आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
एनडीए में शामिल आंध्र प्रदेश की सत्ता में काबिज तेलगू देशम पार्टी वित्त मंत्री अरुण जेटली के आम बजट से प्रदेश को कुछ नहीं मिलने पर मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू नाराज बताये जा रहे हैं।आम बजट में आंध्र प्रदेश के लिए कोई बड़ा एलान वित्त मंत्री ने नहीं किया है। इसी को लेकर मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने फरवरी 2 को कैबिनेट मंत्रियों के साथ इमरजेंसी मीटिंग की।
बात इस कदर बिगड़ी है कि टीडीपी के सांसदों ने आंध्र के हितों के लिए इस्तीफ़ा तक देने की बात कही है. आगे गठबंधन पर फैसला टीडीपी चीफ (नायडू) लेंगे। रविवार(फरवरी 4 ) को चंद्रबाबू नायडू की सांसदों के साथ मीटिंग होने वाली है। टीडीपी एनडीए का हिस्सा है। राज्य में भी बीजेपी और टीडीपी साथ हैं।
आंध्र प्रदेश में अब तक न जाने कितने मुख्यमंत्री आए, लेकिन आंध्र प्रदेश को ऊँचाइयों पर पहुँचाने में जो योगदान चन्द्रबाबू नायडू का शायद ही इतिहास उनका नाम अनदेखा कर पाए। अगर जो भी ऐसा करता है, वह चन्द्रबाबू के साथ नहीं, बल्कि आंध्र प्रदेश के साथ अन्याय होगा। आईटी सेक्टर में आंध्र प्रदेश को स्थापित करने में चंद्रबाबू का योगदान है, उसे किसी भी स्तर पर नज़रअंदाज़ करना, दिमाग का दिवालियापन ही कहा जाएगा।उनका पुनः एनडीए को समर्थन केवल आंध्र को और ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं। लेकिन बजट में आंध्र को कुछ न देकर अरुण जेतली ने पीठ में छुरा घोंपा है। क्यों नहीं मोदी के "सब का साथ, सबका विकास" मन्त्र को ध्यान में रख बजट बनाया? जेटली की कार्यशैली पर प्रारम्भ से प्रश्नवाचक चिन्ह लगते रहे हैं, जो बजट में अपने सहयोगी दल को किस मंशा से नज़रअंदाज़ किया गया?
आंध्र को 4 साल से मदद का इंतजार
राज्य के कैबिनेट मंत्री एस. चंद्रमोहन रेड्डी ने मीटिंग के बाद कहा कि बजट को लेकर अपना असंतोष केंद्र सरकार को बताएंगे। पार्टी नेताओं ने नायडू से कहा है कि वे इस पर आगे कोई फैसला लें। तेलंगाना से अलग होने के बाद पिछले 4 चार में राज्य को कई मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा है। तभी से हमें केंद्र सरकार की मदद का इंतजार था, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
टीडीपी आंध्र के हितों से समझौता नहीं करेगी
टीडीपी नेता और केंद्रीय मंत्री सुजाना चौधरी ने कहा कि आम बजट से आंध्र प्रदेश के लोगों को काफी निराशा हुई। केंद्र को इसमें पोलावरम प्रोजेक्ट, प्रदेश की नई राजधानी अमरावती के डेवलपमेंट, विशाखापट्टनम मेट्रो प्रोजेक्ट और विशाखापट्टनम रेलवे जोन के लिए फंड देना चाहिए था। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया। टीडीपी आंध्र प्रदेश के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगी। आगे फैसला पार्टी चीफ चंद्रबाबू नायडू लेंगे।
पिछले महीने सीएम नायडू ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। उन्होंने इस दौरान केंद्र से मांग की थी कि राज्यों के विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश के विकास के लिए किए सभी वादों को पूरा किया जाए। ताकि आंध्र भी विकास में दूसरों राज्यों से पीछे न रहे।
नायडू ने कहा था भाजपा को नमस्ते करने में गुरेज नहीं
27 जनवरी को सीएम चंद्राबाबू नायडू ने कहा कि अगर बीजेपी उनका साथ नहीं चाहती तो उन्हें भी उसे नमस्कार करने यानी अलायंस खत्म करने से कोई गुरेज नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि दोनों ही पार्टियों को गठबंधन धर्म का पालन करना चाहिए। क्योंकि गठबंधन धर्म निभाने की वजह से ही हम अब तक चुप रहे हैं। अगर वो हमें नहीं चाहते तो कोई बात नहीं। हम भी उन्हें नमस्कार करके अपना रास्ता खुद तलाश कर लेंगे। नायडू का यह बयान बीजेपी के स्टेट लीडर्स द्वारा उनकी सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना करने के बाद आया था।
वहीँ नायडू के तेवर को लेकर कांग्रेस अन्दर ही अन्दर खुश दिखाई दे रही है. अगर शिवसेना की राह पर चलकर टीडीपी ने भाजपा का साथ छोड़ा तो कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश में वापसी का यह एक सुनहरा अवसर होगा. कांग्रेस एनडीए के असंतुष्ट सदस्यों की तरफ आशा भरी नजरों से देख रही है।
दिल्ली में माना, विरोधी आम आदमी पार्टी की सरकार है, आंध्र में तो आपकी सहयोगी पार्टी की सरकार है। क्या जेतली की मंशा एनडीए में दरार डालने की है? जिस पर भाजपा आलाकमान आँखे मूंदे बैठा है। जेतली पेशे से वकील होने के कारण विपक्ष में प्रधानमंत्री बनने वालों की भीड़ का फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं? 2019 में समस्त भाजपा विरोधी एकजुट होकर चुनाव भी लड़ बहुमत प्राप्त भी लेते हैं, उस स्थिति में प्रधानमंत्री कौन बनेगा कि लड़ाई में बहुमत बेमानी सिद्ध हो जाएगा। और भाजपा ही एकमात्र पार्टी के रूप में सबसे बड़ी पार्टी रहेगी। परन्तु सरकार न बनाने की स्थिति में मध्यवर्द्धि चुनाव में थाली में सजी सत्ता भाजपा के हाथ देखने की उम्मीद लगाए हुए हैं।
उम्मीद होनी चाहिए, क्योकि 2002 गोधरा दंगे उपरान्त, एनडीए से अलग हुए अवसरवादी रामविलास पासवान उस व्यक्ति के नेतृत्व वाली एनडीए में सम्मिलित हो गए, जिसके मुख्यमंत्री कार्यकाल में गोधरा हुआ था। वास्तव में ऐसी मानसिकता वाले नेता ही किसी भी गठबन्धन को सुचारु रूप से चलने में भटका देते हैं और जनता को गुमराह कर अपनी रोटियाँ सेकने से चूकते। वोट देते समय किसी मतदाता में इतना जिस व्यक्ति के चलते तुमने एनडीए को छोड़ दूसरे पाले में चले गए थे, अब क्यों कुर्सी की खातिर उसी व्यक्ति के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में सम्मिलित हो रहे हों ?

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