आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
पूर्वोत्तर के नागालैंड, त्रिपुरा और मेघालय के विधानसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान हो चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त ए के ज्योति ने कहा कि त्रिपुरा, मेघायल और नगालैंड में होने वालेे विधानसभा चुनावों में ईवीएम मशीन का इस्तेमाल होगा। उन्होंने कहा कि 18 फरवरी को त्रिपुरा और 27 फरवरी मेघालय और नगालैंड में होगा मतदान।
तीनों राज्यों में 60-60 सीटोें पर होने हैं चुनाव
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| नागालैंड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी |
स्थानीय पार्टियों व कांग्रेस शासित राज्यों के साथ-साथ भाजपा के सामने कम्युनिस्ट पार्टी वाले शासित राज्य भी प्रमुख चुनौती हैं। त्रिपुरा में सीपीआई(एम)सरकार है, जहां कई कम्युनिस्ट नेता हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं। कर्नाटक और मेघालय में जात-पात के कार्ड से भाजपा तौबा ही करेगी और विकास मॉडल कार्ड को ही प्रमुख रूप से चुनावों में भुनाने की कोशिश करेगी।
चुनाव आयोग के इस एेलान के साथ ही चुनाव आचार संहिता लागू हो गई हैं. तीन राज्यों सहित केंद्र सरकार पर आचार संहिता लागू हो गई है।
20 लाख रुपये से अधिक खर्च नहीं कर पायेंगे उम्मीदवार
चुनाव आयोग की ओर से विधानसभा चुनावों की घोषणा करते हुये कहा है कि इन चुनावों में भी वीवीपीएटी का इस्तेमाल किया जाएगा। ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों पर केंद्रीय चुनाव आयोग ने आंकड़ा पेश किया है। आयोग की ओर से कहा गया है कि गोवा, हिमाचल और गुजरात के चुनावों के बाद ईवीएम और वीवीपैट के नतीजों, वोटर स्लिप का मिलान हुआ, कही कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई, यानी 100 फीसदी मिलान हुआ है। खास बात यह है कि छोटा प्रदेश होने के कारण चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के लिये चुनावी खर्च की राशि 20 लाख रुपये तय की है।
जानें क्या है मेघालय का समीकरण
मेघालय में विधानसभा की 60 सीटे हैं. वर्तमान में यहां पिछले दो बार से कांग्रेस की सरकार है। राज्य में मुख्य लड़ाई कांग्रेस, बीजेपी और एनसीपी के बीच है। मालूम हो कि साल 2013 के चुनावों में यहां बीजेपी का खाता तक नहीं खुला था। उस चुनाव में 13 निर्देल उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।
तो त्रिपुरा में क्या होगा
त्रिपुरा विधानसभा में 60 सीटें है। यहां भी लेफ्ट की सरकार है। साल 1998 से राज्य में माणिक सरकार मुख्यमंत्री है। वह अपना वेतन पार्टी को भी देते है।
नागालैंड में मिला था् 38 सीट
नागालैंड में विधानसभा की 60 सीटें है। यहां साल 2003 से नागालैंड पीपुल्स फ्रंट की सरकार है। एनपीएफ, एनडीए की सहयोगी पार्टी है। यहां एनपीएफ-बीजेपी की लड़ाई कांग्रेस से है। टीआर जेलियांग राज्य के मुख्यमंत्री है। पिछले विधानसभा चुनावों में एनपीएफ को 60 में से 38 सीटें मिली थी।
त्रिपुरा का सियासी समीकरण
त्रिपुरा लेफ्ट का मजबूत किला माना जाता है। पिछले पांच विधानसभा चुनावों से यहां लेफ्ट का कब्जा है। इस बार राज्य का सियासी मिजाज गड़बड़ाया हुआ है। लेफ्ट के इस दुर्ग में बीजेपी सेंधमारी की लिए बेताब है। हालांकि ये उसके लिए आसान नहीं है। 1978 के बाद से वाम मोर्चा सिर्फ एक बार 1988-93 के दौरान राज्य की सत्ता से दूर रहा है।
बाकी सभी विधानसभा चुनाव में लेफ्ट का कब्जा रहा है। 1998 से लगातार त्रिपुरा में 3 बार से सीपीएम के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ही है। उनकी ईमानदारी और सादगी लेफ्ट की जीत का आधार रखती आई है। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गोवा मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर अपनी सादगी को दर्शाते हैं, इनसे दस कदम आगे माणिक सरकार है।
त्रिपुरा के 2013 विधानसभा चुनाव में राज्य की कुल 60 सीटों में से वाम मोर्चा ने 50 सीटें जीती थीं, जिनमें से सीपीएम को 49 और सीपीआई को 1 सीट। जबकि कांग्रेस को 10 सीटों के साथ संतोष करना पड़ा था, लेकिन तीन साल के बाद 2016 में कांग्रेस के 6 विधायकों ने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ज्वाइन कर ली। ये छह विधायक टीएमसी में भी रह नहीं सके और अगस्त 2017 में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन कर ली।
50 विधानसभा सीटों वाली माकपा का गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में भाजपा ने अपनी राजनीतिक तौर पर जमीन तैयार कर ली है. महज 7 महीने पहले हुई विधानसभा चुनावों में भाजपा ने एक भी सीट नहीं जीती था. वहीं आज भाजपा एक नए फेर बदल के बाद मुख्य विपक्ष के रूप में उभरेगी.
