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सिद्दारमैया 40 साल में 5 साल का टर्म पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री
कर्नाटक में 12 मई को वोटिंग है। भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस के उम्मीदवारों में नामांकन भरने की होड़ लगी है। मंगलवार को इसका आखिरी दिन है।
मुख्यमंत्री सिद्दारमैया 40 साल में कर्नाटक के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया है। इस दौरान 15 मुख्यमंत्री बने हैं। 5 बार राष्ट्रपति शासन लगा है। सिद्दारमैया का दावा है कि वह 165 चुनावी वादों में से 156 पूरे कर चुके हैं। इस बार भी चुनाव में कई बड़े मुद्दे हैं।
राज्य में नामांकन की सोमवार को आखिरी तारीख है। 12 मई को वोटिंग है। 15 मई को नतीजे आएंगे।
कर्नाटक के चुनावी क्षेत्र
224 विधानसभा सीटें हैं कर्नाटक में। ये छह चुनावी क्षेत्रों में बंटी हैं।
| क्षेत्र | सीटें |
| हैदराबाद कर्नाटक | 31 |
| बांबे कर्नाटक | 50 |
| तटीय कर्नाटक | 20 |
| मध्य कर्नाटक | 36 |
| दक्षिणी कर्नाटक | 51 |
| बेंगलुरू कर्नाटक | 36 |
1) किसान:56% लोग खेती पर निर्भर- 2013 से 2017 तक राज्य में करीब 3515 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। राज्य की 56% आबादी खेती पर निर्भर है। 16 साल में 13 बार सूखे की स्थिति का सामना किया।
2) भ्रष्टाचार: कर्नाटक सबसे भ्रष्ट राज्य- भाजपा ने 3 रेड्डी बंधुओं में से 2 को टिकट दिया है। कांग्रेस ने भी भ्रष्टाचार में फंसे कई नेताओं को टिकट दिया है। 20 राज्यों में हुए सर्वे में रिश्वत लेने में कर्नाटक को सबसे आगे बताया गया था।
3) हिंदुत्व: मक्का मस्जिद ब्लास्ट पर फैसला- राज्य में केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े हिंदुत्व के बड़े चेहरे हैं। मक्का-मस्जिद ब्लास्ट में कोर्ट का फैसला भाजपा के लिए ट्रम्प कार्ड बन सकता है। पार्टी कांग्रेस को घेर रही है।
4) कन्नड़ पहचान: अलग झंडे को मान्यता- सीएम सिद्धारमैया राज्य में हमेशा से हिंदी के विरोध और कन्नड़ को प्राथमिकता देने में मुखर रहे हैं। उनकी सरकार कर्नाटक के लिए अलग ध्वज के बिल को भी पास कर चुकी है।
5) लिंगायत: अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा- राज्य में 18 से 20% लिंगायत वोटर हैं। वे 100 सीटों पर असर डालते हैं। सिद्धारमैया ने चुनाव से पहले लिंगायत को अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देने का बिल पास कर प्रस्ताव केंद्र को भेजा है।
6) जल बंटवारा: किसान 900 दिन से धरने पर- कावेरी जल विवाद के बाद किसान अब महादयी नदी का जल गोवा के साथ बांटने के फैसले का विरोध कर रहे हैं। उत्तरी कर्नाटक में किसान 900 दिनों के धरने पर बैठे हैं।
7) हत्याएं: पत्रकार गौरी लंकेश और कलबुर्गी- पत्रकार गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी के हत्यारों को पकड़ने में नाकाम सिद्धारमैया सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी है। भाजपा का कहना है कि उसके कार्यकर्ता भी राज्य में मारे गए हैं।
8) दलित:मंत्री का बयान, संविधान बदलना चाहिए- राज्य में करीब 19% दलित वोटर हैं। कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े ने बयान दिया था कि संविधान को समय-समय पर बदलना चाहिए। इससे दलितों में नाराजगी है।
भाजपा ने जारी की चौथी सूची
भाजपा ने अप्रैल 23 को 7 प्रत्याशियों की चौथी सूची जारी की। अब तक भाजपा 224 में 220 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। कांग्रेस पहले ही 224 उम्मीदवार की लिस्ट जारी कर चुकी है।
कर्नाटक के पांच बड़े ओपिनियन पोल
| ओपिनियन पोल | भाजपा | कांग्रेस | जेडीएस |
| एबीपी-सीएसडीएस | 89-95 | 85-91 | 32-38 |
| इंडिया टुडे-कावेरी | 76-86 | 90-91 | 34-43 |
| टाइम्स नॉउ-बीएमआर | 89 | 91 | 40 |
| इंडिया टुडे-कावेरी | 76-86 | 90-91 | 34-43 |
| सी-फोर | 70 | 126 | 27 |
| टीवी-9-सी वोटर | 96 | 102 | 25 |
| औसत सीटें | 87 | 100 | 40 |
कांग्रेस को सबसे कम 85 सीटें एबीपी-सीएसडीएस ने दी हैं।
क्या देवगौड़ा उस कांग्रेस को भीख देंगे जिसने उन्हें रातों-रात पीएम से 'X PM' बना दिया था
चुनाव के बाद हालात ऐसे बन सकते हैं कि कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए देवगौड़ा का समर्थन लेना पड़े। लेकिन क्या ये संभव होगा? यदि चुनाव के बाद राज्य में त्रिशंकु के हालात बने तो देवगौड़ा कांग्रेस को समर्थन देने से मना कर सकते हैं? ऐसा हो सकता है। इसके पीछे की वजह आज की नहीं 22 साल पहले की है।कांग्रेस के लिए ऐसे जरुरी हुए देवगौड़ा
