विदित हो कि अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को ज्वाइन करने वाले मुस्लिम नेता ने आखिकार भगवा पहन लिया था लेकिन उस भगवे की आड़ में उसने कई अपराधो को अंजाम देना शुरू किया था।
अवलोकन करें:--
कुल मिला कर इसने सबसे पहले योगी के ही प्रशासन को दबाव में लेने की कोशिश की थी और धौंस दिखाने लगा था उन अधिकारियो पर जो कर रहे थे शासन की मंशा के अनुरूप कार्य .. इसमें कोई शक नही कि इस धौंस के पीछे सत्ता को बदनाम करने की साजिश भी रही हो और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि कहीं ऐसा भी सम्भव है कि ये कार्य किसी के इशारे पर अंजाम दिए जा रहे हों। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गिरफ्तार किए गए नेता पर बीते दिनों योगी सरकार का चाबुक भी चला था और उसे अल्पसंख्यक आयोग की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया गया था।
लोनी के रहने वाले मुस्लिम नेता अफजाल चौधरी पर लगे आरोपों की फेहरिस्त काफी लंबी और चौंकाने वाली है। ऐसे खुली अफजाल चौधरी की पोल गाजियाबाद पुलिस के द्वारा गिरफ्तार किए गए अफजाल चौधरी पर प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्रियों पर उन्हें फोन पर गैर कानूनी कामों के लिए दबाव बनाने और धमकाने के आरोप हैं।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि अफजाल ने कथित तौर पर पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा और शंकर सिंह वाघेला बनकर भी फोन कर अधिकारियों और मंत्रियों पर अपने कामों के लिए दबाव बनाया।
स्थानीय मीडिया के अनुसार उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद पुलिस ने शुक्रवार (27 अप्रैल) को अफजाल चौधरी को उसके एक साथी के साथ धर दबोचा। दुस्साहस की हद तो ये रही कि अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं पर अफजाल में धौंस जमाई जिसमे उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा जी तक शामिल हैं। इसके अलावा पुलिस प्रमुख डीजीपी श्री ओपी सिंह तक को फोन कर अपने कामों के लिए दबाव बनाया था। प्रशासनिक अधिकारियों ने शक होने पर इसकी शिकायत लखनऊ पहुंचाई, तब जाकर जांच में अफजाल की पोल खुली और फिर उस पर कार्रवाई का डंडा चला। पुलिस ने अफजाल के कब्जे से एक मर्सडीज कार भी बरामद की है। अफजाल पर गैर कानूनी तरीके से पैसों की उगाही करने का भी आरोप लगा है।
अक्सर अपने लेखों में कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के स्वप्न को पूरा करने दूसरे दलों से आये लोगों को एकदम टिकट देना कहीं भाजपा को भारी न पड़ जाए, मेरे शक को प्रमाणित कर रही है, उत्तर प्रदेश की उपरोक्त घटना। ठीक है, हथेली पर सरसों नहीं जमती, हमें संयम रखना चाहिए। लेकिन नेताओं को भी समझ होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का नारा है, "सबका साथ, सबका विकास", लेकिन अन्य दलों की भाँति भाजपा में अल्पसंख्यक, अनुसूचित प्रकोष्ठ, और न जाने कौन-कौन से प्रकोष्ठ बने हुए हैं। आरक्षण। जब सियासती पार्टियाँ ही देश की जनता को विभाजित कर रही हैं, फिर किस मुँह से अखण्ड एवं शक्तिशाली भारत की बात करते हैं। नेताओं के मष्तिक में तो विघटनकारी विष भरा हुआ है, बात करते हैं एकता की। दलित, जनजातियों के नाम पर देखिए कितनी पार्टियाँ बना रखी हैं, क्या इस तरह विभाजनकारी नीतियों से एकता संभव हो सकती हैं? मीडिया का क्या, इसे तो जो पार्टी चाँदी के सिक्के दे देगी, उसे आसमान पर चढ़ा देगी।
पिछली सरकार युपीए के कार्यकाल में हिन्दुओं को कलंकित करने में उस मीडिया की भी अहम् भूमिका थी, जिसे लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। किस तरह आतंकवादियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु-संत, साध्वी को जेलों में डाला जा रहा था, जिस चैनल को देखो बेकसूरों के विरुद्ध महफिलें सजा रहे थे।
फिर आज जिस तरह दलितों और बलात्कार के मुद्दों को उछाला जा रहा है, इन मुद्दों को उछालने वाली मीडिया बताए "क्या अबसे पूर्व इस तरह की दुर्घटनाएँ नहीं हुईं?"

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