आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
कासगंज में एक नहीं बल्कि 2 हिन्दू युवकों को मौत के घाट उतारा गया, चन्दन गुप्ता की मृत्यु 26 जनवरी को ही हो गयी थी, राहुल उपाध्याय जो की चन्दन गुप्ता के साथ ही तिरंगा यात्रा में शामिल था, उस पर भी जिहादी भीड़ ने हमला किया था और अब राहुल उपाध्याय की भी मृत्यु हो गयी।
राहुल उपाध्याय भी जिंदगी की जंग हार गयेअलीगढ़ के हॉस्पिटल में दम तोड़ा |
अगर कासगंज में कोई अखलाक मरा होता तो राहुल गांधी और गुलाब नबी आजाद जैसे नेता उसके घर पहुंच गए होते और अल्पसंख्यक ख़तरे में है का नारे लगा रहे होते
गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य मे वहां ABVP की तिरंगा यात्रा निकल रही थी। यात्रा जिस रोड से निकल रही थी उस रोड के एक तरफ पाकिस्तान यानि मुस्लिम बहुल क्षेत्र तथा दूसरी तरफ हिन्दूस्तान है। उस यात्रा पर अचानक पाकिस्तानी क्षेत्र से भारी पत्थरबाजी व उसी क्षेत्र मे स्थित R D होटल से गोलियों की बौछार की गयी। जिसमे दो हिन्दू मौके पर ही बलिदान हो गये तीसरे का गम्भीर हालत मे इलाज चल रहा है।और अब देश के सेकुलरों और वामपंथियों ने कासगंज हिंसा को जायज ठहराने का काम शुरू कर दिया है, देश के बुद्धिजीवी चन्दन गुप्ता और राहुल उपाध्याय की हत्या को जायज ठहराने लगे है और ये बता रहे है कि हिन्दू मुस्लिम इलाके में साम्प्रदायिक नारे लगा रहे थे, भारत माता की जय, वन्दे मातरम अब साम्प्रदायिक नारे हो गए है।
दैनिक भारत लिखता है कि ABP न्यूज़ का एक खबरिया दलाल है पंकज झा, जिसे आपने ABP न्यूज़ पर देखा ही होगा, जिसकी तस्वीर भी ऊपर लगी हुई है, पंकज झा भी चन्दन गुप्ता और राहुल उपाध्याय की निर्मम हत्या को जायज ठहरा रहा है, देखिये किस प्रकार ये दोनों की हत्या को जायज ठहराते हुए जिहादियों का बचाव कर रहा है
Pankaj Jha@pankajjha_
अरे गौरव जी, आप वही ‘सज्जन’ हैं जो कल बता रहे थे कि बच्चों पर हमला करने वालों में मुस्लिम थे। आपको पता है कि कासगंज के डीएम ने बताया है कि तिरंगा यात्रा बिना परमिशन के निकाली गई थी https://twitter.com/gauravs75831462/status/957135098209435649 …
11:53 AM - Jan 27, 2018
पंकज झा बता रहा है की तिरंगा यात्रा बिना अनुमति के निकाली गयी थी, पंकज झा साफ़ कर रहा है की बिना अनुमति के तुम तिरंगा यात्रा निकलोगे, बिना इज़ाज़त के तुम भारत माता की जय का नारा लगाओगे, बिना इज़ाज़त के तुम वन्दे मातरम बोलोगे तो तुम पर हमला तो होगा ही
पूरा सेक्युलर जमात भारत माता की जय बोलने वाले युवकों को सांप्रदायिक करार देकर किस प्रकार हत्या करने वाले जिहादियों का बचाव कर रहा है, मतलब इस देश में अब भारत माता की जय बोलने के लिए, तिरंगा हाथ में लेकर चलने के लिए इज़ाज़त लेनी पड़ेगी, पूरा मीडिया हत्यारों को बचाने में लग गया है और चन्दन गुप्ता, राहुल उपाध्याय जैसे देशभक्तो को साम्प्रदायिक करार देकर उनकी हत्या को भी जायज ठहराया जा रहा है।
भारतीय मीडिया खबर चला रही है की, कासगंज में 2 समुदाय आपस में भिड़े, भैया गुरुग्राम में पत्थर चल गया तो वो हिन्दू गुंडे हो गए, यहाँ तिरंगा यात्रा पर गोली चलाने वालो, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वालो का धर्म नहीं बता पा रही है मीडिया ! मरने वाला युवक चन्दन गुप्ता हाथ में तिरंगा लेकर वन्दे मातरम कहते हुए अपने देश के लिए यात्रा निकाल रहा था उसे पाकिस्तान जिंदाबाद कहने वालो ने गोली मार दी, और मीडिया उनका धर्म नहीं बता पा रही, पर गुरुग्राम वाले हिन्दू गुंडे थे।
सिर्फ कासगंज में ही नहीं बल्कि कल मध्य प्रदेश के भी एक इलाके में पाकिस्तान का झंडा लहराया गया और अल्लाह हु अकबर के नारे भी लगाए गए, पर इन देशद्रोहियों का भी मजहब मीडिया नहीं बता पायी, पर गुरुग्राम वाले तो हिन्दू गुंडे ही थे !
सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहे उत्तर प्रदेश के कासंगज में तीसरे दिन भी बवाल हुआ। हालांकि जल्द ही स्थिति पर नियंत्रण पा लिया गया। कासगंज में उपद्रवियों पर नजर रखने के लिए ड्रोन की मदद ली जा रही है और संदिग्ध उपद्रवियों के खिलाफ तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। इस बीच हिंसा की भेंट चढ़े चंदन गुप्ता के परिवार वालों ने सीएम योगी के खिलाफ प्रदर्शन किया और चंदन को शहीद घोषित किए जाने की मांग की। उत्तर प्रदेश के डीजीपी ने वहीं कहा है कि कासगंज के हालात नियंत्रण में है। छिटपुट आगजनी की खबरें हो रही हैं वो सुनसान जगहों पर हुई है ऐसी जगहों पर हुई जो सालों से सुनसान पड़ी थीं. ड्रोन से इलाके की निगरानी की जा रही है.
मुख्य अभियुक्त के घर से पिस्तौल बरामद
उत्तर प्रदेश से प्राप्त समाचार के अनुसार आज(जनवरी 28) को तलाशी के दौरान मुख्य आरोपी के घर से पिस्तौल बरामद की है। घरों में जमा पत्थरों से स्पष्ट है कि मुस्लिम उपद्रवी पहले ही से पूरी तैयारी किये बैठे थे। अब पकडे गए लोगों से इस बात की जानकारी लेनी चाहिए कि उनके पीछे किस-किस राजनीतिक दल का संरक्षण है। क्योकि बिना राजनैतिक संरक्षण के कोई ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता?
जब मुलायम सिंह ने पुलिस अधिकारी की पीठ थपथपाई
मुज़फ्फरनगर भी राजनीतिक संरक्षण मिलने पर ही हुआ था। तब हिन्दू के उग्र होते ही, तत्कालीन मुख्यमंत्री को अपने वोट-बैंक को बचाने के लिए आर्मी की मदद लेनी पड़ी थी, और राज्य की पुलिस भी जानती है कि आर्मी को तलाशी अभियान में कितना असला बरामद हुआ था। जिससे घबराकर तत्कालीन मुख्यमंत्री को आर्मी कार्यवाही रुकवानी पड़ी थी। जिसका उल्लेख उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते एक लेख में किया था। मुस्लिम अभियुक्तों के जब एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी के छोड़े जाने पर, जब हिन्दू पुलिस कर्मियों द्वारा विरोध करने पर, उस मुस्लिम पुलिस अधिकारी ने कहा था, "पहले मैं मुसलमान हूँ, बाद में पुलिस अधिकारी।" और तत्कालीन समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायमसिंह ने उस पुलिस अधिकारी की पीठ थपथपाई थी।
काश! किसी हिन्दू पुलिस कर्मी अथवा अधिकारी ने इस तरह का वक्तत्व बोला होता, समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्ष एकजुट में उस पुलिस अधिकारी पर साम्प्रदायिकता का केस चला देते और मीडिया भी अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए खूब शोर मचा रही होती। लेकिन सब खामोश थे।
पाकिस्तान की माँग करने वाले मुसलमान खुले रूप से मुस्लिम लीग के बैनर तले थे और मुस्लिम लीग को ब्रिटिश सरकार का संरक्षण था।
60 से अधिक उपद्रवी गिरफ्तार
उन्होंने बताया कि 60 से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और सभी संदिग्ध लोगों को पकड़ा गया है। दोनों समुदाय के लोगों को एक साथ बिठाकर शांति की अपील की जाएगी. कहां चूक हुई कौन जिम्मेदार है इसकी विवेचना बाद में होगी। फिलहाल हमारा पूरा ध्यान स्थिति को काबू करने में लगा है जो कि लगभग हो चुका है।
हिंसा के पीछे राजनीतिक साजिश
कासगंज हिंसा पर एसपी सुनील सिंह ने हिंसा की वारदातों के पीछे राजनीतिक साजिश की आशंका जाहिर की है। उन्होंने कहा कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की इसके पीछे राजनीतिक साज़िश हो सकती है।
