आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
क्या 2019 में भी मोदी लहर का जलवा बरकरार रहेगा? बीजेपी इस बार अपने दम पर 300 से भी ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही है. क्या ऐसा संभव होगा? इस बार विपक्ष की बढ़ती एकजुटता क्या बीजेपी के खिलाफ मजबूत घेराबंदी कर पाएगी? लोकसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच कमोबेश इसी तरह के सवाल लोगों के जेहन में उभर रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक भी तमाम किस्म के किंतु-परंतु की चर्चा कर रहे हैं.
आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ऐसे सांसदों और विधायकों टिकट कट सकते हैं जिनका कामकाज अच्छा नहीं रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्य के शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने रविवार को पत्रकारों से बातचीत में ये संकेत दिए। शर्मा पार्टी की उस कोर टीम के मुख्य रणनीतिकार हैं जो प्रदेश के सांसदों और विधायकों के कामकाज की ग्राउंड रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।
इसी कड़ी में मशहूर लेखक और स्तंभकार चेतन भगत ने द टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने नियमित आर्टिकल में बहुत ही रोचक विश्लेषण पेश किया है. उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों के लिहाज से पिछली बार बीजेपी की लोकसभा में जीती हुई 282 सीटों को बेस बनाते हुए बीजेपी बनाम विपक्षी एकजुटता पर अपना नजरिया पेश किया है.
उन्होंने बताया है कि पिछली बार बीजेपी को तीन क्षेत्रों से 282 में से सर्वाधिक 221 सीटें मिली थीं. लिहाजा अबकी बार बीजेपी के प्रदर्शन और विपक्षी एकजुटता के बीच मुकाबला होने पर क्या सियासी सीन बन सकता है, उसका आकलन यहां किया जा रहा है:
1. यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से पिछली बार बीजेपी ने अपने दम पर 71 और सहयोगी अपना दल के साथ कुल मिलाकर 73 सीटें जीती थीं. पिछली बार यहां मुकाबला चतुष्कोणीय था. उस वक्त यहां बीजेपी का अपने दम पर वोट शेयर 42 प्रतिशत था. इसकी तुलना में सपा, बसपा और कांग्रेस को कुल मिलाकर 49 प्रतिशत वोट शेयर मिला था.
अब गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनावों के बाद विपक्षी एकजुटता के नाम पर सपा, बसपा और कांग्रेस 2019 के आम चुनावों में यदि एकजुट हो जाते हैं और सत्ता-विरोधी लहर के कारण बीजेपी को पिछली बार की तुलना में तकरीबन पांच प्रतिशत वोटों का नुकसान होता है तो इन दशाओं में बीजेपी को कुल मिलाकर यूपी में इस बार 40 सीटों का नुकसान हो सकता है.
2. पिछली बार राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और गुजरात (आरसीएमजी) की कुल 91 लोकसभा सीटों में से 88 सीटें बीजेपी को मिली थीं. इन राज्यों में सीधा मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस के बीच होता है. यहां पर बीजेपी का अपना वोट शेयर 50 प्रतिशत से भी अधिक है. दो-तरफा मुकाबला होने के कारण इन राज्यों में विपक्षी एकजुटता का तो कोई खास असर नहीं दिखेगा लेकिन कई वर्षों से सत्ता में काबिज होने के कारण बीजेपी को सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है. इस ओर ओपिनियन पोल संकेत दे रहे हैं कि इसी साल के अंत में मध्य प्रदेश और राजस्थान में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में बीजेपी को नुकसान हो सकता है. हालांकि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में ट्रेंड अलग होता है लेकिन फिर भी पिछली बार की तरह बीजेपी को यहां प्रदर्शन दोहराना मुश्किल हो सकता है. लिहाजा पिछली बार जीती हुई सीटों में से 20 का नुकसान बीजेपी को हो सकता है.
3. पिछली बार महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार(एमकेबी) की कुल 111 सीटों में से बीजेपी को 62 सीटें मिली थीं. यहां पर मुकाबला बहुकोणीय होने के कारण विपक्षी एकजुटता का असर अबकी बार देखने को मिलेगा. कर्नाटक में अब कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन कर लिया है. बिहार में राजद विपक्षी एकजुटता की धुरी बनने की भूमिका में है. महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी के बीच रिश्तों में खटास देखने को मिली है और यदि शिवसेना गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ती है तो वोटों का विभाजन हो जाएगा. इन परिस्थितियों में पिछली बार की तुलना में बीजेपी को 2019 में 25 सीटों का नुकसान हो सकता है.
सत्ता का समीकरण
इस प्रकार उपरोक्त तीनों बिंदुओं के आधार पर बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर कुल 85 (40+20+25) सीटों का नुकसान होगा. बीजेपी की फिलहाल 282 सीटें हैं और उसके नेतृत्व में एनडीए की कुल 336 सीटें हैं. ऐसे में इन 85 सीटों के नुकसान होने की स्थिति में बीजेपी को 197 सीटें मिलेंगी और एनडीए को 251 सीटें मिलेंगी. हालांकि फिलहाल एनडीए में अभी शिवसेना और तेलुगु देसम को भी जोड़ा गया है लेकिन इनकी भूमिका बदल भी सकती है. इसका मतलब यह होगा कि एनडीए के पास 272 सीटों का अपेक्षित बहुमत नहीं होगा और विपक्ष के पास कुल 292 सीटें होंगी.
