असम में आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के 14 लाख फर्जी नाम पाए गए हैं। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने यह जानकारी दी। असम सरकार ने जून में एक अभियान चलाया था जिसके तहत आंगनबाड़ी केंद्रों में मौजूद बच्चों की संख्या का भौतिक सत्यापन किया गया। जब उसका पंजीकृत बच्चों की संख्या से मिलान किया गया तो करीब 14 लाख बच्चे कम मिले।
बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि खाद्य वितरण प्रणाली में कई खामियां पायी गयी हैं। उन्होंने सभी राज्य सरकारों को उन बच्चों की संख्या सत्यापित करने का निर्देश दिया जिन्हें वाकई भोजन की जरुरत है। सितंबर महीने के पोषण अभियान से पहले एक कार्यक्रम में बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि जिस रकम की हेराफ़ेरी की जा रही है, उसका उपयोग आसानी से बच्चों के कल्याण के लिए किया जा सकता है। पोषण महीने के तहत सरकार पोषण केंद्रित कई कार्यक्रम चलाने वाली है।
मेनका गांधी ने सभी राज्यों से आंगनवाड़ी केंद्रों पर अनाज खरीदने और वितरित करने का अतिरिक्त बोझ नहीं डालने को कहा है। पोषक खाद्य सामग्री तीसरे पक्ष द्बारा खरीदी जानी चाहिए और पूरी प्रक्रिया पर कड़ी निगाह रखी जाए।
एक अधिकारी के अनुसार प्रत्येक बच्चे के प्रतिदिन के भोजन के लिए मंत्रालय 4.8 रुपया और राज्य सरकार 3.2 रुपया देती है। गणना के बाद पता चला कि फर्जी नाम के जरिए असम में प्रतिमाह 28 करोड़ रूपए की चोरी की जा रही थी। पोषण अभियान का लक्ष्य 2022 तक 0-6 साल छह साल तक के बच्चों के शारीरिक विकास में गिरावट के प्रतिशत को 38.4 से घटाकर 25 प्रतिशत पर लाना है।
केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद से जिन-जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें बनने उपरांत किसी भी स्तर पर पकडे गए घोटालों पर कितने अधिकारी अथवा नेताओं के विरुद्ध कार्यवाही की गयी? या केवल मीडिया में समाचार देकर सरकार ने औपचारिकताएं पूरी करने का काम कर रही हैं? यानि केवल आंगनवाड़ी में प्रति माह 28 करोड़ के घोटाले का अर्थ हर नेता भलीभाँति जानता होगा। 28x12 = 336 करोड़ प्रति वर्ष और 5 सालों में यही घोटाला बनता है,1680 करोड़ रूपए। अभी पता नहीं ऐसे कितने घोटाले होंगे, जिनका सार्वजनिक होना शेष है। उत्तराखंड में भी मदरसों में लगभग 90 लाख फर्जी नामों का फर्जीवाड़ा सामने आया था। यानि जनहित के नाम पर खर्च हो रहा धन, भ्रष्ट अधिकारियों की जेबों में जा रहा था। एक बात और, हर घोटाले पर केवल अधिकारियों को नामजद करना भी उचित नहीं, क्योंकि बिना राजनीतिक संरक्षण के कोई अधिकारी एक पैसा भी इधर-उधर नहीं कर सकता। घोटाले पकडे जाने पर, उन्हें सार्वजनिक करने के साथ-साथ उस से सम्बन्धित नेताओं के नाम क्यों नहीं सार्वजनिक किये जाते? जनता का सरकार के प्रति मोह तभी होगा, जब घोटालेबाज़ों पर कार्यवाही होने के साथ-साथ ब्याज सहित रकम वसूली जाए और कभी चुनाव न लड़ने और किसी भी सार्वजनिक कार्यालय में नियुक्ति न हो। घोटाले सुनते-सुनते मुझ जैसे लोग बूढ़े हो गए, पता नहीं कितने भगवान को भी प्यारे हो चुके हैं। नेताओं पर मुकदमा हुआ, बरी हो गए। जब निर्दोष होने पर बरी ही होना था, फिर घोटाला किसने किया और घोटाले की रकम किसने अपनी जेब में रखी? अन्यथा जनता घोटालों को जनता को भ्रमित करने का एक हथकंडा ही मानेगी और वर्तमान सरकारों से भी उसका विश्वास उठ जायेगा,और मतदान करने जो आज लम्बी-लम्बी कतारें दिखती हैं, सब एक स्वप्न रह जाएंगी और केवल पार्टीभक्त और घोटालेबाज़ ही जायेंगे।
बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि खाद्य वितरण प्रणाली में कई खामियां पायी गयी हैं। उन्होंने सभी राज्य सरकारों को उन बच्चों की संख्या सत्यापित करने का निर्देश दिया जिन्हें वाकई भोजन की जरुरत है। सितंबर महीने के पोषण अभियान से पहले एक कार्यक्रम में बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि जिस रकम की हेराफ़ेरी की जा रही है, उसका उपयोग आसानी से बच्चों के कल्याण के लिए किया जा सकता है। पोषण महीने के तहत सरकार पोषण केंद्रित कई कार्यक्रम चलाने वाली है।
मेनका गांधी ने सभी राज्यों से आंगनवाड़ी केंद्रों पर अनाज खरीदने और वितरित करने का अतिरिक्त बोझ नहीं डालने को कहा है। पोषक खाद्य सामग्री तीसरे पक्ष द्बारा खरीदी जानी चाहिए और पूरी प्रक्रिया पर कड़ी निगाह रखी जाए।
एक अधिकारी के अनुसार प्रत्येक बच्चे के प्रतिदिन के भोजन के लिए मंत्रालय 4.8 रुपया और राज्य सरकार 3.2 रुपया देती है। गणना के बाद पता चला कि फर्जी नाम के जरिए असम में प्रतिमाह 28 करोड़ रूपए की चोरी की जा रही थी। पोषण अभियान का लक्ष्य 2022 तक 0-6 साल छह साल तक के बच्चों के शारीरिक विकास में गिरावट के प्रतिशत को 38.4 से घटाकर 25 प्रतिशत पर लाना है।
केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद से जिन-जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें बनने उपरांत किसी भी स्तर पर पकडे गए घोटालों पर कितने अधिकारी अथवा नेताओं के विरुद्ध कार्यवाही की गयी? या केवल मीडिया में समाचार देकर सरकार ने औपचारिकताएं पूरी करने का काम कर रही हैं? यानि केवल आंगनवाड़ी में प्रति माह 28 करोड़ के घोटाले का अर्थ हर नेता भलीभाँति जानता होगा। 28x12 = 336 करोड़ प्रति वर्ष और 5 सालों में यही घोटाला बनता है,1680 करोड़ रूपए। अभी पता नहीं ऐसे कितने घोटाले होंगे, जिनका सार्वजनिक होना शेष है। उत्तराखंड में भी मदरसों में लगभग 90 लाख फर्जी नामों का फर्जीवाड़ा सामने आया था। यानि जनहित के नाम पर खर्च हो रहा धन, भ्रष्ट अधिकारियों की जेबों में जा रहा था। एक बात और, हर घोटाले पर केवल अधिकारियों को नामजद करना भी उचित नहीं, क्योंकि बिना राजनीतिक संरक्षण के कोई अधिकारी एक पैसा भी इधर-उधर नहीं कर सकता। घोटाले पकडे जाने पर, उन्हें सार्वजनिक करने के साथ-साथ उस से सम्बन्धित नेताओं के नाम क्यों नहीं सार्वजनिक किये जाते? जनता का सरकार के प्रति मोह तभी होगा, जब घोटालेबाज़ों पर कार्यवाही होने के साथ-साथ ब्याज सहित रकम वसूली जाए और कभी चुनाव न लड़ने और किसी भी सार्वजनिक कार्यालय में नियुक्ति न हो। घोटाले सुनते-सुनते मुझ जैसे लोग बूढ़े हो गए, पता नहीं कितने भगवान को भी प्यारे हो चुके हैं। नेताओं पर मुकदमा हुआ, बरी हो गए। जब निर्दोष होने पर बरी ही होना था, फिर घोटाला किसने किया और घोटाले की रकम किसने अपनी जेब में रखी? अन्यथा जनता घोटालों को जनता को भ्रमित करने का एक हथकंडा ही मानेगी और वर्तमान सरकारों से भी उसका विश्वास उठ जायेगा,और मतदान करने जो आज लम्बी-लम्बी कतारें दिखती हैं, सब एक स्वप्न रह जाएंगी और केवल पार्टीभक्त और घोटालेबाज़ ही जायेंगे।
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