तिरंगा यात्रा निकाल रहे लोगों ने की थी भड़काऊ नारेबाजी
एसपी सुनील सिंह ने साथ ही गणतंत्र दिवस पर तिरंगा यात्रा के दौरान हिंसा भड़काने वाले तत्वों के बारे में भी अहम खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि तिरंगा यात्रा निकाल रहे लोगों ने एक खास जगह पहुंचकर कुछ भड़काऊ नारेबाजी की, जिसके चलते झगड़ा शुरू हुआ और हिंसा भड़क उठी. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि गणतंत्र दिवस के दिन हिंसा त्वरित कारणों से भड़की, लेकिन उसके बाद फैलाई जा रही हिंसा के पीछे कोई राजनीतिक साजिश है।
जनसत्ता अपने ऑनलाइन सस्करण,जनवरी 28, में लिखता है कि द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और इस घटना के चश्मदीदों ने बताया कि अनाधिकृत मोटरसाइकिल पर निकली तिरंगा यात्रा कासगंज के बद्दू नगर पहुंची, जिसने बाद में साम्प्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया था। एक स्थानीय निवासी के मुताबिक, मोटरसाइकिल पर रैली कर रहे लोगों ने कुर्सी हटाने के लिए कहा ताकि वे वहां से निकल सके।
वकील और स्थानीय निवासी मोहम्मज मुनाज़ीर रफी ने कहा “वे नारे लगा रहे थे। हमने उनसे आग्रह किया कि पहले हमारा गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम खत्म होने दें लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे और वहां से नहीं हटे।” रफी ने कहा “मैंने गणतंत्र दिवस मनाने के लिए 200 रुपए का अपनी तरफ से योगदान दिया था। मैं सुबह घर से कासगंज कोर्ट के लिए निकल गया था जहां पर तिरंगा फहराने का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जब मैं वापस आया तो हमारे स्थानीय इलाके में लोग गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम के लिए कुर्सी लगा रहे थे। इसी दौरान अचानक 50-60 लोगों का एक ग्रुप बाइक पर वहां पहुंचा और कुर्सी हटाने के लिए कहने लगा।”
रफी ने कहा “हमने उनसे कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। वहां कई लोग इकट्ठे हो गए और धक्का-मुक्की भी हुई। इसके बाद वे लोग अपनी बाइक लेकर वहां से निकल गए। मैंने कासगंज पुलिस को फोन किया और उन्हें घटना की जानकारी दी। इसी प्रकार की एक रैली पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित की गई थी लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ था। हम देशभक्त हैं लेकिन अभी हमें देशद्रोहियों की तरह प्रदर्शित किया जा रहा है।
गनीमत है, अभी तक किसी ने यह नहीं कहा कि पत्थरबाज़ी और गोली चलाने वाले बाहरी थे। क्योकि ऐसे मामलों में इस तरह के रटे-रटाये सम्वाद सुनने को मिलते है। लेकिन देखिए रफी किस तरह अपने भाइयों का बचाव कर रहे हैं, जबकि पेशे से वकील होने के बावजूद आरोप भी स्वयं सिद्ध कर रहे हैं। पता नहीं अपने मुवक्किल का कोर्ट में कैसे बचाव करते होंगे? उपद्रवी शायद भूल रहे कि "अब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव नहीं, योगी आदित्यनाथ मुख्यमंन्त्री है।" और एक योगी साम, दाम, दण्ड, भेद सभी खेलों में निपुर्ण होता है। सच्चाई को जानकर और दोषी को उसके उचित स्थान पर पहुंचा कर ही कोई योगी चैन की साँस लेता है।
