
आर.बी.एल.निगम, फिल्म समीक्षक
बॉलीवुड की पॉपुलर एक्ट्रैसेस में से एक मानी जाने वाली एक्ट्रैस मुमताज अपने समय की सबसे खूबसूरत हीरोइनों में शामिल मुमताज अब इतनी बदल गईं है कि उनको पहचानना काफी मुश्किल है।
सुनसान छत पर, सीधे पल्ले की साड़ी पहने, एक हाथ में बहुत सारी चूड़ियाँ छनकाती वो शोख़ लड़की तो याद होगी आपको जिसकी दमकती बिंदिया ने न जाने कितने दिलों को अपनी चमक से घायल कर दिया था। जी हाँ,बिलकुल ठीक समझा आपने, एक जमाने की मशहूर अदाकारा मुमताज़ का ही ज़िक्र हो रहा है। बाल कलाकार से फिल्मी सफर शुरू करने वाली यह अभिनेत्री एक समय में अपने समय के मशहूर अभिनेताओं से भी अधिक मेहनताना लेने के लिए जानी जाती थीं।
वक्त का पहिया कब कैसी करवट लेता है, कोई नहीं जानता। सिनेमा की दुनिया में बदलाव स्वभाविक है। खासकर तब जब इस दुनिया में भगवान हर शुक्रवार को बदल जाता हो। ऐसा ही कुछ हुआ अपने समय की टॉप एक्ट्रेस मुमताज के साथ। अपने हुस्न और अदायगी से दर्शकों को दीवाना बना देने वाली मुमताज की कहानी बड़ी रोचक है, क्योंकि एक समय ऐसा भी था जब कोई उनके साथ काम नहीं करना चाहता था।
| फिल्म 'खिलौना' |
ईरानी मूल के दंपत्ति श्री अब्दुल सलीम अस्करी और नाज़ के घर मुमताज का जन्म 31 जुलाई 1947 को मुंबई में हुआ था। उन लोगों ने बड़े शौक से मुमताज़ रखा जिसका हिन्दी अर्थ है काबिलेतारीफ। शायद माता-पिता ने अपनी बेटी का भाग्य पहले ही पढ़ लिया था। लेकिन दुर्भाग्य ने एक वर्ष के उम्र से ही नन्ही मुमताज़ का हाथ पकड़ लिया था। एक वर्ष की अवस्था में भाग्य ने माता-पिता के अलगाव का तोहफा उस बच्ची को दिया। मुमताज़ अपनी माँ के साथ मुंबई चली आयीं। 1952 में पाँच वर्ष की अबोध उम्र में मुमताज़ ने फिल्मी संसार में फिल्म ‘संस्कार’ से एक बाल कलाकार के रूप में कदम रखा । इसके बाद उन्होने लगभग आठ फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम किया जिसमें ‘यासमीन’, ‘स्त्री’, ‘डॉ विद्या’ और 'सोने की चिड़िया' आदि उल्लेखनीय है। टीनएजर के तौर पर उन्होंने 'वल्लाह क्या बात है। 'स्त्री' और 'सेहरा' जैसी फिल्मों में काम किया कहा जाता है। मुमताज हमेशा से एक्ट्रैस बनना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने बहुत मेहनत की। बताया जाता है कि फिल्मों में रोल पाने के लिए मुमताज कई फिल्म स्टूडियोज के चक्कर काटती थीं।
जीवन में आयी उथल-पुथल
सोलह वर्ष की उम्र किसी भी युवती के जीवन में उथल-पथल ले आती है। मुमताज़ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जीवन का एकमात्र सहारा, उनकी माँ का देहांत हुआ और इसी वर्ष यानि 1963 में फिल्म ‘गहरा दाग’से उन्होने एक नायिका के रूप में अपने फिल्मी कैरियर को शुरू किया। बेशक यह फिल्म उन्हें महान कलाकार दारा सिंह जो उनके रिश्तेदार भी थे, की वजह से मिली थी, लेकिन इसके बाद उनके अभिनय क्षमता का लोहा सारे संसार ने मान लिया। दारा सिंह, जिनके साथ उस समय की कोई हीरोइन काम नहीं करना चाहती थी, मुमताज़ ने काम करते हुए 16 फिल्मों में काम किया। इसमें से 12 फिल्में हिट और सुपर हिट की श्रेणी में रखी गईं । इसके बाद मुमताज़ बी ग्रेड की हीरोइन होने के बावजूद सबसे अधिक मेहनताना लेने वाली हीरोइन बन गईं । दारा सिंह की हीरोइन बनने के साथ ही वो फिल्म ‘राम और श्याम ’ दिलीप कुमार की भी हीरोइन बनी। मुमताज ने 12 साल की छोटी उम्र में ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। उम्र कम होने की वजह से कोई भी निर्माता-निर्देशक यहां तक कि हीरो भी उन्हें लीड हीरोइन में कास्ट करने से बचते थे। वह कई डायरेक्टर्स और एक्टर्स से गुजारिश करतीं, लेकिन हर कोई तब कोई ना कोई बहाना बना लेता। यही वजह रही कि मुमताज को शुरुआती दिनों में साइड एक्ट्रेस का ही रोल मिलता था।
दारा सिंह के साथ की 10 फिल्में
कहते हैं ना कि हुनर को नियति को कोई रोक नहीं सकता। मुमताज के साथ भी ऐसा ही हुआ। मुमताज की जद्दोजहद जारी रही। उन्हें उन दिनों कई बी-ग्रेड फिल्मों में भी काम करना पड़ा। इस दौरान उन्होंने 16 एक्शन फिल्मों में भी काम किया, जिनमें उनकी जोड़ी दारा सिंह के साथ बनी। खास बात यह रही कि दारा सिंह के साथ उनकी जोड़ी को पसंद किया गया और दोनों की 10 फिल्में हिट साबित हुईं। एक्शन फिल्मों के कारण मुमताज की इमेज एक स्टंट हीरोइन की बन गई।बन गई थी स्टंट हीरोइन वाली इमेज
