आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक के लिए पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री का चेहरा काफी पहले घोषित कर चुकी है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हार जाने के बाद बीएस येद्दियुरप्पा बेहद चिंतित व परेशान हाल है। गौरतलब है कि भाजपा प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुनावी मैदान में उतरी थी। प्रेम कुमार धूमल को मिली करारी हार के बाद जयराम ठाकुर को मुख्य मंत्री बनाया गाय और बीएस येद्दियुरप्पा नहीं चाहते कि कर्नाटक में भी इस तरह की कोई घटना घटे। पारिवारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीएस येद्दियुरप्पा ने अपनी आशंका से भाजपा शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा दिया है। भाजपा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पार्टी बगैर मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किये ही कर्नाटक विधानसभा चुनाव में उतरेगी। लिंगायत समुदाय से आने वाले 75 वर्षीय बीएस येद्दियुरप्पा बगैर चुनाव लड़े, पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार करेंगे। भाजपा यदि सत्ता में आती है तो बीएस येद्दियुरप्पा ही मुख्यमंत्री बनेंगे और 6 महीने में कर्नाटक विधान परिषद के सदस्य बनेंगे। ऐसे में उनके द्वारा खाली की जाने वाली शिमोगा लोकसभा सीट पर उप चुनाव की नौबत भी नही आएगी।
भाजपा की नजर कर्नाटक पर
2018 में कर्नाटक विधानसभा का चुनाव होना है। कर्नाटक में देश के चुनावी नक्शे से गायब होती कांग्रेस का कब्जा है। यही वजह है कि अमित शाह का यहां खास फोकस भी है। भाजपा की चुनावी तैयारियों का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उसने बीएस येद्दियुरप्पा के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का ऐलान काफी पहले कर दिया है। दूसरी तरफ, पीएम मोदी की विकास योजनाओं का झुकाव भी कर्नाटक में दिखाई दे रहा है।यहां तक कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव जीतने के दिन पीएम मोदी सीधे रात को चक्रवात ओखी से प्रभावित इलाकों का दौरा करने कर्नाटक पहुंच गए थे। इससे पहले अक्टूबर में कर्नाटक के बीदर में पीएम ने बीदर-कलाबुर्गी के बीच नई रेलवे लाइन का उद्घाटन किया था। कर्नाटक दक्षिण भारत का इकलौता ऐसा राज्य है, जहां भाजपा की सबसे मजबूत पकड़ है। 2007 में पहली बार यहां पार्टी को सत्ता के शिखर तक पहुंचने का मौका मिला। इसके बाद 2008-2013 तक भाजपा ने पांच साल सरकार चलाई। हालांकि उसे बीएस येद्दियुरप्पा और सदानंद गौड़ा के रूप में दो मुख्यमंत्री बदलने पड़े। इसके बाद 2013 में कांग्रेस ने कमबैक किया और के. सिद्धारमैया के नेतृत्व में सरकार बनाई।
कर्नाटक का चुनावी अंक गणित
कर्नाटक विधानसभा में कुल 224 सीटें है। इनमें फिलहाल कांग्रेस के पास 122 हैं और 40-40 भाजपा और जनता दल (सेकुलर) के पास है। बाकी 22 सीटें अन्य के खाते में हैं. वोट प्रतिशत की बात की जाए तो उसमें भी कांग्रेस, भाजपा से काफी आगे है। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 41%, भाजपा को 20%, जद (एस) को 20% और अन्य को 23% वोट मिला था। 2013 के विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा वोट शेयर और सीट के मामले में कांग्रेस से काफी पिछड़ गई हो, लेकिन 2014 का लोकसभा चुनाव उसके लिए बंपर बोनस की तरह आया। पार्टी ने सूबे की कुल 28 लोकसभा सीटों में से 17 पर जीत दर्ज की और मोदी लहर में उसका वोट प्रतिशत 43 पहुंच गया। हालांकि, वोट प्रतिशत के मामले में कांग्रेस उससे ज्यादा पीछे नहीं रही और उसे 41% मत मिले, लेकिन सिर्फ 9 लोकसभा सीटें ही जीत पायी।
चिन्ता का विषय यह है कि सत्तारुड दल का मत प्रतिशत एकदम नीचे आ जाए, सिद्ध करता है, कि कि सत्ता में रहते, नेता अपने कार्यकर्ताओं से किस सीमा तक दूरी बना लेते हैं। जो मात्र 20% प्राप्त वोट दर्शाता है। क्या इतने वर्षों में वोटों में आयी गिरावट का कारण जानने का प्रयास किया, शायद नहीं। चुनाव पास आते देख नींद से जाग जनता और कार्यकर्ताओं की याद आनी शुरू हो गयी। भाजपा के इतने संघर्ष करने का यही मुख्य कारण है। दिल्ली की भाँति अन्य राज्य भी केवल मोदी-अमित जोड़ी के संग मिले योगी के ही कन्धों पर सवार हो रहे हैं, अपने स्तर पर कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने का लेशमात्र भी प्रयास नहीं हो रहा। वर्षों से पार्टी से जुड़ा हमारा कार्यकर्ता क्यों हमसे दूरी बना रहा है, उसे मिलाए रखने की चिंता नहीं और जब वही चुनाव में दूर रहेगा, उसकी दूरी चुनाव को प्रभावित करेगी।
हिमाचल में मनोनीत मुख्यमंत्री धूमल का हारना पार्टी के लिए बहुत ही शर्म की बात है। हिमाचल में गनीमत है पार्टी तो सत्ता में आ गयी। दिल्ली में क्या हुआ था? जिसे मुख्यमंत्री घोषित किया, उसने समस्त दिल्ली को प्रभावित कर दिया और पार्टी को शर्मनाक हार का सामना पड़ा। जिसे पार्टी के समर्थक से लेकर दिल्ली का उच्च पदाधिकारी तक अच्छी तरह जानता था। जितने मतों से उस मनोनीत मुख्यमंत्री के हारने की आकांशा थी, लगभग उतने ही हज़ार मतों से हार हुई। वकीलों ने हराने के लिए एकता कर ली थी। लेकिन खुलकर पार्टी के कमर्ठ वकील भी खुलकर आलाकमान के सम्मुख अपनी बात रखने में पूर्णरूप से असमर्थ थे। और भाजपा ने थाली में सजाकर दिल्ली की सत्ता आम आदमी पार्टी के हाथ सौंप दी।
सत्ता के नशे में चूर और "हर हर मोदी, घर-घर मोदी" के नारे से स्थानीय नेता अपनी कारगुजारी को छुपाने में सफल होने का नाटक करते रहते हैं। मोबाइल पर मिसकॉल कर सदस्य बनाने से क्या मिला?
