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हिंदू पलायन का मुद्दा उठाने वाले हुकुम सिंह नहीं रहे

भाजपा के कैराना सांसद हुकुम सिंह के निधन से सियासी हलकों में छाया शोक
आर..बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
हुकुम सिंह को सुनने का अवसर 11, अशोका रोड पर "मुज़फ्फरनगर दंगा: एक सच" चर्चा पर सुनने को मिला। उन्होंने  दंगे की जो सच्चाई मीडिया के सम्मुख प्रस्तुत किया, लगभग सभी ने सच्चाई को ब्लैकआउट ही कर दिया था। उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते वही सब तथ्य प्रस्तुत किए पहले ही प्रकाशित कर चुका था। जिस तरह हुकुम सिंह ने मुज़फ्फरनगर दंगे को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव और आज़म खान की नाक में दम कर रखा था। इन्ही के कारण हिन्दू को संरक्षण मिल रहा था। इन्ही के कारण अपने बचाव में आर्मी को बुलाना पड़ा था। लेकिन मौहल्ले और मस्जिदों से बरामद हो रहे असले ने मजबूर होकर आर्मी के तलाशी अभियान को रुकवाना पड़ा था। मेरी रपट पर एकतरफा मुस्लिम विरोधी होने सम्बंधित पाठकीय प्राप्त हुए, लेकिन इन्ही हुकुम सिंह के वक्तत्व ने मेरी रपट की पुष्टि करवा दी थी।  मुज़फ्फरनगर दंगे पर उन्ही का साहस था, कि हिन्दू रक्षा के लिए दंगाइयों के साथ-साथ तत्कालीन अखिलेश सरकार से भी टक्कर ले रहे थे। मुलायम सिंह द्वारा एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी द्वारा दंगाइयों को हवालात से बाहर निकालते हुए यह कहना "पहले मै एक मुस्लिम हूँ, बाद में पुलिस अधिकारी" की पीठ थपथपाने पर मुलायम सिंह पर कठोर प्रहार करने से भी नहीं चुके थे।
उनकी दूरदर्शिता का भी जवाब नहीं। यदि उस समय उनकी बात मान तलाशी अभियान नहीं रोका गया होता, आज कासगंज नहीं होता।
कैराना क्षेत्र के लोकसभा सदस्य श्रद्धेय बाबू जी हुकुम सिंह आज जिंदगी की जंग हार गए। उत्तर प्रदेश ने सुयोग्य, सक्रिय, सजग और शालीन राजनेता खो दिया। उनका दुनिया से अलबिदा कहना मेरे लिए निजी तौर पर बज्रपात जैसा है। अभिभावक तुल्य अपनापा था उनका।
उत्तर प्रदेश के कैराना से बीजेपी सांसद हुकुम सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है। हुकुम सिंह नोएडा के जेपी हॉस्पिटल में पिछले एक महीने से भर्ती थे। उन्हें सांस लेने में तकलीफ थी। वह 79 साल के थे। भाजपा सांसद बीते साल कैराना में रंगदारी और वहां से व्यापारियों के पलायन प्रकरण को लेकर काफी चर्चाओं में आए थे।
हुकुम सिंह ने ही अखिलेश सरकार के कार्यकाल के दौरान कैराना समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हिंदुओं के पलायन का मामला उठाया था। 2014 के चुनावों में वे उत्तर प्रदेश की कैराना सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर निर्वाचित हुए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक प्रकट करते हुए ट्विटर पर कहा, 'सांसद और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता श्री हुकुम सिंह जी के निधन से दुखी हूं । उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ उत्तर प्रदेश के लोगों की सेवा की और किसानों के कल्याण के लिए काम किया। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और समर्थकों के साथ है।'