समय हर दिन एक साथ नहीं रहता। लिहाजा ये बदला और फिर वो दौर आया, जब मुमताज ने ए-ग्रेड फिल्मों का रुख किया। उन्होंने खूब हाथ-पैर मारा, लेकिन कोई भी उनके साथ काम करने के लिए तैयार नहीं था। यहां तक कि उस दौर के सुपरस्टार रहे धर्मेंद्र और शशि कपूर ने भी मुमताज के साथ काम करने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि वो एक स्टंट हीरोइन के साथ काम नहीं करेंगे। मुमताज को अडल्ट एक्ट्रैस के तौर पर पहला रोल ए-ग्रेड फिल्म 'गहरा दाग' में मिला जिसमें उन्होंने हीरो की बहन का रोल निभाया था।
ए-ग्रेड फिल्मों में सपोर्टिंग एक्ट्रेस का रोल
मुमताज को सबसे पहले अपनी इमेज बदलनी थी। उन्होंने फिर से ए-ग्रेड की फिल्मों में सपोर्टिंग रोल करने शुरू कर दिए। ‘काजल’, 'सावन की घटा', ‘खानदान’, ‘मेरे सनम’, ब्रह्मचारी, और ‘पत्थर के सनम’ जैसी कई ऐसी ए-ग्रेड फिल्मों में मुमताज ने सपोर्टिंग एक्ट्रेस के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्होंने 'मुझे जीने दो' जैसी कामयाब फिल्मों में काम किया। मुमताज की गिनती बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत हीरोइनों में होती थी। इसके बाद उन्हें लीड रोल मिलने लगे।राजेश खन्ना संग फिल्म ने बनाया सुपरस्टार
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| मुमताज़ अपने पति और राजेश खन्ना के साथ |
बाईस वर्ष तक सिने जगत पर ‘मॉडर्न ब्यूटी’ के नाम से प्रसिद्ध मुमताज़ 1974 में अपने कैरियर के सबसे ऊंचे पायदान पर थीं। हर नौजवान दिल की धड़कन मुमताज़ ने अपने बचपन के प्यार और साथी से 29 मई 1974 में मयूर माधवानी से शादी कर ली। इस खबर से फिल्मी और गैर-फिल्मी हर नौजवान का दिल टूट गया। एक अच्छी अदाकारा होने के साथ मुमताज़ बहुत सच्ची कलाकार भी थीं। इसीलिए शादी होने के बाद भी वो जिन फिल्मों में उस समय काम कर रहीं थीं उन्हें पूरी लगन और सच्चाई से पूरा किया। ‘आप की कसम’ , ‘रोटी’ ‘प्रेम कहानी’ ‘लफंगे’ और ‘नागिन’ फिल्मों का काम पूरा किया और अपने मन-मीत के साथ लंदन में अपनी गृहस्थी बसा ली।
विवाह उपरान्त फिल्म जगत को त्यागा
बेशक उम्र के साथ अब वो थोड़ी मोटी हो गई हैं। लेकिन 70 साल की उम्र में भी मुमताज ने खुद को बहुत मेनटेन करके रखा है। जीवन के सफर में मुमताज कभी कैंसर की चपेट में भी आ गई थीं। वह उस वक्त 54 साल की थीं। ब्रेस्ट कैंसर ने उन्हें भीतर तक तोड़कर रख दिया। साल 2000 की शुरुआत में उन्हें ब्रैस्ट कैंसर हुआ था लेकिन उन्होंने इस खतरनाक बीमारी को मात दे दी। एक वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मैं आसानी से हार नहीं मानती, मौत को भी मुझसे लड़ना पड़ेगा। मुमताज ने हिम्मत नहीं हारी और बीमारी को हरा दिया।पुरस्कारों का ताज
अपने समय के हर ऊंचे अभिनेता से काम करके मुमताज़ ने अपने अभिनय का तो लोहा मनवा ही लिया था। संजीव कुमार के साथ अभिनीत उनकी फिल्म ‘खिलौना’ में उन्हें ‘बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड’ से भी नवाजा गया । कहा तो यह तक जाता है की कुछ फिल्मी हस्तियों ने पहले मुमताज़ के साथ काम करने में अपना अपमान समझा और बाद में उन्हीं के कैरियर को बचाने वाली फिल्मों को मुमताज़ ने बेजीझक स्वीकार किया। शशि कपूर इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण हैं। ‘सच्चा-झूठा’ फिल्म के समय शशि कपूर का फिल्मी जीवन सफलता की सबसे ऊंची सीढ़ी पर था। इसलिए उन्होने उस समय की उभरती अदाकारा मुमताज़ के साथ काम करने से मना कर दिया। बाद में 1974 में जब मुमताज़ खुद प्रसिद्धि के सबसे ऊंचे पायदान पर थीं तब शशि कपूर के कैरियर को बचाने के लिए बनी फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ को न केवल स्वीकार किया बल्कि अपने अभिनय से उसे हिट भी बनाया । शायद इससे खूबसूरत जवाब शशि कपूर को कोई नहीं दे सकता था। https://gifs.com/gif/sashii-kapoor-and-mumtaz-Q1yKEY


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