आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
कहावत है कि "जब पालक ही भक्षक बन जाये, उसे कौन बचाएगा?" और यह कहावत आम आदमी पार्टी पर चरितार्थ होती दिखने जा रही है।
वास्तव में इस पार्टी को कांग्रेस ने ही संरक्षण देकर मोदी लहर में अवरोधक के रूप में मैदान में उतारा था, लेकिन हुआ एकदम विपरीत। कांग्रेस को जितना नुकसान इस पार्टी से हुआ है, भारतीय जनता पार्टी से नहीं।
सेवानिर्वित होने उपरान्त एक हिन्दी पाक्षिक का सम्पादन करते इस पार्टी के गठन पर एक लेख शीर्षक "कांग्रेस के गर्भ से निकली आआप" क्या लिखा कि फोन पर धमकी मिली कि "ख़बरदार केजरीवाल के विरुद्ध कुछ लिखा, वरना..." अगले ही अंक में "वरना" का उत्तर देते हुए शीर्षक "कांग्रेस और आआप का Positive DNA" लिखने पर सबकी बोलती ही बंद हो गयी। और मेरे इन दोनों लेखों पर सत्यापन की मोहर लगाने वाली भी ये ही दोनों पार्टियाँ थी।जो केजरीवाल अपनी चुनावी रैलियों में कहते थे, "मै अपने बच्चों की कसम खाकर कहता हूँ कि अगर हमारी पार्टी दिल्ली में सरकार बनाने में असमर्थ रहती है तो न मैं समर्थन दूंगा और न लूंगा", लेकिन कांग्रेस ने अपने 8 विधायकों का समर्थन दे दिया और सरकार गिरने बाद तक कांग्रेस ने अपना दिया समर्थन तक वापस नहीं लिया। फिर अपनी चुनावी रैलियों में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जेल भेजने के लिए 370 सबूत जनता को दिखाते थे, परन्तु मुख्यमन्त्री बनने पर तत्कालीन विपक्ष नेता डॉ हर्षवर्धन ने शीला के विरुद्ध भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने पर कहते हैं "सबूत दो", अब कोई इनसे पूछे "अपनी चुनावी रैलियों में जो 370 सबूत दिखाकर जनता को पागल बना रहे थे, क्या वह कश्मीर में धारा 370 के पक्ष में सबूत लिए घूम रहे थे?" यानि कांग्रेस ने जिन फाइलों को ठिकाने लगवाना था, वह काम पूरा होते ही, अब कांग्रेस आक्रामक मूढ़ में दिख रही है।
हालाँकि, चुनावों में दोनों ही पार्टियाँ एक-दूसरे को आरोपित करती दिखती हैं, वास्तव में दोनों सिक्के के एक ही पहलु हैं।
अपने विधायकों और मंत्रियों को लेकर मझधार में फंसे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर क्या करेंगे, इस पर अभी मंथन कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली की सत्ता में सर्वाधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता एक मंच पर आकर केजरीवाल सरकार की नीतियों की बखिया उधेड़ेंगे. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित एक साथ इन दिनों केजरीवाल सरकार के कामकाज का हिसाब किताब कर रहे हैं और 14 फरवरी को जब आप सरकार तीन वर्ष पूरे करने का जश्न मना रही होगी, तभी दोनों वरिष्ठ नेता एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस कर सरकार की कमजोर कड़ी पर चोट करेंगे।
8 फरवरी से शुरू होगा कांग्रेस का पोल खोल अभियान
वैसे कांग्रेस का पोल खोल अभियान 8 फरवरी गुरुवार से ही शुरू हो जाएगा। मालूम हो कि अजय माकन ने प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी के साथ निजामुद्दीन स्थित शीला दीक्षित के आवास पर जाकर मुलाकात की। शीला दीक्षित से मुलाकात के बाद अजय माकन ने कहा कि दिल्ली में जितने भी विकास कार्य हुए हैं सबका श्रेय शीला दीक्षित को जाता है। पार्टी उनके कार्यकाल के दौरान हुये कामकाज को दिखाकर ही दिल्ली में चुनाव लड़ेगी।
आप सरकार ने तीन साल के कार्यकाल में दिल्ली को तीन दशक कर दिया पीछे
माकन ने कहा कि आप सरकार के तीन वर्ष के कार्यकाल में दिल्ली का विकास तीन दशक पीछे चला गया है. बिजली बिल की सब्सिडी के नाम पर प्रतिवर्ष दिल्ली सरकार 2500 करोड़ रिलायंस और टाटा को दे रही है. सब्सिडी का लाभ 30 फीसदी लोगों को भी नहीं मिल रहा होगा, लेकिन दोनों कंपनियों को 85 से 93 फीसदी उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने के एवज में भुगतान किया जा रहा है. सर्दी में भी पानी की किल्लत से लोग परेशान हैं. स्वास्थ्य और शिक्षा में बेहतर काम करने के सरकारी दावे भी खोखले हैं. सरकार सूचना के अधिकार के तहत मांगी जा रही जानकारी नहीं दे रही है. अपनी नाकामी छिपाने के लिए दिल्ली सरकार ने वेबसाइट तक बंद कर दी और जब विरोध के बाद वेबसाइट शुरू की गई तो शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित कई आंकड़े हटा दिए गये.
