ऐसा कहा गया है कि समय और इतिहास खुद को दोहराता है, कुछ ऐसा ही कर्नाटक की राजनीति में देखने को मिल रहा है। जिस तरह के आरोप कांग्रेस की ओर से भाजपा और राज्यपाल के खिलाफ लगाए जा रहे हैं इससे यही पता चलता है कि कांग्रेस खुद का किया भूल गयी है। सत्ता का दुरुपयोग कर राज्य सरकारों को बर्खास्त करने, सबसे बड़े दल को सरकार बनाने से रोकने की तमाम कोशिशें कर चुकी कांग्रेस आज कर्नाटक में राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रही है। बोम्मई केस समेत कांग्रेस की केंद्र सरकार के इशारे पर विभिन्न राज्यों में राज्यपालों द्वारा सरकार बर्खास्त करने या गलत निर्णय लेने के ढेरों उदाहरण हैं।
खैर, देखना है कि कांग्रेस समर्पित जेडीएस सरकार कितने दिन चलती है। क्योंकि कांग्रेस समर्थित सरकारों को असमय ही गिरना पड़ा है। केन्द्र में चन्द्रशेखर की सरकार रामजन्मभूमि विवाद समाप्त करने में अहम् भूमिका निभाते देख राजीव गाँधी ने तुरन्त अपना समर्थन वापस लेकर चंद्रशेखर सरकार को गिराकर, आज तक इस जीवित रखे हुए है। अन्यथा अयोध्या में राम मन्दिर तभी बन गया होता।
2004 का ही एक और किस्सा है। सिद्धारमैया जो कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के सीएम हैं, कभी जेडी-एस में देवगौड़ा की पार्टी के सदस्य हुआ करते थे। इतना ही नहीं, धरम सिंह की सरकार में सिद्धारमैया डिप्टी सीएम के पद पर तैनात थे। उस वक्त कर्नाटक में जेडी-एस और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी। लेकिन एक वर्ष बाद ही देवगौड़ा ने सिद्धारमैया को अनुशासनहीनता के आरोप लगाते हुए हटा दिया था। दरअसल, उन्हें डर था कि सिद्धारमैया कुमारस्वामी के लिए चुनौती बन सकते हैं। हालांकि, बाद में सिद्धारमैया ने कांग्रेस ज्वॉइन कर ली और सीएम बनने का उनका सपना पूरा हो गया।
खैर, देखना है कि कांग्रेस समर्पित जेडीएस सरकार कितने दिन चलती है। क्योंकि कांग्रेस समर्थित सरकारों को असमय ही गिरना पड़ा है। केन्द्र में चन्द्रशेखर की सरकार रामजन्मभूमि विवाद समाप्त करने में अहम् भूमिका निभाते देख राजीव गाँधी ने तुरन्त अपना समर्थन वापस लेकर चंद्रशेखर सरकार को गिराकर, आज तक इस जीवित रखे हुए है। अन्यथा अयोध्या में राम मन्दिर तभी बन गया होता।
कांग्रेस ने ही शुरू की थी यह परिपाटी
विरोधी सरकारों को बर्खास्त करने और विपक्षी दलों को सरकार बनाने से रोकने जैसे कई कामों में कांग्रेस पहले खुद ही गवर्नर के ऑफिस का इस्तेमाल कर चुकी है। कर्नाटक का बोम्मई केस भी इसका सटीक उदाहरण है।
भाजपा शासित चार राज्यों की सरकारें हुईं थीं बर्खास्त
सन 1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने भाजपा शासित चार राज्यों में सरकारें बर्खास्त कर दी थीं। इससे पहले भी कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता रहा, जिसमें 1988 में कर्नाटक में एसआर बोम्मई की सरकार की बर्खास्तगी का मामला शामिल है। 1994 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के सामने इन तमाम मामलों को लेकर सुनवाई हुई, जिसे बोम्मई केस के नाम से जाना जाता है।
पहले भी किंगमेकर से किंग बन चुकी है जेडी-एस
पहले भी किंगमेकर से किंग बन चुकी है जेडी-एस एचडी देवगौड़ा भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो चुके हैं। लेकिन भारत का पीएम बन जाना ही उनकी एकमात्र बड़ी उपलब्धि नहीं है। प्रधानमंत्री का पद जाने के 7 साल बाद 2004 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव हुए थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी थी, जिसके पास 79 सीटें थीं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस थी, जिसे 65 सीटें मिली थीं, लेकिन तीसरे नंबर की पार्टी जेडी-एस 20 या 30 नहीं बल्कि 58 सीटें जीतकर आई थी। उस वक्त जेडी-एस ने कांग्रेस को मजबूर कर दिया था, जिसकी वजह से एन धरम सिंह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा, जबकि पार्टी एसएम कृष्णा को सीएम बनाना चाहती थी।