50 विधानसभा सीटों वाली माकपा का गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में भाजपा ने अपनी राजनीतिक तौर पर जमीन तैयार कर ली है. महज 7 महीने पहले हुई विधानसभा चुनावों में भाजपा ने एक भी सीट नहीं जीती था. वहीं आज भाजपा एक नए फेर बदल के बाद मुख्य विपक्ष के रूप में उभरेगी.
मेघालय का चुनावी गणित
मेघालय की सत्ता पर आसीन कांग्रेस के लिए अपनी सत्ता बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। बीजेपी से लेकर नेशनल पीपुल्स पार्टी सहित अन्य क्षेत्रीय दल पूरी तरह से कमर कसकर चुनावी मुकाबले में उतर चुके हैं।
सूबे में कांग्रेस संकट में है, उनके कई विधायकों ने पिछले दिनों पार्टी को अलविदा कहा है। कांग्रेस इसकी भरपाई करने में लगी हुई है। कई दूसरी पार्टियों के नेता कांग्रेस में शामिल किए जा रहे है।
देश में बाकी जगहों पर लगातार हार के बाद कांग्रेस के लिए मेघालय की चुनावी जंग जीतना बहुत अहम है।ऐसे में कांग्रेस मेघालय को लेकर किसी तरह की खतरा नहीं लेना चाहती। वोटों के बिखराव को रोकने के लिए, सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि कांग्रेस भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए अन्य दलों से गठबंधन कर सकती है।
मेघालय में दशकों से कांग्रेस की सियासी मौजूदगी उसे यहां मजबूत बनाए हुए है, लेकिन पिछले दिनों कुछ विधायकों ने पार्टी को अलविदा कहा तो एनसीपी सहित कुछ अन्य पार्टी के विधायकों ने पार्टी का दामन भी थामा है।
राज्य की बाजी जीतना बीजेपी के लिए काफी कठिन है। दरअसल राज्य में 60 फीसदी आबादी ईसाई समुदाय की है। बीजेपी की हिन्दुत्व छवि और बीफ पाबंदी उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा है।
मेघालय में कुल 60 विधानसभा सीटें है। 2013 के विधानसभा चुनाव में इनमें से कांग्रेस ने 29 पर जीत दर्ज की थी, तो वहीं यूडीपी ने 8, निर्दलीय ने 13, एनसीपी ने 2 और अन्य ने 8 सीटें जीती थी।
नगालैंड का सियासी मिजाज
नगालैंड की सत्ता पर नगा पीपुल फ्रंट और बीजेपी गठबंधन की साझा सरकार है। राज्य की सत्ता से कांग्रेस को 2003 में बेदखल करके नगा पीपुल फ्रंट ने यहां कब्जा किया था, उसके बाद से लगातार सत्ता में बनी हुई है। बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सीटों को बढ़ाने की है।
इसके अलावा अपनी सहयोगी पार्टी एनपीपी के साथ सत्ता में बहुमत के साथ वापसी करना भी एक चैलेंज है।जबकि कांग्रेस 14 साल बाद सत्ता में वापसी के लिए हाथ पांव मार रही है।
यहाँ भी कुल 60 विधानसभा सीटें है। पिछले 2013 के विधानसभा चुनाव में नगा पीपुल फ्रंट ने 45 सीटें जीती थीं। इसके अलावा 4 बीजेपी और 11 सीटें अन्य के खाते में है। यहाँ भाजपा को नगा पीपुल फ्रंट से सीटों के बंटवारे में अड़चन आ सकती है। क्या पीपुल फ्रंट अपने 45 विधायकों को दोबारा टिकट देगी या भाजपा के लिए कुछ की क़ुरबानी? यदि फ्रंट ऐसा करती है तो पार्टी में फूट पड़ने की सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता।
जानें इस साल कहां कहां होने हैं चुनाव
साल 2018 में कर्नाटक, राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने है। इसके अलावा मिजोरम में भी चुनाव होने हैं। आठ राज्यों में से चार यानी राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और नागालैंड में अभी एनडीए की सरकार है। जबकि कांग्रेस के पास सिर्फ तीन राज्य कर्नाटक, मिजोरम और मेघालय है। देश में अभी सिर्फ पांच राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। वहीं पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए 19 राज्यों में सत्ता कायम कर चुकी है।

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