चुनाव के पहले पांच बड़े ओपिनियन पोल सर्वे आए हैं। इनमें से 4 में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला है। सभी ने राज्य में त्रिशंकु सरकार का दावा किया है। भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्टर दिखाई दे रही है। हालांकि, भाजपा को पिछले चुनाव से सीटों का फायदा होता दिख रहा है। लेकिन बड़ी पार्टी के रुप में कांग्रेस ही उभरती नजर आ रही है।
सभी सर्वे का अगर औसत ले तो कांग्रेस को करीब 100, बीजेपी को 87 और देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस को करीब 40 सीटें मिल रही हैं। 224 विधानसभा वाले इस राज्य में बहुमत के लिए 113 सीटें चाहिए। राजनीतक रुप से जेडीएस और बीजेपी का मिलन असंभव सा है।
ऐसे में कांग्रेस और जेडीएस मिलकर सरकार बना सकते हैं। अब सवाल ये है कि क्या देवगौड़ा कांग्रेस सरकार को समर्थन करेंगे।
अब से करीब 22 साल पहले जब एचडी देवगौड़ा देश के पीएम थे तब कांग्रेस ने उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। कर्नाटक में 12 मई को वोटिंग और नतीजे 15 मई को आएंगे।
सीताराम केसरी सहमत नहीं थे
कांग्रेस की तरफ से रातो-रात देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा की गई थी। कहा जाता है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी ये भनक नहीं थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापसी का अपना पत्र राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को सौंपने जा रहे हैं।
कांग्रेस की तरफ से यह कभी स्पष्ट रुप से साफ नहीं किया गया कि उसने दस महीने पुरानी देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापस क्यों लिया। 1996-97 के उस दौर में बड़े कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह, माधव राव सिंधिया और नारायण तिवारी पार्टी से अलग हट चुके थे।
11 अप्रैल, 1997 में केंद्र में 10 महीने पुरानी एच डी देवेगौड़ा सरकार विश्वास प्रस्ताव हार गई थी। कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद अल्पमत में आई देवेगौड़ा सरकार के विश्वास मत के ख़िलाफ़ 292 सांसदों ने मतदान किया था जबकि 158 सदस्य इसके पक्ष में थे। 6 संसद सदस्यों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था।
समर्थन वापसी के अपने पत्र में कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने लिखा था कि देश के कई महत्वपूर्ण मुददो को ये सरकार एड्रेस नहीं कर पा रही है। भारत में लगातार फांसीवादी और विभाजनकारी ताकतें बढ़ रही हैं। उन्हें रोक पाने में ये सरकार नाकाम हैं। साथ ही उन्होंने देवगौड़ा सरकार पर कांग्रेस को कमजोर करने के आरोप लगाए थे।
हालांकि राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि उस समय सीताराम केसरी खुद ही पीएम बनना चाहते थे। वह देवगौड़ा सरकार से नाराज थे और चाहते थे कि उन्हें ही गठबंधन सरकार का नेता घोषित कर दिया जाए।
हम नहीं चाहते थे कि देवगौड़ा सरकार गिरा दी जाए
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और उस समय की कांग्रेसी सांसद ममता बनर्जी ने देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने के पूरे एपिसोड को एक किस्से में बताया है। ममता बनर्जी की किताब मेरी संघर्षपूर्ण यात्रा में वह लिखती हैं कि जब देवगौड़ा सरकार गिराई गई थी तो हम सब सांसद चाहते थे कि हमें इसकी वजह बताई जाए।
ये सरकार लगभग एक साल से काम कर रही थी और अच्छा काम कर रही थी। हमने इस बारे में बात करने की कोशिश की लेकिन पाया कि हर तरफ इसको लेकर चुप्पी है। कोई भी इस बारे में बात करने से बचना चाहता था।
एक दिन हम 50 के करीब सांसदों ने तय किया कि हम शरद पवार के घर जाकर उनसे इस बारे में बात करेंगे कि क्या चुनी हुई प्रजातांत्रिक सरकार को इस तरह से सिर्फ अपनी निजी वजहों से गिरा देना उचित होगा? हमें इस बारे में पता तो होनी चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। क्योंकि जब इंदिरा गांधी ने मोरार जी सरकार से समर्थन वापसी लेने की घोषणा की थी उसके पहले उन्होंने इस फैसले पर पार्टी के अंदर बात की थी।
इसी तरह राजीव गांधी ने चन्द्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेने से पहले पार्टी के एक-एक सांसद से इस बारे में बात की। हर पार्टी सांसद को वो वजह बताई जिस वजह से सरकार से समर्थन वापस लिया जा रहा है।
लेकिन देवगौड़ा के मामले में ऐसा नहीं हुआ। हम सांसद देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने के पक्ष में नहीं थे लेकिन संदेश ऐसा गया कि हर सांसद चाहता है कि देवगौड़ा सरकार गिरा दी जाए।

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