योगी आदित्यनाथ के यूपी के बाहर बढ़ते कदम को रोका राजनाथ सिंह ने, लेकिन कैसे
गुजरात मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही अपने प्रदेश से बाहर अपना प्रभुत्व सिद्ध करने में सक्षम है, जबकि इतने वर्षों से अपने प्रदेशों से बाहर डॉ रमन सिंह, वसुन्धरा राजे सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान देश के अन्य भागों में अपना असर सिद्ध करने में असफल ही रहे हैं। राजनाथ सिंह स्वयं अपने कन्धे पार्टी का वर्चस्व बनाये नहीं रख सकते। यदि इतने प्रभावी होते, गांव-गांव तक भाजपा को पहुंचा चुके होते। पार्टी केवल शहरों तक ही अपना वर्चस्व बनाये रखी।
2014 चुनावों में विंध्याचल के कुछ गाँवों में भाजपा का झण्डा देखने उपरान्त लोगों से बातचीत करने पर ज्ञात हुआ कि भाजपा नहीं मोदी को जानते हैं। यहाँ तो अब से पहले भाजपा को कोई नहीं जानता था। और उस गति को बनाए रखने में योगी आदित्यनाथ पूर्ण रूप से सक्षम है। यदि गृह मंत्री राजनाथ सिंह धरातल पर आकर, जनमानस का दिल टटोलेंगे तब उनको ज्ञात होगा कि योगी-मोदी-अमित त्रिमूर्ति चर्चित हो रही है। उत्तर प्रदेश में मिले प्रचण्ड बहुमत में मोदी-अमित के बाद योगी के योगदान को नज़रअंदाज़ करना मूर्खता होगी।
अडवाणी, राजनाथ, अटल बिहारी आदि के नेतृत्व में केवल राममन्दिर के नाम पर भाजपा संसद में दूसरे स्थान पर ही रही, लेकिन मोदी-अमित के नेतृत्व में बिना राममन्दिर मुद्दे के पूर्ण बहुमत से भाजपा केन्द्र में सत्ता बनाने में सफल हुई। हालाँकि भाजपा के हर घोषणा-पत्र में राममन्दिर, धारा 370, समान नागरिक अधिकार मुद्दे होते थे, परन्तु अटल बिहारी के नेतृत्व में अन्य दलों से समझौता कर सरकार बनाने के चक्कर में इन मुद्दों को दरकिनार करने से पार्टी की छवि बहुत आहत हुई थी, इस सच्चाई को कोई झुठला नहीं सकता। मोदी और अमित के नेतृत्व में भाजपा इस धूमिल हुई छवि से बाहर आने के साथ-साथ योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से समस्त देश में राममंदिर बनने की सम्भावनाएं जागृत हुई हैं। मोदी-अमित-योगी इस शुभ काम को क्रियाविन्त करने में व्यस्त हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बाद यदि बीजेपी के किसी तीसरे नेता की मांग देश में है तो वह हैं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी आदित्यनाथ चुनावी राज्यों के अलावा उन राज्यों का भी दौरा कर रहे हैं, जहां अभी चुनाव में वक़्त है। दक्षिण भारत के राज्यों में भी नियमित दौरा कर भाषण दे रहे है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को यह रास नही आ रहा है, इसकी वजह दोनों का एक ही राज्य का व स्वजातीय भी होना है. लिहाज़ा राजनाथ सिंह ने एक नया तरीका ढूंढ़ निकाला योगी आदित्यनाथ के यूपी से बाहर बढ़ते कदम को रोकने के लिए. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश के सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में कहा है कि मुख्यमंत्री अन्य राज्यों में अचानक दौरा न करें।
पत्र में रोक की वजह
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य के मुख्य सचिवों को लिखे इस पत्र में वजह, मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा को खतरा बताया है. सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में गृह मंत्रालय ने कहा है कि ऐसा देखने में आया है कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री बिना बताए दूसरे राज्यों के दौरे पर चले जाते हैं. पत्र में कहा गया है कि बिना सूचना दिए मेजबान राज्य के दौरे पर जाने से उनकी सुरक्षा का पूरा इंतजाम नहीं हो पाता है, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है. गृह मंत्रालय ने राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा है कि वह अपने-अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों को सूचित कर दें कि जब भी वह किसी दूसरे राज्य में जाएं तो सुरक्षा को देखते हुए मेजबान राज्य को जरूर सूचित कर दें. गौरतलब है कि सभी मुख्यमंत्री ‘जेड और जेड प्लस’ सुरक्षा के दायरे में आते हैं. जब वह किसी दूसरे राज्यों में जाते हैं तब उस राज्य की जिम्मेदारी होती है कि मेहमान मुख्यमंत्री को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया करवाए. इसलिए दौरे से पहले पूर्व सूचना देना अब जरूरी है.

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