आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
सेवेन सिस्टर्स यानी सात उत्तर पूर्वी राज्यों में कांग्रेस की सिर्फ दो जगह सरकारें हैं, मिजोरम और मेघालय।मेघालय विधानसभा का चुनाव 27 फरवरी को है जबकि मिजोरम विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर’18 तक है। सेवेन सिस्टर्स में मेघालय के अलावा त्रिपुरा और नागालैंड में भी विधानसभा चुनाव होना है। कांग्रेस शासित मेघालय के साथ ही नागालैंड में भी 27 फरवरी को चुनाव है। वहीं सीपीएम शासित त्रिपुरा में 18 फरवरी को मतदान है। गौरतलब है कि कभी नार्थ ईस्ट में क्षेत्रीय दलों के अलावा राष्ट्रीय दलों में सिर्फ कांग्रेस की सरकारें थी, अब सिर्फ उपस्थिति बनी रहे इसी की लड़ाई कांग्रेस लड़ रही है।
सेवेन सिस्टर्स यानी सात उत्तर पूर्वी राज्यों में कांग्रेस की सिर्फ दो जगह सरकारें हैं, मिजोरम और मेघालय।मेघालय विधानसभा का चुनाव 27 फरवरी को है जबकि मिजोरम विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर’18 तक है। सेवेन सिस्टर्स में मेघालय के अलावा त्रिपुरा और नागालैंड में भी विधानसभा चुनाव होना है। कांग्रेस शासित मेघालय के साथ ही नागालैंड में भी 27 फरवरी को चुनाव है। वहीं सीपीएम शासित त्रिपुरा में 18 फरवरी को मतदान है। गौरतलब है कि कभी नार्थ ईस्ट में क्षेत्रीय दलों के अलावा राष्ट्रीय दलों में सिर्फ कांग्रेस की सरकारें थी, अब सिर्फ उपस्थिति बनी रहे इसी की लड़ाई कांग्रेस लड़ रही है।
मेघालय जहां कांग्रेस सत्ता में है
10 साल से मेघालय में कांग्रेस की सरकार है और 20 मार्च’10 से मुकुल संगमा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है।
5 साल पहले 23 फ़रवरी’13 को 60 सदस्यीय विधानसभा का चुनाव हुआ था। मैजिक फिगर 31 से 2 कम 29 पाकर ही कांग्रेस सत्ता में आ गई थी। हालांकि 2008 के मुकाबले 4 सीटें ज्यादा मिली थी। दरअसल पिछले चुनाव में कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर निर्दलीय रहे थे 13 सीटें मिली थीं पिछले चुनाव के मुकाबले 8 सीटें ज्यादा। एक नजर अन्य दलों के प्रदर्शन पर डालते हैं, जिससे स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कांग्रेस की सत्ता में आने की वजह का। यूडीपी यानि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी को 8 सीटें मिली थीं, 2008 चुनाव के मुकाबले 3 कम। एचएसपीडीपी यानि हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को 4 सीटें मिली थीं पिछले चुनाव के मुकाबले 2 अधिक। शरद पवार और पीए संगमा की एनसीपी यानि नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को महज 2 सीटें यानि 2008 चुनाव के मुकाबले 13 सीटें कम मिली थीं। एनपीपी यानि नेशनल पीपुल्स पार्टी को 2 सीटें यानि 2 का ही लाभ, जीएनसी यानि गारो नेशनल कौंसिल को 1 सीट यानि 1 का ही लाभ और एनईएसडीपी नार्थ ईस्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को 1 सीट यानि 1 सीट का ही लाभ हुआ था।
5 साल पहले 23 फ़रवरी’13 को 60 सदस्यीय विधानसभा का चुनाव हुआ था। मैजिक फिगर 31 से 2 कम 29 पाकर ही कांग्रेस सत्ता में आ गई थी। हालांकि 2008 के मुकाबले 4 सीटें ज्यादा मिली थी। दरअसल पिछले चुनाव में कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर निर्दलीय रहे थे 13 सीटें मिली थीं पिछले चुनाव के मुकाबले 8 सीटें ज्यादा। एक नजर अन्य दलों के प्रदर्शन पर डालते हैं, जिससे स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कांग्रेस की सत्ता में आने की वजह का। यूडीपी यानि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी को 8 सीटें मिली थीं, 2008 चुनाव के मुकाबले 3 कम। एचएसपीडीपी यानि हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को 4 सीटें मिली थीं पिछले चुनाव के मुकाबले 2 अधिक। शरद पवार और पीए संगमा की एनसीपी यानि नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को महज 2 सीटें यानि 2008 चुनाव के मुकाबले 13 सीटें कम मिली थीं। एनपीपी यानि नेशनल पीपुल्स पार्टी को 2 सीटें यानि 2 का ही लाभ, जीएनसी यानि गारो नेशनल कौंसिल को 1 सीट यानि 1 का ही लाभ और एनईएसडीपी नार्थ ईस्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को 1 सीट यानि 1 सीट का ही लाभ हुआ था।
