उलुबेड़िया में जहां 2014 के चुनावों में उसका वोट 11.5 फ़ीसदी था वो अब 23.29 फ़ीसदी हो गया है. वैसे ही नोआपाड़ा में भी वोट प्रतिशत में इजाफा देखने को मिला. दूसरी तरफ़ दो मुख्य विपक्षी पार्टियों लेफ़्ट फ़्रंट और कांग्रेस के वोट प्रतिशत में काफ़ी गिरावट आई है. ऐसा नहीं है कि पहली बार भाजपा ने राज्य के चुनावों में दूसरा स्थान हासिल किया है. दिलचस्प यह है कि पार्टी ने तेज़ी से कुछ सालों में अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाया है. पिछले साल हुए कांथी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा 30 फ़ीसदी वोट प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही. अगस्त’17 में भी निकाय चुनावों में उसने इसी स्थान को सुरक्षित रखा. 21 दिसंबर’17 को हुए सबंग विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी की अंतरा भट्टाचार्य को 37476 मत मिला था जबकि पिछले विधानसभा चुनाव 2016 में बीजेपी के काशीनाथ बसु को 5610 मत मिला था. यानी डेढ़ साल में ही 31866 मत ज्यादा. ऐसे में निश्चित तौर कहा जा सकता है कि भाजपा हार कर भी लगातार जीत रही है
बढ़ता ग्राफ के पीछे का रहस्य
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा का वोट शेयर बढ़ना एक ट्रेंड बन चुका है. वह अब दूसरा स्थान बनाने में सक्षम हो गए हैं. हालांकि, उनके और पहले स्थान में काफ़ी अंतर रहता है. भाजपा के वोट प्रतिशत में इस वृद्धि की वजह टीएमसी विरोधी वोटों का भाजपा के पक्ष में जाना भी है. इससे पहले टीएमसी विरोधी वोट लेफ़्ट या कांग्रेस के खाते में जाते थे. धीरे-धीरे सही लेकिन अब यह बदल रहा है. लेफ़्ट और कांग्रेस के कम हुए वोट प्रतिशत को देखा जाये तो भाजपा का उतना ही वोट प्रतिशत बढ़ा मिलेगा. इसका मतलब साफ़ है कि मूल रूप से भाजपा स्थापित दो राजनीतिक ताकतों को खा रही है.
अवलोकन करें:--
राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर भाजपा के बढ़ते कद के लिए केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति को ही मानते हैं. कुछ हद तक वे संप्रदाय के नाम पर ध्रुवीकरण करने की रणनीति अपनाते भी हैं. हालिया कुछ सांप्रदायिक तनावों की घटना और कुछ रैलियां हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की भी गईं और सांप्रदायिक कार्ड खेला भी जा रहा है. लेकिन भाजपा के तेज़ी से बढ़ने और चुनाव परिणामों के लिए केवल इस कारण को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता. दरअसल, 2011 में वामपंथी चुनाव हार गए जो लोग विपक्षी मंच की खोज में लगे थे उन्होंने भाजपा का दामन थामना शुरू कर दिया.
अवलोकन करें:--
राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर भाजपा के बढ़ते कद के लिए केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति को ही मानते हैं. कुछ हद तक वे संप्रदाय के नाम पर ध्रुवीकरण करने की रणनीति अपनाते भी हैं. हालिया कुछ सांप्रदायिक तनावों की घटना और कुछ रैलियां हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की भी गईं और सांप्रदायिक कार्ड खेला भी जा रहा है. लेकिन भाजपा के तेज़ी से बढ़ने और चुनाव परिणामों के लिए केवल इस कारण को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता. दरअसल, 2011 में वामपंथी चुनाव हार गए जो लोग विपक्षी मंच की खोज में लगे थे उन्होंने भाजपा का दामन थामना शुरू कर दिया.