आम आदमी पार्टी के 13 और विधायकों की धड़कनें हुईं तेजआम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की केंद्र की अधिसूचना को चुनौती देते हुए 8 पूर्व विधायकों ने जनवरी 23 को हाई कोर्ट में याचिका दायर की. साथ ही जल्द सुनवाई की मांग पर न्यायमूर्ति एस रविंद्र भट व एके चावला की पीठ ने जनवरी 24 का दिन सुनिश्चित किया है. पूर्व विधायकों ने मांग की कि केंद्र सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाई जाये और उसे रद किया जाये.
हाईकोर्ट ने राहत देने से किया था इंकार
मालूम हो कि 19 जनवरी को चुनाव आयोग ने आप के 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश करते हुए रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेज दिया था. चुनाव आयोग की सिफारिश के बाद 19 जनवरी को छह विधायकों परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत, राजेश गुप्ता, नितिन त्यागी, मदन लाल, सोमदत्त और शरद कुमार ने अंतरिम राहत देने की हाई कोर्ट से गुहार लगाई थी. हाई कोर्ट ने राहत देने से इन्कार करते हुए मामले की सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख दी थी, लेकिन 21 जनवरी को ही राष्ट्रपति ने आयोग की सिफारिश को मंजूरी दे दी और केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी.
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अब इनकी धड़कनें हो गयीं तेज
लाभ के पद मामले में चुनाव आयोग ने अब विभिन्न सरकारी अस्पतालों में रोगी कल्याण समितियों के अध्यक्ष बनाए गये विधायकों के खिलाफ जांच शुरू कर दी है. दबी पड़ी इन विधायकों की शिकायत से संबंधित फाइल को निकाला गया है. चुनाव आयोग इन विधायकों को जल्द ही फिर से नोटिस भेज सकता है. आम आदमी पार्टी (आप) के 20 विधायकों की सदस्यता जाने के बाद अब इस पार्टी के 13 अन्य विधायकों की धड़कनें भी तेज हो गई हैं. इन विधायकों की हालत पिछले एक सप्ताह से अधिक खराब है. अधिवक्ता विभोर आनंद ने 22 जून 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से शिकायत की थी कि आप के 27 विधायक लाभ के पद पर हैं. इसे उन्होंने चुनाव आयोग को भी भेजा था. शिकायत में कहा गया था कि आप सरकार ने 27 विधायकों को दिल्ली के विभिन्न सरकारी अस्पतालों की रोगी कल्याण समिति का अध्यक्ष बनाया हुआ है जो लाभ का पद है. उन्होंने आप के इन विधायकों की सदस्यता निरस्त किए जाने की मांग की थी.
27 विधायकों में से 11 बने रहे संसदीय सचिव
नियम के अनुसार समितियों में इलाके के विधायक अध्यक्ष नहीं हो सकते हैं. इन 27 में से 11 विधायक ऐसे हैं जो संसदीय सचिव थे, अब इनकी सदस्यता समाप्त हो चुकी है. बचे हुए 16 में से दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल व विधायक पंकज पुष्कर दावा कर चुके हैं कि वह किसी अस्पताल के अध्यक्ष नही रहे हैं. वेद प्रकाश विधायक के पद से इस्तीफा दे चुके हैं. ऐसे में 13 विधायक रोगी कल्याण समिति मामले में फंस सकते हैं.
चुनाव आयोग की छवि नहीं हुई है खराब
वही मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) का कार्यभार संभालने के बाद ओपी रावत ने कहा कि आप विधायकों पर फैसले से चुनाव आयोग की छवि पर असर नहीं पड़ेगा. उनका कहना था कि आयोग के काम करने की एक नीति है और उसमें लोगों की आलोचना से कार्यप्रणाली पर कोई असर नहीं पड़ता. नवनियुक्त सीईसी से पूछा गया कि क्या गुजरात चुनाव कराने में देरी और आप विधायकों पर लिए फैसले से चुनाव आयोग की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा. तो रावत का कहना था कि 20 विधायकों को दो बार नोटिस दिये गये, लेकिन उन्होंने जो जवाब दिये वो गुमराह करने वाले थे. जो सवाल उनसे किए गये, उनका जवाब आयोग को नहीं मिला.
लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने पर कानून बनने के बाद ही हो सकता है विचार
श्री रावत का कहना था कि बतौर चुनाव आयुक्त नसीम जैदी, एके ज्योति व खुद उन्होंने मामले की सुनवाई की थी. रावत ने कहा कि चुनावी बांड के मामले में आयोग अगले कुछ दिनों में अपना रुख साफ कर देगा. यह देखा जा रहा है कि क्या जो आपत्तियां आयोग ने जताई थीं, वो अब दूर हो गई हैं. आयोग ने वित्त विभाग की अधिसूचना पर सवाल उठाये थे. रावत ने कहा है कि विधानसभा व लोकसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए एक बार कानून बन जायेगा तभी चुनाव आयोग इस विषय पर विचार कर सकता है. उनका कहना था कि संविधान में चुनाव कराने की जो व्यवस्था है, उसके हिसाब से ही आयोग अपना अगला कदम तय करता है. गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराने पर जोर दिया था. रावत का कहना था कि 2015 में भी आयोग से पूछा गया था कि क्या दोनों चुनाव एक साथ कराये जा सकते हैं. तब भी आयोग का यही कहना था कि संविधान में बदलाव के अलावा मशीनरी का इंतजाम करना होगा. इसमें संसाधनों के अतिरिक्त नौ हजार करोड़ रुपये का खर्च आने की संभावना जताई गई थी.
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