त्रिपुरा में 25 साल से कांग्रेस सत्ता से बाहर
1988 में सीपीएम के 10 साल के शासन का अंत हुआ था और कांग्रेस 21 साल बाद सत्ता में वापसी की थी। गौरतलब है की त्रिपुरा में 1963 से 1977 तक कांग्रेस का शासन रहा था। 1988 में वापसी करने वाली कांग्रेस बमुश्किल 5 साल ही सत्ता में रह पायी। सुधीर रंजन मजूमदार और समीर रंजन बर्मन की लड़ाई में बारी बारी दोनों ही मुख्यमंत्री बने, बावजूद इसके 5 साल बाद ही सीपीएम सत्ता में वापसी कर गई। 1993 से 1998 तक सीपीएम के दशरथ देब मुख्यमंत्री रहे। 11 मार्च 1998 से सीपीएम के माणिक सरकार लगातार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन है। 11वीं त्रिपुरा विधानसभा का पिछला चुनाव 14 फ़रवरी’13 को हुआ था और सीपीएम की लगातार 5वीं बार वापसी हुई थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम को 50 सीटें और कांग्रेस को 10 सीटें मिली थीं। 2008 विधानसभा चुनाव के मुकाबले सीपीएम को 1 सीट का लाभ और कांग्रेस को 1 सीट का नुक्सान हुआ था।
नागालैंड में 15 साल से कांग्रेस सत्ता से बाहर
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| प्रधानमंत्री मोदी नागालैंड में |
त्रिपुरा : सीपीएम लड़ाई में अभी तक आगे, कहां व कैसे
त्रिपुरा में अभी तक दो ही राजनीतिक दल सीपीएम और कांग्रेस हुकूमत कर चुकी है। दोनों ही दल सीपीएम और कांग्रेस 18 फरवरी को होने वाले चुनाव की तैयारियां शुरू कर चुके है। सीपीएम लड़ाई में अभी तक आगे है। दरअसल सीपीएम ने लेफ्ट फ्रंट के उम्मीदवारों की सूची सबसे पहले जारी कर दी है, जबकि कांग्रेस ने स्क्रीनिंग कमेटी का गठन कर दिया है। यह कमेटी संभावित उम्मीदवारों का चयन करेगी, जिन्हें त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में टिकट दिया जा सकता है। त्रिपुरा के लिए बनाई गई चुनाव स्क्रीनिंग कमेटी में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मुकुल वासनिक, शकील अहमद खान और अमिताभ चक्रवर्ती शामिल है। बीजेपी भी जमीनी हकीकत के अध्ययन के लिए महासचिव राम माधव को मैदान में उतार चुकी है। राम माधव कहते हैं कि आप त्रिपुरा में मेरे हाथ पैर तोड़ सकते हैं, पार्टी कार्यालय का फर्नीचर तोड़ सकते हैं, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं व सदस्यों की भावना को नहीं तोड़ सकते। माकपा सरकार का जीवन सिर्फ फरवरी तक है इसके बाद यह बाहर होगी और बीजेपी सत्ता में आएगी।
सीपीएम की सूची की खास बातें
लेफ्ट फ्रंट के 60 उम्मीदवारों की सूची में 12 नए चेहरे और 12 मौजूदा मंत्रियों के नाम शामिल है। नए चेहरों के अलावा लेफ्ट फ्रंट के उम्मीदवारों की सूची में हैरान करने वाली और कोई बात नहीं है, क्योंकि अधिकतर पुराने नेताओं को इसमें जगह दी गई है। सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल तीन मुख्य दल आरएसपी, सीपीआई और फॉरवर्ड ब्लॉक को एक-एक सीट दी गयी। आरएसपी और सीपीआई को पिछले चुनाव में दो-दो सीटें दी गई थीं। इस बार सात महिलाएं विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं, जो पिछले बार से दो ज्यादा है। किसी मंत्री को उम्मीदवारों की सूची से हटाया नहीं गया है। वे अपने अपने मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों से ही चुनाव लड़ेंगे। मुख्यमंत्री माणिक सरकार अपने गढ़ धानपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। नए चेहरों में अगरतला नगरनिगम परिषद के मेयर बिश्वनाथ साहा (फॉरवर्ड ब्लॉक) और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) की प्रदेश शाखा के अध्यक्ष अमल चक्रवर्ती (सीपीएम) शामिल है। लेफ्ट फ्रंट के नवनियुक्त संयोजक बिजन धर ने कहा कि जनाधार रखने वाले उम्मीदवारों को नामांकित किया गया है। लेफ्ट फ्रंट भारी बहुमत से चुनाव जीतेगा और बीजेपी-इंडीजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) गठबंधन को चुनाव में करारा जवाब देगा।
