आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
पत्रकारिता को सरकार का कितना विरोध करना चाहिए, कितना समर्थन करना चाहिए, विपक्ष के प्रति उसका रवैया किन परिस्थितियों में कैसा होना चाहिए, मर्यादा का बिन्दु क्या है, लोकतन्त्र का चौथा कहलाये जाने वाले समाज को इस विषय पर स्वयं मन्थन करना चाहिए। जिससे भारत में पत्रकारिता के दायित्वों की अवधारणा पर नई रोशनी डाली जा सके। लेकिन तब तक यह मत भूलिए कि जिन लोगों ने गोदी मीडिया का जुमला उछाला है, वे स्वयं सोनिया गांधी और राहुल गांधी (कांग्रेस) की गोदी में बैठे हैं। बीच में अरविंद केजरीवाल की गोदी में भी जा बैठे थे, क्योंकि विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने उन्हें लोकसभा का टिकट अथवा राज्यसभा की सीट का लालच दिया था।यह कोई टॉप सीक्रेट भी नहीं है और दिल्ली विधानसभा चुनाव में लोग उसे महसूस भी कर चुके हैं।
मीडिया को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज हमें ऐसा प्रधानमन्त्री मिला है, जो आलोचना से पीछे नहीं भागता, बल्कि सामना करता है। लेकिन एक तरफ़ा आलोचना शोभा नहीं देता। जिस तरह मीडिया ने गोधरा दंगों को उछाला, क्या उसी तरह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव द्वारा निहत्ते रामभक्तों पर गोलियाँ चलाए जाने को उछाला? जिस तरह वेमुला की हत्या को दलित विरोधी कहकर उछाला, क्या उसी तर्ज़ पर अखिलेश यादव के कार्यकाल में उन्ही की पार्टी के एक मुस्लिम पदाधिकारी द्वारा आगरा में रेहड़ी चलाने वाले दलित द्वारा रास्ता मांगने पर अपना मूत्र पिलाए जाने को उछाला? अख़लाक़ मुद्दे पर अपनी-अपनी अदालतें खोलकर बैठे रहने वालों ने विकासपुरी दिल्ली में बेकसूर डॉ नारंग को मौत के घाट उतारने पर क्यों खामोश रहे? ऐसे आरोपों की एक लम्बी सूची है, जिस पर मीडिया को आत्ममन्थन करने की बहुत ज्यादा जरुरत है। माना नेताओं ने तो "जहाँ दिखी तवा-परात, वहीँ बिताई सारी रात" मुहावरे को चरितार्थ कर रहे हैं, लेकिन मीडिया क्यों सरकारी प्रलोभन के लालच और मालपुए खाने के चक्कर में इस मुहावरे को चरितार्थ कर रही है? मीडिया को विचारना चाहिए कि एक मिथ्या समाचार का देश और विदेश की जनता पर कितना असर पड़ता है।
एक समय था, जब देश में गिनती के समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ थी, लेकिन आज लाखों की संख्या में प्रिंट और इलेक्टॉनिक मीडिया है, जिसे देखो कभी दलित, कभी किसान आत्महत्या तो कभी अल्पसंख्यक उत्पीड़न को उछालते रहते हैं, लेकिन हिन्दू विरोधी गतिविधियों पर आंखें मुंध लेते है। इतना ही नहीं, शहीद उधम सिंह के पौत्र ने क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या कर ली, किसी मीडिया ने बताया, क्योकि इस समाचार से किसी की TRP नहीं बढ़ती। आज भी क्रांतिकारियों के कई ऐसे परिवार हैं, जो अपनी जीवनचर्या के लिए सरकार की तरफ देखते भी नहीं, वहीँ कई छद्दम क्रांतिकारी परिवार हैं, जो सरकारी पैसे पर आनन्द ले रहे हैं।
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पत्रकारिता को सरकार का कितना विरोध करना चाहिए, कितना समर्थन करना चाहिए, विपक्ष के प्रति उसका रवैया किन परिस्थितियों में कैसा होना चाहिए, मर्यादा का बिन्दु क्या है, लोकतन्त्र का चौथा कहलाये जाने वाले समाज को इस विषय पर स्वयं मन्थन करना चाहिए। जिससे भारत में पत्रकारिता के दायित्वों की अवधारणा पर नई रोशनी डाली जा सके। लेकिन तब तक यह मत भूलिए कि जिन लोगों ने गोदी मीडिया का जुमला उछाला है, वे स्वयं सोनिया गांधी और राहुल गांधी (कांग्रेस) की गोदी में बैठे हैं। बीच में अरविंद केजरीवाल की गोदी में भी जा बैठे थे, क्योंकि विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने उन्हें लोकसभा का टिकट अथवा राज्यसभा की सीट का लालच दिया था।यह कोई टॉप सीक्रेट भी नहीं है और दिल्ली विधानसभा चुनाव में लोग उसे महसूस भी कर चुके हैं।
