आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
पिछले तीन दशकों से भाजपा के खाते में रही गोरखपुर सीट पर इस बार सपा ने जीत का परचम लहराकर सभी को चौंका दिया है। गोरखपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने भाजपा के प्रत्याशी उपेंद्र दत्त शुक्ला को 21,881 वोटों से हरा दिया। प्रवीण निषाद को जहां 4,56,513 वोट मिले, वहीं भाजपा प्रत्याशी 4,34,632 वोट ही हासिल कर सके। खास बात ये रही कि जिस बूथ पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वोट डाला था, उस बूथ पर पड़े कुल 1775 वोटों में से भाजपा को सिर्फ 43 वोट ही मिल सके। यानि जिस तरह भाजपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के सदस्य अपनी ही पार्टी को वोट नहीं देते। दिल्ली में एक चुनाव में मंडल अध्यक्ष के ही पोलिंग बूथ पर भाजपा को वोट मिले 0, यानि अध्यक्ष परिवार को छोड़िए, मंडल प्रधान तक का वोट नहीं। उपचुनाव में सपा को बसपा समेत कई दलों से गठबंधन का जबरदस्त फायदा मिला। मुस्लिम, यादव, दलित और निषादों के वोट पार्टी को अच्छी-खासी तादाद में मिले। वहीं, कांग्रेस अभी भी राज्य में अपने जनाधार के लिए संघर्ष करती दिखी। यही वजह है कि कांग्रेस की प्रत्याशी डॉ. सुरहीता करीम को सिर्फ 18,844 वोट ही मिल सके और उनकी जमानत जब्त हो गई। जो सिद्ध करता है कि समाजवादी पार्टी थाली में सजकर नहीं मिली। ये दोनों पार्टियों का बिखरता वोट है, जिसके दम पर इतनी ख़ुशी मनाई जा रही है।
चुनावी मतगणना के दौरान थोड़ा विवाद भी हुआ, जब पांच राउंड की मतगणना पूरी होने के बाद सिर्फ एक राउंड का नतीजा घोषित किया गया। सपा प्रत्याशी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी पर चुनाव में धांधली का भी आरोप लगाया। इसके बाद धरना-प्रदर्शन भी हुआ, हालांकि बाद में स्थिति संभल गई। चुनाव आयोग ने भी निर्वाचन अधिकारी से सवाल-जवाब किए हैं। वहीं, भाजपा की हार के कारणों की बात करें तो भाजपा अति आत्मविश्वास का शिकार हो गई, जिसका उसे खामियाजा भुगतना पड़ा।
शहरी वोटरों को भाजपा समर्थक माना जाता है। लेकिन इन उपचुनावों में शहरों में वोट बेहद कम पड़े। भाजपा नेता सिर्फ कार्यालयों में बैठकर ही चुनाव की समीक्षा करते रहे और वोटरों को बूथ तक लाने में नाकाम रहे। इसी का खामियाजा भाजपा को चुनाव नतीजों में उठाना पड़ा। इसके अलावा भाजपा योगी मैजिक के भरोसे ही बैठी रही, जिससे कार्यकर्ता जमीन पर उतरकर सरकार के कामों को लोगों को समझाने में नाकाम रहे। हालांकि, योगी आदित्यनाथ ने इन चुनावों में 16 कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसभाएं की थीं, लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी शायद योगी की मेहनत पर भारी पड़ी।
दरअसल, नोएडा को लेकर एक सियासी भ्रम चला आ रहा है कि जो कोई भी मुख्यमंत्री यहां का दौरा करता है उसे अपनी कुर्सी गंवानी पड़ती है। मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव ने कभी भी नोएडा का दौरा नहीं किया। मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा से जुड़ी विकास योजनाओं का उद्घाटन उन्होंने लखनऊ से ही किया। यूपी के सीएम रहते हुए वीर बहादुर सिंह ने नोएडा का दौरा किया था, जिसके कुछ दिन बाद जून 1988 को उनकी कुर्सी चली गई थी। इसके बाद बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इस अंधविश्वास को तोड़ते हुए नोएडा का दौरा किया था, लेकिन उसके बाद साल 2012 के विधानसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इससे यह अंधविश्वास और मजबूत हो गया।