त्रिपुरा में 25 साल से कांग्रेस सत्ता से बाहर
1988 में सीपीएम के 10 साल के शासन का अंत हुआ था और कांग्रेस ने 21 साल बाद सत्ता में वापसी की थी।गौरतलब है कि त्रिपुरा में 1963 से 1977 तक कांग्रेस का शासन रहा था। 1988 में वापसी करने वाली कांग्रेस बमुश्किल 5 साल ही सत्ता में रह पायी। सुधीर रंजन मजूमदार और समीर रंजन बर्मन की लड़ाई में बारी-बारी दोनों ही मुख्यमंत्री बने, बावजूद इसके 5 साल बाद ही सीपीएम सत्ता में वापसी कर गयी। 1993 से 1998 तक सीपीएम के दशरथ देब मुख्यमंत्री रहे। 11 मार्च 1998 से सीपीएम के माणिक सरकार लगातार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं। 11वीं त्रिपुरा विधानसभा का पिछला चुनाव 14 फ़रवरी’13 को हुआ था और सीपीएम की लगातार 5वीं बार वापसी हुई थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम को 50 सीटें और कांग्रेस को 10 सीटें मिली थीं। 2008 विधानसभा चुनाव के मुकाबले सीपीएम को 1 सीट का लाभ और कांग्रेस को 1 सीट का नुकसान हुआ था।
नार्थ ईस्ट कांग्रेस मुक्त कर फतह करने चली बीजेपी को लगा पहला झटका
पूर्वोत्तर के तीनों राज्य त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड पर बीजेपी की विशेष नजर है। गौरतलब है कि तीन राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में बीजेपी सत्ताशीन हो चुकी है और अब इन तीन नए राज्यों में फरवरी’18 में चुनाव है। विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी है और आचार संहिता भी लागू हो चुकी है। लेकिन इस बीच नागालैंड विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी के भीतर बेचैनी पैदा हो गई है। इसकी वजह यह है कि दरअसल नगालैंड में 60 विधानसभा सीटें हैं और यहां पर डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नागालैंड के नेतृत्व वाली नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) की सरकार सत्ता में है। सरकार में बीजेपी एक जूनियर पार्टनर थी लेकिन अब यह दो दशक पुराना गठबंधन टूट गया है। ऐसे में इस गठबंधन के टूटने के बाद बीजेपी राज्य में अलग थलग पड़ गई है। ऐसे में नार्थ ईस्ट पूरी तरह कांग्रेस मुक्त कर फतह करने चली बीजेपी को वहीं धक्का लगा है, जहां वह सत्त्ता में भागीदार थी।
आखिर यह गठबंधन टूटा क्यों और कैसे
नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नागालैंड आखिर टूटा क्यों और कैसे ? गठबंधन टूटने को लेकर नागा पीपुल्स फ्रंट की तरफ से कहा गया है कि यह फैसला पार्टी के नेता शुरोजेली के नेतृत्व में केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने लिया है। हालांकि पार्टी के कई नेता गठबंधन तोड़ने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा है कि गठबंधन तोड़ने से पहले हमसे इस पर राय नहीं ली गई. इतना ही नहीं, बल्कि कई नेताओं का यह भी आरोप है कि मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग को फायदा पहुंचाने के लिए भाजपा से गठबंधन तोड़ने का काम किया गया है। वैसे उम्मीद जताई जा रही है कि गठबंधन तोड़ने के इस फैसले का सीधा सीधा लाभ नवगठित नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी को मिल सकता है। बहरहाल, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि अब भाजपा को नागालैंड में अपनी सियासी ज़मीन तलाशने में काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है। ऐसे में नागा पीपुल्स फ्रंट के इस फैसले से भाजपा को भारी नुकसान भी हो सकता है।

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