बेटे कुमारस्वामी की राजनीति चमकाने के लिए देवगौड़ा ने ले ली थी सिद्धारमैया की बलि2004 का ही एक और किस्सा है। सिद्धारमैया जो कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के सीएम हैं, कभी जेडी-एस में देवगौड़ा की पार्टी के सदस्य हुआ करते थे। इतना ही नहीं, धरम सिंह की सरकार में सिद्धारमैया डिप्टी सीएम के पद पर तैनात थे। उस वक्त कर्नाटक में जेडी-एस और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी। लेकिन एक वर्ष बाद ही देवगौड़ा ने सिद्धारमैया को अनुशासनहीनता के आरोप लगाते हुए हटा दिया था। दरअसल, उन्हें डर था कि सिद्धारमैया कुमारस्वामी के लिए चुनौती बन सकते हैं। हालांकि, बाद में सिद्धारमैया ने कांग्रेस ज्वॉइन कर ली और सीएम बनने का उनका सपना पूरा हो गया।
कर्नाटक का सियासी नाटक अपने चरम पर है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। आज से करीब 36 साल पहले हरियाणा में 21 से 23 मई 1982 तक कर्नाटक जैसा ही राजनीतिक घटनाक्रम हुआ था। लोकदल नेता चौधरी देवीलाल और भाजपा नेता डॉ. मंगल सेन (अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं) चंडीगढ़ में हरियाणा के राज्यपाल जीडी तपासे से मिले और उन्हें 90 में से 46 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र सरकार बनाने के लिए सौंपा। राज्यपाल ने विधायकों के हस्ताक्षर की सत्यता की जांच करने के लिए दोनों नेताओं को 24 मई तक इंतजार करने को कहा और 23 मई को ही 36 विधायकों वाली कांग्रेस के नेता चौधरी भजन लाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।
राज्यपाल ने भजन लाल को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दिया। इससे नाराज चौधरी देवीलाल और डॉ. मंगल सेन ने विधायकों के साथ चंडीगढ़ राजभवन में परेड भी की, मगर हरियाणा राजभवन में उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। तब भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस संबंध में तत्कालीन राष्ट्रपति से विरोध भी जताया था। इन दोनों नेताओं ने तब आरोप लगाया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इशारे पर राज्यपाल ने बहुमत के गठबंधन को मौका नहीं दिया। 1982 के विधानसभा चुनाव में हरियाणा की सभी 90 सीटों पर लोकदल और भाजपा गठबंधन ने चुनाव लड़ा था। इनमें 31 पर लोकदल और छह पर भाजपा प्रत्याशी जीते। कांग्रेस के 36 और स्वर्गीय जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस (जे) के 3 विधायक जीते थे। 16 विधायक निर्दलीय थे।
देवीलाल समर्थक युवक ने राज्यपाल के मुंह पर कालिख पोती
राज्यपाल से खफा चौधरी देवीलाल समर्थक बहादुरगढ़ के युवक जोगिंद्र सिंह हुड्डा ने 15 अगस्त 1982 को फरीदाबाद के वाईएमसीए ग्राउंड में राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में राज्यपाल जीडी तपासे के मुंह पर कालिख पोत दी। चौधरी देवीलाल ने स्वयं फरीदाबाद के पुलिस थाने पहुंचकर जोगिंद्र का बचाव किया था।
तपासे पर था केंद्र का दबाव : महिपाल सिंह
हरियाणा लोकसंपर्क विभाग के पूर्व संयुक्त निदेशक महिपाल सिंह ने बताया, ‘तत्कालीन राज्यपाल जीडी तपासे पुराने गांधीवादी नेता थे और उन्हें यह पद पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से संपर्क के कारण मिला था। तपासे नहीं चाहते थे कि हरियाणा में उनके रहते जोड़-तोड़ की सरकार बने मगर राजनीति के पीएचडी कहलाने वाले भजनलाल ने उन्हें (राज्यपाल) तब इंदिरा गांधी के खासमखास धीरेंद्र ब्रह्मचारी व आरके धवन से कहलवाया था।
यहां तक भी कहा जाता है कि तपासे को तब केंद्र के इशारे पर एक नेता ने यह भी कह दिया था कि यदि भजनलाल को रविवार के दिन शपथ नहीं दिलाई तो वह अपना इस्तीफा भेज दें। इसी कारण राज्यपाल ने रविवार के दिन ही भजन लाल को शपथ दिलवाई थी।’ भाजपा कर्नाटक में कांग्रेस के साथ ठीक बर्ताव कर रही है। वैसे भाजपा और कांग्रेस को राष्ट्रीय दल के रूप में अतीत से सबक लेना चाहिए। जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के सामने जोड़तोड़ की सरकार बनाने का दुष्परिणाम ठीक वैसे ही होता है जैसा हरियाणा में 1982 के बाद 1987 में हुआ। (एजेंसी इनपुट से)
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