आदित्यनाथ ने राजनीतिक रूप से 'मनहूस' समझे जाने वाले नोएडा का 25 दिसंबर को दौरा किया था। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली मेट्रो की 12.64 किलोमीटर लंबी मैजेंटा लाइन का उद्घाटन किया। इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे। इस लाइन ने नोएडा के बॉटनिकल गार्डन को दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मंदिर स्टेशन से जोड़ा। उद्घाटन के बाद पीएम मोदी ने सीएम योगी के साथ मेट्रो में ओखला बर्ड सेंक्चुअरी स्टेशन तक सफर किया।
नेशनल कांफ्रेंस के नेता एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ट्ववीट किया। उमर ने कहा कि भाजपा में क्या कोई अपने नए हेडक्वॉर्टर के वास्तु या फेंगशुई की जांच कर रहा है।
आदित्यनाथ ने कहा था कि वह नोएडा आकर दशकों से चले आ रहे मिथक और अंधविश्वास को तोड़ेंगे।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में करारी हार योगी की आशंकाओं को जाहिर करती है। दरअसल 1969 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनी और चंद्र भानु गुप्ता मुख्यमंत्री बने।मगर उन्हें भारतीय क्रांति दल के चौधरी चरण सिंह के लिए साल भर के भीतर ही कुर्सी छोड़नी पडी। मगर चौधरी चरण सिंह भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सात महीने ही टिक पाए। चरण सिंह ने बाद में विधानसभा भंग करने की सिफारिश की, मगर तत्कालीन राज्यपाल गी गोपाल रेड्डी ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा। फिर 17 दिन तक चले राष्ट्रपति शासन के बाद त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने, वे संयुक्त विधायक दल का नेतृत्व कर रहे थे, उनके साथ भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस(ओ) के नेताओं का समर्थन रहा।
1952 और 1962 लोकसभा के मेंबर रह चुके वाराणसा निवासी त्रित्रुवन ने 18, अक्टूबर 1970 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। विधानसभा में उनका मार्ग प्रशस्त करने के लिए योगी आदित्यनाथ के गुरु दिवंगत महंत अवैद्यनाथ ने गोरखपुर की अपनी जीती हुई मनीराम सीट खाली की। मार्च 1971 में उपचुनाव हुआ। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस प्रत्याशी राम कृष्ण दि्वेदी के पक्ष में जनसभा की। नतीजा यह रहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह उपचुनाव हार गए। उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया। कांग्रेस प्रत्याशी द्विवेदी को जहां 33,230 वोट मिले, वहीं मुख्यमंत्री सिंह को इससे आधा महज 17,137। जबकि 1969 में अवैद्यनाथ ने कांग्रेस प्रत्याशी द्विवेदी को हराया था। अवैद्यनाथ को तब 19,644 और द्विवेदी को 16,663 वोट मिले थे। त्रिभुवन नारायण सिंह तब देश के पहले ऐसे शक्स थे, जो विधानसभा के किसी भी सदन का सदस्य हुए बगैर मुख्यमंत्री बने थे।
वर्ष 1989 से 1996 तक इस सीट से गोरक्ष पीठ के महंत अवेद्यनाथ (ब्रह्मालीन) और उनके बाद उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ इस सीट से चुनाव मैदान में उतरते रहे। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सीट खाली हुई तो उप चुनाव में भाजपा ने पार्टी के पुराने कार्यकर्ता उपेंद्र दत्त शुक्ल को उम्मीदवार बनाया। इस सीट पर भाजपा की जीत के प्रति आश्वस्त लोग उम्मीदवारी घोषित होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर उपेंद्र दत्त शुक्ल को भावी जीत की बधाई देने लगे। योगी के प्रभाव वाली सीट पर उपेंद्र की जीत तय मानने वालों की बड़ी तादात थी। उप चुनाव के लिए सपा, बसपा, निषाद पार्टी और पीस पार्टी के एक मंच पर आ जाने के बाद राजीनीतिक विश्लेषक भी लड़ाई कठिन तो बता रहे थे लेकिन अंतत: कम अंतर से ही सही भाजपा उम्मीदवार की जीत की भविष्यवाणी भी कर रहे थे।