भाजपा की सबसे कमजोर कड़ी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ ज़रूर रहा है लेकिन पार्टी अभी भी ज़मीनी स्तर पर अपने संगठन का निर्माण कर रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह स्थानीय संगठन को मज़बूत करने के लिए कई बार समयसीमा तय कर चुके हैं, लेकिन राज्य के नेताओं को इसमें ख़ासी मुश्किल आ रही है. कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे करीबी रहे मुकुल रॉय के भाजपा में आने के बाद पार्टी का एक धड़ा महसूस करता है कि ज़मीनी स्तर पर संगठन को खड़ा करने में उसे मदद मिलेगी. मुकुल रॉय वही शख़्स हैं जिन्होंने टीएमसी के संगठन को खड़ा किया है लेकिन वहां ममता बनर्जी की एक छवि थी जिसने संगठन को मज़बूत करने में मदद दी. हालांकि, पाला बदलने के बाद मुकुल रॉय नोआपाड़ा विधानसभा चुनाव में अपनी पसंद का उम्मीदवार तक नहीं उतार पाए जबकि नोआपाड़ा मुकुल रॉय का क्षेत्र है. कामयाबी तो दूर की बात है दरअसल अपने ही क्षेत्र में उन्हें अपने पुराने साथियों का साथ नहीं मिला जिसका कयास था.
कांग्रेस-वाम दलों की बढ़ी टेंशन
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को हर जगह हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पश्चिम बंगाल में यह पार्टी बाजीगर साबित हुई है. दरअसल, पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने उन सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया है जो तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों को गढ़ माना जाता है. यानी इस राज्य के उपचुनावों में बीजेपी के लिए हार भी किसी जीत से कम नहीं है. उलुबेड़िया लोकसभा सीट और नोयापाड़ा विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भले ही जीत दर्ज की है, लेकिन यहां से बीजेपी के प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे हैं. जिस पश्चिम बंगाल में बीजेपी की उपस्थिति नहीं के बराबर है, वहां उनके उम्मीदवारों का दूसरे नंबर पर आना किसी जीत से कम नहीं है.
नोयापाड़ा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी सुनील सिंह ने 1,11,729 वोटों के साथ चुनाव जीते हैं. वहीं इस सीट पर बीजेपी के संदीप बनर्जी दूसरे नंबर पर आए हैं. 10 साल पहले तक वाम का गढ़ कहे जाने वाले इस सीट पर सीपीएम की गार्गी चटर्जी तीसरे और कांग्रेस के गौतम बोस चौथे नंबर पर रहे.
उलुबेड़िया लोकसभा सीट से तृणमूल की प्रत्याशी सजदा अहमद ने जीत दर्ज की है. यह सीट सजदा अहमद के आकस्मिक निधन के बाद के बाद खाली हुई थी, तृणमूल ने उनकी पत्नी सजदा को उम्मीदवार बनाया था. चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि बीजेपी के अनुपम मलिक भी यहां दूसरे नंबर पर रहे. इस सीट पर भी सीपीएम तीसरे और कांग्रेस चौथे नंबर पर रही. सजदा अहमद ने 4 लाख 70 हजार वोटों से जीत दर्ज की है.
राजस्थान उपचुनाव में BJP साफ, कांग्रेस की बल्ले बल्ले
राजस्थान उपचुनावों में बीजेपी ने बेहद खराब प्रदर्शन किया है. राज्य और केंद्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद इस पार्टी ने यहां की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीटें गंवा दी है. कांग्रेस के उम्मीदवार विवेक धाकड़ ने बीजेपी के शक्ति सिंह हाडा को 12,976 वोटों से हराकर मंडलगढ़ विधानसभा सीट जीती.
राजस्थान उपचुनावों में बीजेपी ने बेहद खराब प्रदर्शन किया है. राज्य और केंद्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद इस पार्टी ने यहां की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीटें गंवा दी है. कांग्रेस के उम्मीदवार विवेक धाकड़ ने बीजेपी के शक्ति सिंह हाडा को 12,976 वोटों से हराकर मंडलगढ़ विधानसभा सीट जीती.
अलवर लोकसभा उप चुनाव में कांग्रेस के करन सिंह यादव ने बीजेपी के जसवंत सिंह यादव को 1,96,496 मतों के भारी अंतर से हराया. अजमेर लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के रघु शर्मा ने भाजपा के रामस्वरूप लांबा को 84,414 वोटों से हराया. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस राजस्थान में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. अजमेर में रघु शर्मा को 6,11,514 वोट जबकि लांबा को 5,27,100 वोट मिले. अलवर में करन सिंह यादव को 6,42,416 वोट और भाजपा के जसवंत सिंह को 4,45,920 वोट मिले.
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