Anguished by the demise of MP and veteran leader from Uttar Pradesh, Shri Hukum Singh Ji. He served the people of UP with great diligence and worked for the welfare of farmers. My thoughts are with his family and supporters in this hour of grief.
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि सिंह के निधन से पार्टी को अपूरणीय क्षति हुई है। 
कैराना से हिंदू पलायन पर हुकुम सिंह ने दावा किया था कि उन्होंने कैराना से पलायन करने वाले हर घर का सत्यापन कराया है। सिंह ने सूची जारी करते हुए कैराना में बढ़ते अपराध, गुंडागर्दी, धमकी और लूटपाट का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सपा सरकार के कार्यकाल में पलायन करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ। मुजफ्फरनगर जिले के कैराना में 346 हिंदू परिवारों के पलायन से अखिलेश सरकार पर सवाल खड़े हुए थे।
हुकुम सिंह ने कांग्रेस और लोकदल के टिकट पर भी चुनाव लड़ा। 1980 में वे लोकदल के अध्यक्ष भी बने। 1995 में हुकुम सिंह ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और चौथी बार विधायक बने। कल्याण सिंह और रामप्रकाश गुप्ता की सरकार में वे मंत्री भी रहे। 2007 में हुए चुनाव में भी वे विधानसभा पहुंचे। वह प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा की सरकारों में संसदीय कार्य मंत्री समेत अहम पदों पर रह चुके थे। भाजपा सांसद हुकुम सिंह पिछले माह फेफड़े में संक्रमण के कारण जेपी अस्पताल में भर्ती किए थे। वह काफी दिनों से वेंटिलेटर पर थे। हुकुम सिंह के निधन की खबर सुनकर प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय तत्काल जेपी अस्पताल पहुंच गए। हुकुम सिंह की गिनती पश्चिमी उत्तर के दिग्गज नेताओं में थी। इस खबर से मुजफ्फरनगर और शामली के सियासी हल्के में शोक छा गया। 
विधानसभा चुनाव तक लगभग हर सप्ताह बाबू जी घर पर आते थे। घंटों चर्चा होती थी। उनकी बातें उमड़ -घुमड रहीं हैं। बाबू जी चुनाव में पूरी तरह सक्रिय थे। उम्र अस्सी के पार होने के बावज़ूद चुस्त-दुरूस्त थे। कहीं कोई बीमारी नहीं। वह फौज में कैप्टन रहे। फौज छोडने के बाद भी आखिर वक्त तक दिनचर्या और खानपान संतुलित था। बीते कुछ दिनों ने बीमारी ने ऐसा घेरा डाला कि कभी अस्पताल तो कभी घर। काफी कमजोर होने के बाद भी जब भी हल्की राहत महसूस करते सक्रिय हो जाते।
बाबू जी के बहुआयामी व्यक्तित्व की चर्चा शब्दसीमा में बांधना कठिन है। उनसे जुडे तमाम संस्मरण हैं, जिन्हें फिर कभी साझा करेंगे। आज कुछ समझ में नहीं आ रहा। शोक व्यक्त करने को समझ साथ नहीं दे रही और शब्द खोज नहीं पा रहा। बस इतना ही कह सकता हूं कि बाबू जी जैसे बिरले ही होते हैं।

वकालत को बनाया शुरुआती पेशा 

वह मुजफ्फरनगर जिले के कैराना में ही रहते हैं। उनका जन्म 5 अप्रैल 1938 को हुआ था। बचपन से ही वह पढ़ाई में काफी होशियार थे। कैराना में इंटर की पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा गया। वहां पर हुकुमसिंह ने बीए और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। इस बीच 13 जून 1958 को उनकी शादी रेवती सिंह से हो गई।
उन्होंने वकालत का पेशा अपना लिया और प्रैक्टिस करने लगे। इसी दौरान हुकुम सिंह ने जज बनने की परीक्षा पीसीएस (जे) भी पास की। जज की नौकरी शुरू करते, इससे पहले चीन ने भारत पर हमला कर दिया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने युवाओं से देशसेवा के लिए सेना में भर्ती होने के आह्वान पर वह सेना में चले गए। 
1963 में वह भारतीय सेना में अधिकारी हो गए। हुकुमसिंह ने सैन्य अधिकारी 1965 में पाकिस्तान के हमले के समय अपनी टुकड़ी के साथ पाकिस्तानी सेना का सामना किया। इस समय कैप्टन हुकुमसिंह राजौरी के पूंछ सेक्टर में तैनात थे। जब सब सामान्य होने पर 1969 में उन्होंने सेना से इस्तीफा दे दिया और फिर वकालत करने लगे।

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