उप चुनाव की आहट शुरू होते ही दोनों दलों में जीत की रणनीति बनाने लगी। भाजपा को जहां अपने परंपरागत मतदाताओं और मोदी व योगी के प्रभाव पर भरोसा था वहीं बसपा, निषाद पार्टी और सपा के साथ मिलकर सपा जातीय समीकरण बनाने में जुटी थी। सपा, बसपा, पीस और निषाद पार्टी के पदाधिकारियों से लेकर कार्यकर्ता तक मतदाताओं तक तेजी से पहुंच बना रहे थे। चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि वे इसमें सफल भी हुए।
पिछले तीन दशकों से भाजपा के खाते में रही गोरखपुर सीट पर इस बार सपा ने जीत का परचम लहराकर सभी को चौंका दिया है। गोरखपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने भाजपा के प्रत्याशी उपेंद्र दत्त शुक्ला को 21,881 वोटों से हरा दिया। प्रवीण निषाद को जहां 4,56,513 वोट मिले, वहीं भाजपा प्रत्याशी 4,34,632 वोट ही हासिल कर सके। खास बात ये रही कि जिस बूथ पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वोट डाला था, उस बूथ पर पड़े कुल 1775 वोटों में से भाजपा को सिर्फ 43 वोट ही मिल सके। यानि जिस तरह भाजपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के सदस्य अपनी ही पार्टी को वोट नहीं देते। दिल्ली में एक चुनाव में मंडल अध्यक्ष के ही पोलिंग बूथ पर भाजपा को वोट मिले 0, यानि अध्यक्ष परिवार को छोड़िए, मंडल प्रधान तक का वोट नहीं। उपचुनाव में सपा को बसपा समेत कई दलों से गठबंधन का जबरदस्त फायदा मिला। मुस्लिम, यादव, दलित और निषादों के वोट पार्टी को अच्छी-खासी तादाद में मिले। वहीं, कांग्रेस अभी भी राज्य में अपने जनाधार के लिए संघर्ष करती दिखी। यही वजह है कि कांग्रेस की प्रत्याशी डॉ. सुरहीता करीम को सिर्फ 18,844 वोट ही मिल सके और उनकी जमानत जब्त हो गई। जो सिद्ध करता है कि समाजवादी पार्टी थाली में सजकर नहीं मिली। ये दोनों पार्टियों का बिखरता वोट है, जिसके दम पर इतनी ख़ुशी मनाई जा रही है।
चुनावी मतगणना के दौरान थोड़ा विवाद भी हुआ, जब पांच राउंड की मतगणना पूरी होने के बाद सिर्फ एक राउंड का नतीजा घोषित किया गया। सपा प्रत्याशी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी पर चुनाव में धांधली का भी आरोप लगाया। इसके बाद धरना-प्रदर्शन भी हुआ, हालांकि बाद में स्थिति संभल गई। चुनाव आयोग ने भी निर्वाचन अधिकारी से सवाल-जवाब किए हैं। वहीं, भाजपा की हार के कारणों की बात करें तो भाजपा अति आत्मविश्वास का शिकार हो गई, जिसका उसे खामियाजा भुगतना पड़ा।
शहरी वोटरों को भाजपा समर्थक माना जाता है। लेकिन इन उपचुनावों में शहरों में वोट बेहद कम पड़े। भाजपा नेता सिर्फ कार्यालयों में बैठकर ही चुनाव की समीक्षा करते रहे और वोटरों को बूथ तक लाने में नाकाम रहे। इसी का खामियाजा भाजपा को चुनाव नतीजों में उठाना पड़ा। इसके अलावा भाजपा योगी मैजिक के भरोसे ही बैठी रही, जिससे कार्यकर्ता जमीन पर उतरकर सरकार के कामों को लोगों को समझाने में नाकाम रहे। हालांकि, योगी आदित्यनाथ ने इन चुनावों में 16 कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसभाएं की थीं, लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी शायद योगी की मेहनत पर भारी पड़ी।
गोरखपुर-फूलपुर हार का है नोएडा कनेक्शन!