मीडिया को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज हमें ऐसा प्रधानमन्त्री मिला है, जो आलोचना से पीछे नहीं भागता, बल्कि सामना करता है। लेकिन एक तरफ़ा आलोचना शोभा नहीं देता। जिस तरह मीडिया ने गोधरा दंगों को उछाला, क्या उसी तरह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव द्वारा निहत्ते रामभक्तों पर गोलियाँ चलाए जाने को उछाला? जिस तरह वेमुला की हत्या को दलित विरोधी कहकर उछाला, क्या उसी तर्ज़ पर अखिलेश यादव के कार्यकाल में उन्ही की पार्टी के एक मुस्लिम पदाधिकारी द्वारा आगरा में रेहड़ी चलाने वाले दलित द्वारा रास्ता मांगने पर अपना मूत्र पिलाए जाने को उछाला? अख़लाक़ मुद्दे पर अपनी-अपनी अदालतें खोलकर बैठे रहने वालों ने विकासपुरी दिल्ली में बेकसूर डॉ नारंग को मौत के घाट उतारने पर क्यों खामोश रहे? ऐसे आरोपों की एक लम्बी सूची है, जिस पर मीडिया को आत्ममन्थन करने की बहुत ज्यादा जरुरत है। माना नेताओं ने तो "जहाँ दिखी तवा-परात, वहीँ बिताई सारी रात" मुहावरे को चरितार्थ कर रहे हैं, लेकिन मीडिया क्यों सरकारी प्रलोभन के लालच और मालपुए खाने के चक्कर में इस मुहावरे को चरितार्थ कर रही है? मीडिया को विचारना चाहिए कि एक मिथ्या समाचार का देश और विदेश की जनता पर कितना असर पड़ता है।
एक समय था, जब देश में गिनती के समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ थी, लेकिन आज लाखों की संख्या में प्रिंट और इलेक्टॉनिक मीडिया है, जिसे देखो कभी दलित, कभी किसान आत्महत्या तो कभी अल्पसंख्यक उत्पीड़न को उछालते रहते हैं, लेकिन हिन्दू विरोधी गतिविधियों पर आंखें मुंध लेते है। इतना ही नहीं, शहीद उधम सिंह के पौत्र ने क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या कर ली, किसी मीडिया ने बताया, क्योकि इस समाचार से किसी की TRP नहीं बढ़ती। आज भी क्रांतिकारियों के कई ऐसे परिवार हैं, जो अपनी जीवनचर्या के लिए सरकार की तरफ देखते भी नहीं, वहीँ कई छद्दम क्रांतिकारी परिवार हैं, जो सरकारी पैसे पर आनन्द ले रहे हैं। -----------------
ॐ जी
जलिया वाला बाग तो याद होगा आज के दिन कितने लोगों की हत्या की गई थी उन की हत्या का बदला वीर उधमसिंह जी ने लिया इस किन्तु उस वीर के पौत्र ने आत्महत्या की उस का ज़िम्मेदार कौन है क्या मात्र वीरो को नमन कर के ही हम अपने कर्तव्य को पूर्ण कर लेते है !में बस आप से ये पूछना चाहता हु की देश के लिए शहीद हुए सभी शहीदों के परिवार वालो को कब तक भूखे मरते देखते रहे गे ? और कब तक राज का सुख भोगने वाले अग्रेजो के गुलाम जो आज भी क्रांति कारी बने बैठे है देश पर राज कर रहे है उन को कब तक इसी तरह देश को लुटते देखते रहे गे ? भगतसिंह जी चन्द्रशेखर जी उधमसिंह जी आदि हजारो वीरो ने कुर्बानी दी देश के लिए कभी भी अपने परिवार या किसी राज का सुख नही सोचा उन बलिदानो के वंशज तो आज गम नाम है और जिन्हों ने राजभोग के लिए काम किया देश को विभजित किया वो राजा बने हुए है !अगर देश के लिए थोड़ी भी भावना है तो सोचो ओर न्याय करो सहीदो की आत्मा आप लोगो को देख रही है !वन्देमातरम
जलिया वाला बाग तो याद होगा आज के दिन कितने लोगों की हत्या की गई थी उन की हत्या का बदला वीर उधमसिंह जी ने लिया इस किन्तु उस वीर के पौत्र ने आत्महत्या की उस का ज़िम्मेदार कौन है क्या मात्र वीरो को नमन कर के ही हम अपने कर्तव्य को पूर्ण कर लेते है !में बस आप से ये पूछना चाहता हु की देश के लिए शहीद हुए सभी शहीदों के परिवार वालो को कब तक भूखे मरते देखते रहे गे ? और कब तक राज का सुख भोगने वाले अग्रेजो के गुलाम जो आज भी क्रांति कारी बने बैठे है देश पर राज कर रहे है उन को कब तक इसी तरह देश को लुटते देखते रहे गे ? भगतसिंह जी चन्द्रशेखर जी उधमसिंह जी आदि हजारो वीरो ने कुर्बानी दी देश के लिए कभी भी अपने परिवार या किसी राज का सुख नही सोचा उन बलिदानो के वंशज तो आज गम नाम है और जिन्हों ने राजभोग के लिए काम किया देश को विभजित किया वो राजा बने हुए है !अगर देश के लिए थोड़ी भी भावना है तो सोचो ओर न्याय करो सहीदो की आत्मा आप लोगो को देख रही है !वन्देमातरम
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2014 से पहले आप किस तरफ थे?