स्वतंत्र पत्रकारिता करते, दिल्ली में हो रहे आए-दिन के दंगों(रामजन्मभूमि मुद्दे) पर स्थानीय मुस्लिम नेता का पत्रकारिता जीवन का प्रथम राजनीतिक साक्षात्कार लेते कुछ अहम् मुद्दों पर चर्चा की। जिनका आज भी अपने लेखों में चर्चा करता रहता हूँ। जिसे लोग फिरकापरस्ती या साम्प्रदायिक लेख कहते हैं। खैर, उन सम्मानित नेता से दंगों पर प्रश्न करने पर, उत्तर मिला: "ये बाहरी लोग इलाके का चैन हराम कर जाते हैं।" तब उनसे पूछा: " उन्हें संरक्षण कौन देता है, और फिर किसके घर में छुप जाते हैं? ... बाहर वाले को क्या मालूम कि ये बंद दुकान हिन्दू की है या मुसलमान की?" जिनका उनके पास कोई जवाब नहीं था। इतना ही दो/एक इतिहास से सम्बन्धित प्रश्न पूछने पर कुछ गर्मागर्मी भी हुई। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी खुलकर लगे, लेकिन आधा घंटे की गर्मागर्मी के बाद ऐतिहासिक सच्चाई को स्वीकार किया। उदाहरणार्थ: दिल्ली की जामा मस्जिद और फतेहपुरी मस्जिदों को नीलामी में उस समय के चर्चित हिन्दू सेठों-- छुन्ना मल और सत्यनारायण गुड़ वाले-- द्वारा खरीदना, आदि।
कासगंज एडिशनल एसपी पवित्र मोहन त्रिपाठी के अनुसार, पुलिस ने दोनों पक्षों को अलग कराया था। उन्होंने कहा बाइक सवार लोग फिर से एक जगह इकट्ठा हुए और तेहसील रोड के चक्कर लगाने लगे। वहां एक अन्य मुस्लिम बहुल इलाके के लोगों ने सोचा कि वे लोग प्रतिशोध की भावना से वहां चक्कर लगा रहे हैं। यहीं से हिंसा की शुरुआत हुई, जिसमें गोली लगने के कारण 28 साल के एक युवक की जान चली गई।” इस मामले पर बात करते हुए आईजीपी ध्रुव कांत ठाकुर ने कहा ” जिस समय यह घटना हुई उस वक्त मुस्लिम समुदाय के लोग तिरंगा फहराने ही वाले थे।” बता दें कि इस घटना का एक वीडियो भी सामने आया है जहां पर करीब 60 लोगों का एक ग्रुप हाथ में तिरंगा और भगवा रंग का झंडा लिए चिल्ला रहे थे कि “बाइक तो यहीं से जाएगी।”
अपने इसी संस्करण में जनसत्ता प्रकाशित करता है कि "इस हिंसा की कड़ी आलोचना की जा रही है। दो दिन हो गए हैं लेकिन अभीतक हिंसा जारी है। आज यानि रविवार सुबह-सुबह प्रदर्शनकारियों ने दुकानों को आग लगा दी। इस हिंसा को लेकर आजतक की एंकर श्वेता सिंह ने गहरा दुख जताया है। श्वेता सिंह ने लिखा “जिस गली से गुजरते हुए ‘भारत माता की जय’ साम्प्रदायिक हो जाता है। जिस मोहल्ले में तिरंगा अवैध माना जाता है। जहां एक नौजवान को इसलिए गोली मारी जाती है कि वो गणतंत्र दिवस मना रहा था। वो जगह हिंदुस्तान का हिस्सा कैसे हो सकता है।” श्वेता के इस ट्वीट पर कई लोग अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
एक ने लिखा “मरने वाला भी हिंदुस्तानी था और मारने वाला भी। दोनों में केवल अंतर इतना था कि एक हिंदुस्तान के समर्थन में नारे लगा रहा था तो दूसरा पाक के समर्थन में।” एक ने लिखा “देखना बाकी है कि कासगंज में चंदन की शाहदत का बढ़ाकर मोल लगाएगी सरकार और मुआवता देकर पटाक्षेप करेगी या ऐसी कार्यवाही करेगी जो नजीर बने।” एक ने लिखा “देश में आत्महत्या करने की कोई जरूरत नहीं है, तिरंगा फहराओ मौत खुद-ब-खुद गले लगा लेगी।” एक ने लिखा “जो देश का कानून ना माने, संविधान ना माने, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए, तिरंगा को हाथ में लिए एक लड़के को मार डाले, उसके बाद कोर्ट में भी कोई उसका बचाव करे तो मान लीजिए देश बचा नहीं बिक चुका है।” इसी तरह कई लोगों ने बहुत ही भावुक होकर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं।
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