उत्तर प्रदेश में लोकसभा की दो सीटों गोरखपुर और फूलपुर पर हुए उप चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हार मिली है। भाजपा की इस हार के सियासी कारण तो निकाले जा रहे हैं, साथ ही सोशल मीडिया पर लोग इसे नोएडा अपशकुन से जोड़कर देख रहे हैं। फूलपुर और गोरखपुर दोनों सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा। दोनों जगहों पर समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवारों को जीत मिली। भाजपा को हार मिलते ही सोशल मीडिया पर लोग सक्रिय हो गए। लोगों ने कहा कि योगी आदित्यनाथ ने नोएडा का दौरा किया था इसलिए उसे उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा।
दरअसल, नोएडा को लेकर एक सियासी भ्रम चला आ रहा है कि जो कोई भी मुख्यमंत्री यहां का दौरा करता है उसे अपनी कुर्सी गंवानी पड़ती है। मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव ने कभी भी नोएडा का दौरा नहीं किया। मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा से जुड़ी विकास योजनाओं का उद्घाटन उन्होंने लखनऊ से ही किया। यूपी के सीएम रहते हुए वीर बहादुर सिंह ने नोएडा का दौरा किया था, जिसके कुछ दिन बाद जून 1988 को उनकी कुर्सी चली गई थी। इसके बाद बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इस अंधविश्वास को तोड़ते हुए नोएडा का दौरा किया था, लेकिन उसके बाद साल 2012 के विधानसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इससे यह अंधविश्वास और मजबूत हो गया।आदित्यनाथ ने राजनीतिक रूप से 'मनहूस' समझे जाने वाले नोएडा का 25 दिसंबर को दौरा किया था। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली मेट्रो की 12.64 किलोमीटर लंबी मैजेंटा लाइन का उद्घाटन किया। इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे। इस लाइन ने नोएडा के बॉटनिकल गार्डन को दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मंदिर स्टेशन से जोड़ा। उद्घाटन के बाद पीएम मोदी ने सीएम योगी के साथ मेट्रो में ओखला बर्ड सेंक्चुअरी स्टेशन तक सफर किया।
नेशनल कांफ्रेंस के नेता एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ट्ववीट किया। उमर ने कहा कि भाजपा में क्या कोई अपने नए हेडक्वॉर्टर के वास्तु या फेंगशुई की जांच कर रहा है।
Anyone in the BJP checking the vastu/feng shui of their new HQ?
और
जाओ NOIDA योगी जी!! 
जाओ NOIDA योगी जी!! 
एक सीएम हार चुका है उपचुनाव और गोरखपुर से नहीं लड़े थे?--योगी आदित्यनाथ
पिछले साल जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में मतदान के बाद गोरखपुर लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था। क्योंकि नियम के मुताबिक अगर कोई मंत्री या मुख्यमंत्री बनते वक्त विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होता तो उसे छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य होना जरूरी होता है। या तो संबंधित शख्स उपचुनाव के जरिए विधानसभा पहुंचे या फिर बिना चुनाव लड़े विधान परिषद के लिए नामित हो। उस समय योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा उपचुनाव लड़ने की जगह सीधे उच्च सदन यानी विधानसरिषद सदस्य बनना ज्यादा उचित समझा। खुद योगी आदित्यननाथ ने अपनी इस इच्छा से बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा दिया था। नहीं तो योगी आदित्यनाथ के लिए किसी विधायक को अपनी सीट खाली पड़नी पड़ती, तब उपचुनाव होता। पार्टी के भरोसेमंद सूत्र बताते हैं, तब योगी ने पार्टी नेतृत्व से साफ कहा था,”गोरखपुर से एक मुख्यमंत्री उपचुनाव हार चुके हैं। इस नाते वे उच्चसदन जाएंगे। इसी के साथ योगी और उनके दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या तथा दिनेश शर्मा भी विधान परिषद सदस्य बने।गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में करारी हार योगी की आशंकाओं को जाहिर करती है। दरअसल 1969 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनी और चंद्र भानु गुप्ता मुख्यमंत्री बने।मगर उन्हें भारतीय क्रांति दल के चौधरी चरण सिंह के लिए साल भर के भीतर ही कुर्सी छोड़नी पडी। मगर चौधरी चरण सिंह भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सात महीने ही टिक पाए। चरण सिंह ने बाद में विधानसभा भंग करने की सिफारिश की, मगर तत्कालीन राज्यपाल गी गोपाल रेड्डी ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा। फिर 17 दिन तक चले राष्ट्रपति शासन के बाद त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने, वे संयुक्त विधायक दल का नेतृत्व कर रहे थे, उनके साथ भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस(ओ) के नेताओं का समर्थन रहा।
1952 और 1962 लोकसभा के मेंबर रह चुके वाराणसा निवासी त्रित्रुवन ने 18, अक्टूबर 1970 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। विधानसभा में उनका मार्ग प्रशस्त करने के लिए योगी आदित्यनाथ के गुरु दिवंगत महंत अवैद्यनाथ ने गोरखपुर की अपनी जीती हुई मनीराम सीट खाली की। मार्च 1971 में उपचुनाव हुआ। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस प्रत्याशी राम कृष्ण दि्वेदी के पक्ष में जनसभा की। नतीजा यह रहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह उपचुनाव हार गए। उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया। कांग्रेस प्रत्याशी द्विवेदी को जहां 33,230 वोट मिले, वहीं मुख्यमंत्री सिंह को इससे आधा महज 17,137। जबकि 1969 में अवैद्यनाथ ने कांग्रेस प्रत्याशी द्विवेदी को हराया था। अवैद्यनाथ को तब 19,644 और द्विवेदी को 16,663 वोट मिले थे। त्रिभुवन नारायण सिंह तब देश के पहले ऐसे शक्स थे, जो विधानसभा के किसी भी सदन का सदस्य हुए बगैर मुख्यमंत्री बने थे।
जीत मानकर चल रहे थे लोग
वर्ष 1980 से लेकर वर्ष 2014 तक हुए लोकसभा चुनावी मुकाबलों में इस सीट पर भाजपा के आसपास भी नजर नहीं आता था। कई बार तो चुनाव परिणाम आने के बाद सभी विपक्षी उम्मीदवारों को मिले मतों को जोड़ भी भाजपा उम्मीदवार को मिले मत से कम ही रहता था। चुनावी लहर कोई हो भाजपा के इस गढ़ में आते-आते बेअसर हो जाती थी। हालांकि यह भी अहम तथ्य है कि ऐसी स्थिति तब थी जब इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार गोरक्ष पीठ से जुड़ा होता था।वर्ष 1989 से 1996 तक इस सीट से गोरक्ष पीठ के महंत अवेद्यनाथ (ब्रह्मालीन) और उनके बाद उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ इस सीट से चुनाव मैदान में उतरते रहे। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सीट खाली हुई तो उप चुनाव में भाजपा ने पार्टी के पुराने कार्यकर्ता उपेंद्र दत्त शुक्ल को उम्मीदवार बनाया। इस सीट पर भाजपा की जीत के प्रति आश्वस्त लोग उम्मीदवारी घोषित होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर उपेंद्र दत्त शुक्ल को भावी जीत की बधाई देने लगे। योगी के प्रभाव वाली सीट पर उपेंद्र की जीत तय मानने वालों की बड़ी तादात थी। उप चुनाव के लिए सपा, बसपा, निषाद पार्टी और पीस पार्टी के एक मंच पर आ जाने के बाद राजीनीतिक विश्लेषक भी लड़ाई कठिन तो बता रहे थे लेकिन अंतत: कम अंतर से ही सही भाजपा उम्मीदवार की जीत की भविष्यवाणी भी कर रहे थे।
उप चुनाव की आहट शुरू होते ही दोनों दलों में जीत की रणनीति बनाने लगी। भाजपा को जहां अपने परंपरागत मतदाताओं और मोदी व योगी के प्रभाव पर भरोसा था वहीं बसपा, निषाद पार्टी और सपा के साथ मिलकर सपा जातीय समीकरण बनाने में जुटी थी। सपा, बसपा, पीस और निषाद पार्टी के पदाधिकारियों से लेकर कार्यकर्ता तक मतदाताओं तक तेजी से पहुंच बना रहे थे। चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि वे इसमें सफल भी हुए।


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