अगर गोदी मीडिया के शाब्दिक अर्थ पर जाएं, तो यह हमेशा से रहा है और हमेशा रहेगा। यह कोई आज की पैदाइश नहीं है। सभी पार्टियों की सरकारों का अपना-अपना गोदी मीडिया होता है। कांग्रेस का गोदी मीडिया सॉफिस्टिकेटेड तरीके से काम करता रहा है और संदेह न हो, इसके लिए वामपंथ के छद्म आवरण में कांग्रेसियों द्वारा संचालित रहा है। भारत ने बार-बार देखा है कि कभी इमरजेंसी, तो कभी डेफेमेशन बिल के ज़रिए कांग्रेस ने गैर-गोदी मीडिया को प्रताड़ित करने की कोशिश की है। गोदी मीडिया का जुमला उछालने वाले यह भी कहते हैं कि पत्रकारिता हमेशा सत्ता के विपक्ष में होती है, लेकिन जब कांग्रेस की सत्ता आती है, तो वे यह पाठ भूल जाते हैं। जब कांग्रेस की सत्ता थी, तब भी वे भाजपा का ही विरोध करते थे और इसके लिए जिस 2002 के गुजरात दंगे को आधार बनाते थे, उसकी तुलना में 1984 का सिख विरोधी दंगा किसी भी लिहाज से अधिक बड़ा, वीभत्स, एकतरफा और असली अल्पसंख्यक के ख़िलाफ़ प्रायोजित था।
तो क्या कांग्रेस को सत्ता सौंप दें?
सत्ता की समालोचना तो समझ में आती है, लेकिन क्या पत्रकारिता को कसम खाकर हर वक्त हर हालत में सत्ता का विरोध ही करना चाहिए? अगर इस थ्योरी को सही मान लिया जाए, तो देश में मीडिया कभी भी किसी भी सरकार को काम ही नहीं करने देगा। क्या पत्रकारिता को गुण-दोषों के आधार पर सत्ता या विपक्ष के विरोध या समर्थन का स्टैंड लेना चाहिए या नियम बांधकर अनिवार्यतः सत्ता का विरोध करना चाहिए? पत्रकारिता को हमेशा सरकार के विरोध में होना चाहिए- यह एक ऐसा विषय है, जिसपर वामपंथी विचारकों ने काफी अंधेरा कायम कर रखा है। इसकी वजह यह है कि वामपंथी स्वयं कभी केंद्र की सत्ता में नहीं रहे। वामपंथियों द्वारा कायम किए गए इस अंधेरे में एक दीया जलाने की ज़रूरत है, वरना सही पत्रकार बदनाम किए जाते रहेंगे और वास्तविक गोदी मीडिया वाले गोयनका पुरस्कार मैनेज कर-करके “तुम मुझे पीर कहो, मैं तुम्हें मुल्ला कहूं” के आधार पर अपने साम्राज्य का विस्तार करते रहेंगे। चलते-चलते एक सवाल भी छोड़ रहा हूं। जिन्होंने 60 साल राज किया और जिनके राज के पापों की छाया से हम आज तक उबर नहीं पाए हैं, क्या केवल मौजूदा सत्ता (10 साल) के विरोध के नाम पर हम उनके प्रति सॉफ्ट हो जाएं और एक बार फिर से उन्हें सत्ता में आ जानें दें?


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