हालिया दौर में इस तरह की परिस्थितियां 2009 में भी उत्पन्न हुई थीं जब कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार ने 206 सीटें हासिल की थीं. हालांकि कांग्रेस को उस वक्त आसानी से अन्य दलों के समर्थन के कारण बहुमत का आंकड़ा मिल गया था, लेकिन मौजूदा सियासी हालात को देखते हुए बीजेपी के लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल करने में दिक्कत हो सकती है. यानी कि एक बार फिर गठबंधन के युग की वापसी हो सकती है.
लोकसभा- विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन न करने वालों के कट सकते हैं टिकट:
पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ हुई कोर कमेटी की बैठक से वापिस लौटने के बाद उन्होंने अपने साझा करते हुये कहा कि आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बेहतर काम करने वाले नेताओं को ही टिकट दिए जाने की बात निकलकर सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव तय समय पर ही होंगे और समयपूर्व चुनावों की कोई सम्भावना नहीं है।
उन्होंने इस दौरान अम्बाला के सांसद रत्न लाल कटारिया के काम की तारीफ की तो वहीं उन्होंने इशारों ही इशारों में कुरुक्षेत्र के सांसद राजकुमार सैनी की कार्यशैली पर सवालिया निशान भी लगा दिए और कहा कि वह तो पार्टी बखियां उधेड़ने में लगे हुये हैं।
शर्मा ने कैथल से कांग्रेस विधायक और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला को ‘बेचारा’ कह कर जहां उन पर निशाना साधा वहीं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिह हुड्डा की रथ और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर की साईकल यात्रा पर चुटकी लेते हुए पहले की यात्रा समालखा के पास ही फुस्स हो गई और दूसरे की यात्रा सिरसा जाकर पंक्चर हो गई। एक पार्टी में दो यात्राएँ चल रही हैं। कौन सी यात्रा ‘लीगल’ है और कौन सी ‘इललीगल’ यह कहना मुश्किल है।
भाजपा नेता ने कहा कि तंवर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष हैं। उन पर दिल्ली में जानलेवा हमला हुआ। इस पर हुड्डा के खिलाफ एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ। लेकिन इस मामले में भी तंवर को न्याय नहीं मिला। अब हुड्डा यात्रा कर रहे हैं जबकि किरण चौधरी कांग्रेस की विधायक दल की नेता हैं। अब हुड्डा किस ‘कैपेसिटी’ में यात्रा निकाल रहे हैं यह तो वह ही बता सकते हैं।
हाल ही में बीजेपी के राजस्थान में एक बड़े नेता घनश्याम तिवाड़ी ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया और छठी बार के ये विधायक अब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ खड़े है. इसे आलावा भी देश भर में बीजेपी के विधायक तीन ही काम कर रहे है. विवादित बयानबाजी, बगावत और सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाना जो बीजेपी की चिंता का विषय बन गया है. वो बात अलग है कि उनके कारनामो को हवा देने के पहले ही मामला दबा दिया जाता है.
बहरहाल घनश्याम तिवाड़ी भारत वाहिनी पार्टी के नाम से 200 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ कर बगावत को पक्की करने का मन बना चुके है. इसी क्रम में राजकुमार सैनी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, सावित्री बाई फूले, शिवसेना, प्रवीण तोगड़िया, उपेंद्र कुशवाहा, ओम प्रकाश राजभर, सुहेलदेव ,चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार और अन्य कई नाम भी शामिल है जो बीजेपी के सिरदर्द के भागीदार है. हरियाणा में पार्टी सांसद राजकुमार सैनी ने नई पार्टी बनाने की घोषणा कर दी है. पूर्व वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने राष्ट्र मंच के नाम से एक नए संगठन में खुली बगावत पर आमादा शत्रुघ्न सिन्हा को साथ में मिलाया है. महाराष्ट्र में बीजेपी सांसद रहे नाना पटोले ने लोकसभा और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे कर कांग्रेस का दामन थाम लिया. प्रवीण तोगड़िया ने अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद का एलान कर हिन्दू कार्ड पर बीजेपी को कमजोर करने का काम किया है।
बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले, छोटेलाल खरवार, उदित राज, यशवंत सिंह और अशोक दोहरे उन दलित सांसदों में शामिल है जो पार्टी को तकलीफ देने का मन बना चुके है .तेलुगू देशम पार्टी, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, शिवसेना NDA से सख्त नाराज है. शिरोमणि अकाली दल अपना रुख साफ कर चुका है वही राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने अपने पत्ते नहीं खोले है यही माजरा बिहार में जेडीयू का भी है. बहरहाल बीजेपी डेमेज कंट्रोल पर काम कर रही है मगर राह आसान नहीं दिखती।
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