुंचे तो वहां उन्होंने नेहरू की पहले से लगी तस्वीर गायब देखी।
इसके बाद उन्होंने तुरंत सेक्रेट्री से इस बारे में पूछा तो पता लगा कि अधिकारियों ने यह सोचकर जानते-बूझते हुए नेहरू की तस्वीर वहां से हटा दी थी कि दोनों परस्पर विरोधी दल के नेता रहे और शायद इसलिए वाजपेयी इसे पसंद न करें। लेकिन वाजपेयी ने नेहरू की वह तस्वीर वहां लगाने के आदेश दिए।
कहा तो यहां तक जाता है कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' तक की उपमा दी थी, जिसमें भारत की जीत हुई थी। हालांकि प्रधानमंत्री बनने के बाद एक इंटरव्यू में वाजपेयी ने इससे इनकार किया था।
जब दो भारत रत्न मिले।
कुछ वर्षों पूर्व जब लता जी और अटलजी की मुलाकात हुई तो अटलजी बहुत हल्के मुड में थे। इधर उधर की बातों के बीच अटलजी लता जी से बोले लताजी जी आपको पता है, आपके ओर मेरे नाम मे समानता है,यू भी कह सकते है कि आप और मै हमनाम है लता जी बोली में समझी नहीं। आपके ओर मेरे नाम मे समानता कैसे हो गयी। अटलजी बोले सिर्फ मेरे नाम को उल्टा करके पढ़ो तो मेरी बात समझ मे आ जायेगी। आगे अटल, पीछे लता। यह कहकर अटलजी ओर लता जी खूब हँसे थे।
Atal
Lata
इस महाकवि ने पहले ही कर दी थी अटल की मौत की भविष्यवाणी
पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महाकवि गोपालदास ‘नीरज’ अच्छे दोस्त थे. दोनों ने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पढाई की थी. कॉलेज के दिनों में अटल और गोपाल दास का मिलना-जुलना होता ही रहता था और उस दौरान दोनों एक-दूसरे के अच्छे परिचित भी बन गए थे. गोपाल दास महाकवि होने के साथ-साथ अच्छे ज्योतिष भी माने जाते थे. गोपाल दास ने एक बार कहा था कि उनकी और वाजपेयी की कुंडली काफी हद तक एक-दूसरे से मिलती है.
अवलोकन करें:-
गोपाल दास ‘नीरज’ ने साहित्य और कला के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं. गोपाल दास के गीत दुनियाभर में मशहूर है और उन्होंने अपनी इस कला के जरिए बड़ा नाम कमाया है. वही अटल बिहारी वाजपेयी ने भी राजनीति के क्षेत्र में सफलता हासिल की है.
Comments